ग्लोबल बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और दुनियाभर में पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच 27 मार्च 2026 को भारत सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए एक बड़ा कदम उठाया। केंद्र सरकार ने पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती करते हुए इसे ₹13 से घटाकर ₹3 कर दिया, वहीं डीजल पर इसे ₹10 से घटाकर सीधे शून्य (Zero) कर दिया है। लेकिन बावजूद इसके पेट्रोल-डीजल की कीमतें जस की तस बनी हुई हैं, आखिर ऐसा क्यों है कि टैक्स घटने के बाद भी तेल सस्ता नहीं हो रहा? आइए आपको इसके पीछे का पूरा गणित बताते हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की 'आग'
इस समय मध्य पूर्व (Middle East) में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार संकट में है। 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz), जहां से दुनिया का एक बड़ा तेल व्यापार होता है, वहां की नाकेबंदी से कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें रॉकेट की तरह बढ़ गई हैं। पिछले एक महीने में कच्चा तेल $70 प्रति बैरल से बढ़कर $122 प्रति बैरल तक पहुंच गया है। भारत अपनी जरूरत का 90% तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर यहां पड़ता है।
तेल कंपनियों (OMCs) का भारी नुकसान
भारत की सरकारी तेल कंपनियां (IOCL, BPCL, HPCL) पिछले कई हफ्तों से अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल के बावजूद घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ा रही थीं। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, कंपनियां पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर प्रति लीटर ₹24 से ₹48 तक का घाटा उठा रही थीं। सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में जो ₹10 की कटौती की गई है, उसे तेल कंपनियां अपने इसी पुराने घाटे (Under-recoveries) की भरपाई के लिए इस्तेमाल करेंगी। यानी, टैक्स घटने से जो पैसा बचेगा, वह ग्राहकों तक पहुंचने के बजाय कंपनियों के नुकसान को कम करने में चला जाएगा।
केवल 'बफर' का काम
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी के अनुसार, सरकार के पास दो विकल्प थे या तो अन्य देशों की तरह पेट्रोल की कीमतों में ₹30-40 की भारी बढ़ोतरी कर दी जाए, या फिर टैक्स घटाकर कीमतों को स्थिर रखा जाए। सरकार ने दूसरा विकल्प चुना। इस एक्साइज ड्यूटी कट का मुख्य उद्देश्य पेट्रोल को 'सस्ता करना' नहीं, बल्कि उसे 'महंगा होने से बचाना' है। अगर यह कटौती नहीं की जाती, तो निजी कंपनियां (जैसे नायरा एनर्जी, जिसने हाल ही में ₹5 तक दाम बढ़ाए हैं) और सरकारी कंपनियां भी दाम बढ़ाने पर मजबूर हो जातीं।
आम आदमी के लिए पेट्रोल-डीजल की कीमत का मतलब सिर्फ वह आंकड़ा है जो पेट्रोल पंप की मशीन पर दिखता है, लेकिन इसके पीछे टैक्स और खर्चों की कई परतें होती हैं। इसमें कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की अंतरराष्ट्रीय कीमत, उसे साफ करने का रिफाइनिंग खर्च, ट्रांसपोर्टेशन की लागत, केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी, राज्य सरकार का वैट (VAT) और पेट्रोल पंप डीलर का कमीशन शामिल होता है। यही वजह है कि जब केंद्र सरकार एक्साइज ड्यूटी घटाती है, तो उसका पूरा फायदा सीधे ग्राहक तक नहीं पहुंच पाता क्योंकि बीच की कड़ियों में कीमतें एडजस्ट हो जाती हैं।
टैक्स का गणित और रुपये की कमजोरी
कीमतें स्थिर रहने की एक और वजह राज्यों का टैक्स (VAT) है। केंद्र ने अपनी ड्यूटी कम की, लेकिन राज्यों ने वैट में कटौती नहीं की। चूंकि कई राज्यों में वैट प्रतिशत के आधार पर लगता है, इसलिए बेस प्राइस बढ़ते ही टैक्स की रकम भी बढ़ जाती है। साथ ही, डॉलर के मुकाबले रुपये के कमजोर होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार से कच्चा तेल खरीदना और भी महंगा पड़ता है, जिसका सीधा बोझ घरेलू कीमतों पर दिखता है।
