मिडिल ईस्ट में ईरान और इज़राइल के बीच छिड़ा युद्ध लगातार गहराता जा रहा है, जिसकी लपटें अब वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच गई हैं। इस तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है। समुद्री रास्तों में सुरक्षा का हवाला देकर शिपिंग कंपनियों ने रास्ते बदल दिए हैं, जिससे सप्लाई चेन बाधित हो गई है और अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रभावित हो रहा है। युद्ध की अनिश्चितता के चलते शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जबकि निवेशक सुरक्षा के लिए सोने की ओर भाग रहे हैं।
जब भी दुनिया में युद्ध का माहौल बनता है या अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में आती है, तो शेयर बाजार में हाहाकार मच जाता है। निवेशक अपनी जमापूंजी डूबने के डर से स्टॉक मार्केट से पैसा निकालने लगते हैं। ऐसे अनिश्चितता के दौर में एक ही संपत्ति है जो निवेशकों के चेहरे पर मुस्कान लाती है वह है सोना (Gold)। पिछले कुछ समय से हम देख रहे हैं कि वैश्विक तनाव के बावजूद सोने के दाम लगातार ऊंचाइयों को छू रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों होता है कि मुसीबत के समय कागजी करेंसी या शेयर मार्केट कमजोर पड़ जाते हैं और सोना असली खजाना बनकर उभरता है? आइए इसके पीछे के आर्थिक इतिहास और कारणों को समझते हैं।
1. इतिहास गवाह है पाउंड का पतन और फ्रैंक की चमक
दुनिया के वित्तीय इतिहास पर नजर डालें तो पाएंगे कि मुद्राओं की ताकत का सीधा संबंध उनके सोने के भंडार से रहा है। 19वीं सदी में ब्रिटिश पाउंड (GBP) दुनिया का निर्विवाद सम्राट था। उस समय ब्रिटिश साम्राज्य इतना बड़ा था कि कहा जाता था वहां कभी सूरज अस्त नहीं होता। लेकिन दो विश्व युद्धों ने ब्रिटेन की कमर तोड़ दी। युद्ध का भारी खर्च उठाने के लिए ब्रिटेन ने नोट छापे और कर्ज लिया, जिससे पाउंड की क्रय शक्ति (Purchasing Power) तेजी से गिरी। 200 साल पहले जो पाउंड स्विस फ्रैंक से कई गुना मजबूत था, आज उसकी कीमत स्विस फ्रैंक से भी कम हो गई है। यह साबित करता है कि कोई भी कागजी करेंसी शाश्वत नहीं है।
2. सोना सेफ हेवन
अर्थशास्त्र का एक सीधा सा नियम है जिस मुद्रा के पीछे सोने जैसी ठोस संपत्ति (Physical Asset) होगी, वह मुद्रा संकट में भी स्थिर रहेगी। स्विट्जरलैंड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। स्विस नेशनल बैंक ने हमेशा अपनी मुद्रा (स्विस फ्रैंक) को सोने के भंडार के साथ एक निश्चित अनुपात में बांधकर रखा है। जब भी बाजार में कोई बड़ी मुसीबत आती है, तो निवेशक उन मुद्राओं को छोड़ देते हैं जो केवल कागजी वादों पर टिकी हैं और उन मुद्राओं की ओर भागते हैं जो सोने द्वारा समर्थित हैं। इसीलिए, संकट के समय स्विस फ्रैंक को दुनिया की सबसे भरोसेमंद 'सेफ हेवन' (Safe Haven) करेंसी माना जाता है।
3. युद्ध और मंदी में विनाशक भूमिका
इतिहास गवाह है कि युद्ध ने अर्थव्यवस्था को हमेशा पीछे धकेला है। प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान और बाद में, वैश्विक स्तर पर मुद्राओं के अवमूल्यन (Devaluation) का सिलसिला चला। युद्ध के दौरान सरकारें हथियारों की खरीद के लिए अंधाधुंध नोट छापती हैं। इससे बाजार में पैसे की आपूर्ति (Money Supply) बढ़ जाती है, जिससे महंगाई आसमान छूने लगती है और कागजी नोटों की वैल्यू कागज के टुकड़े के बराबर रह जाती है। 1929 की 'ग्रेट डिप्रेशन' हो या 2008 का वित्तीय संकट, हर बड़ी मंदी के बाद कमजोर अर्थव्यवस्था वाली मुद्राओं का मूल्य गिरना तय था। ऐसे समय में, जिन देशों के पास अपना सोने का भंडार था, वे मंदी के प्रभाव को कम करने में सफल रहे।
4. भारत बनाम स्विट्जरलैंड
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेजी से बढ़ रहा है और भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) लगातार सोने की खरीदारी कर रहा है। वर्तमान में भारत के पास लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है। हालांकि यह आंकड़ा काफी बड़ा है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था के आकार और जनसंख्या को देखते हुए, रुपये को और अधिक सुरक्षित बनाने के लिए हमें अपना गोल्ड रिजर्व और बढ़ाने की आवश्यकता है। रुपये की अस्थिरता का एक बड़ा कारण हमारा व्यापार घाटा (Trade Deficit) और अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मांग है। सोने का भंडार हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक विश्वसनीय बनाता है और डॉलर पर हमारी निर्भरता को कम करता है।
5. केंद्रीय बैंकों की नई 'गोल्ड पॉलिसी'
आज के समय में दुनिया के अधिकांश केंद्रीय बैंक फिर से सोने की ओर मुड़ रहे हैं। 2026 के आंकड़ों के अनुसार, चीन, भारत और तुर्की जैसे देश अपने रिजर्व में सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। RBI ने सोने को एक 'रणनीतिक संपत्ति' के रूप में देखा है। यह न केवल रुपये को स्थिरता देता है, बल्कि वैश्विक झटकों से अर्थव्यवस्था को बचाता है।
