भारत में आम जनता के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे तौर पर उनके घरेलू बजट और देश की महंगाई दर को प्रभावित करती हैं। पिछले कुछ समय से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आई भारी गिरावट के बाद से देश भर के उपभोक्ताओं में इस बात की उम्मीद जग गई थी कि सरकार जल्द ही पेट्रोल और डीजल के दामों में कटौती कर राहत दे सकती है। लेकिन इस बीच, पेट्रोलियम मंत्रालय (Petroleum Ministry) की ओर से पेट्रोल डीजल (Petrol Diesel) की कीमतों में कटौती को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और बड़ा बयान सामने आया है। सरकार ने साफ कर दिया है कि देश में ईंधन की कीमतों को घटाने या उनमें कोई भी बदलाव करने का फैसला पूरी तरह से बदलते हुए वैश्विक हालातों और अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिरता पर निर्भर करेगा।
कब सस्ता होगा पेट्रोल डीजल?
पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा कि पश्चिम एशिया संकट के दौरान कच्चे तेल का भाव 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया था, लेकिन अब इसमें नरमी आ रही है। सरकार बाजार की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए है। उन्होंने कहा कि खुदरा ईंधन कीमतों को लेकर भविष्य में जो भी फैसला होगा, वह अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों और कच्चे तेल की कीमतों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा। मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों और सूत्रों के मुताबिक, सरकार जल्दबाजी में खुदरा कीमतों (Retail Prices) को घटाने का कोई कदम नहीं उठाना चाहती। इसके पीछे मुख्य कारण वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां (Geopolitical Situations) हैं, जो बेहद तेजी से बदल रही हैं। कच्चे तेल की कीमतों में पिछले कुछ दिनों से जो गिरावट दिख रही है, सरकार पहले उसकी स्थिरता को गहराई से परखना चाहती है। पेट्रोलियम मंत्रालय का मानना है कि तेल के बाजार में अस्थिरता बहुत अधिक है; आज जो कीमतें नीचे आई हैं, वे कल किसी नए वैश्विक तनाव या तेल उत्पादक देशों (OPEC) के फैसलों के कारण दोबारा अचानक बढ़ सकती हैं। इसलिए, जब तक वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें एक निश्चित दायरे में लंबे समय तक स्थिर नहीं हो जातीं, तब तक घरेलू स्तर पर कोई बड़ा फैसला लेना जल्दबाजी होगी।
आयात पर निर्भर है पेट्रोल डीजल
भारत अपनी जरूरत का करीब 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार की छोटी से छोटी हलचल का सीधा असर देश की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) जैसे इंडियन ऑयल (IOC), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) पर पड़ता है। हालांकि, मौजूदा समय में कच्चे तेल की कम कीमतों के कारण इन सरकारी तेल कंपनियों का रिफाइनिंग मार्जिन और मुनाफा काफी सुधरा है। लेकिन कंपनियों का यह भी तर्क है कि पिछले साल जब कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया था, तब उन्होंने देश में कीमतों को बहुत ज्यादा नहीं बढ़ाकर भारी वित्तीय नुकसान (Under-recoveries) उठाया था। अब जब कीमतें कम हुई हैं, तो कंपनियां पहले अपने उस पुराने घाटे की भरपाई करने में जुटी हैं, ताकि उनका बैलेंस शीट मजबूत हो सके।
वेट एंड वॉच की नीति
इसके अलावा, ईंधन की अंतिम कीमतों को तय करने में केवल कच्चे तेल का बेस प्राइस ही मायने नहीं रखता, बल्कि इसमें केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी और राज्य सरकारों का वैट (VAT) भी एक बहुत बड़ा हिस्सा होता है। मंत्रालय के इस नए बयान से यह संकेत मिलता है कि सरकार कीमतों में कटौती की संभावनाओं को पूरी तरह खारिज नहीं कर रही है, बल्कि वह 'वेट एंड वॉच' (Wait and Watch) यानी देखो और इंतजार करो की नीति पर चल रही है। यदि आने वाले कुछ हफ्तों में वैश्विक परिस्थितियां शांत रहती हैं और कच्चा तेल इसी तरह पुराने निचले स्तरों पर टिका रहता है, तो तेल कंपनियां और मंत्रालय मिलकर आम जनता को प्रति लीटर 3 से 5 रुपये तक की राहत देने का मन बना सकते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोलियम मंत्रालय का यह रुख देश की आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए बेहद व्यावहारिक है। अचानक से बड़ी कटौती करने और बाद में अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने पर दोबारा दाम बढ़ाने से बाजार में अनिश्चितता का माहौल बनता है। इसलिए सरकार एक ऐसी स्थायी व्यवस्था चाहती है, जहां अगर एक बार दाम घटाए जाएं, तो जनता को उसका लंबे समय तक फायदा मिले। तब तक के लिए देश के वाहन चालकों और आम उपभोक्ताओं को वैश्विक बाजारों के शांत होने और पेट्रोलियम मंत्रालय के अगले कदम का थोड़ा और इंतजार करना होगा।
