चीन की कूटनीति भी कुछ-कुछ शतरंज के उस खिलाड़ी जैसी है, जो चाल चलने से पहले सामने वाले की कई चालों का हिसाब लगा लेता है। कभी दोस्ती का हाथ बढ़ाता है, कभी आर्थिक रिश्तों का कार्ड खेलता है और जरूरत पड़ने पर अपनी ताकत का एहसास भी करा देता है। यही वजह है कि बीजिंग की हर बड़ी कूटनीतिक पहल पर दुनिया की नजरें टिक जाती हैं। इन दिनों से चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Xi Jinping) के अमेरिकी दौरे की खूब चर्चा हो रही है।
24 अक्टूबर को उनकी मुलाकात डोनाल्ड ट्रंप से होनी है। हालांकि, अमेरिका जाने से पहले शी जिनपिंग इन दिनों एक के बाद एक अहम देशों का दौरा कर रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि ट्रंप से मुलाकात से पहले शी जिनपिंग इतने देशों का दौरा क्यों कर रहे हैं? क्या चीन अमेरिका के साथ होने वाली बातचीत से पहले अपनी कूटनीतिक जमीन मजबूत कर रहा है?
एससीओ में शी जिनपिंग की मौजूदगी
शी जिनपिंग ने हाल ही में किर्गिस्तान के बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। यहां उनकी मुलाकात रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, ईरान के राष्ट्रपति और दूसरे नेताओं से हुई। एससीओ चीन के लिए ऐसा मंच है, जहां वह पश्चिमी देशों के प्रभाव के बीच रूस, भारत, ईरान और मध्य एशियाई देशों के साथ सहयोग का संदेश देता है। विश्लेषकों के मुताबिक, चीन इस मंच के जरिए एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पैरवी कर रहा है।
एससीओ में पीएम मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की हुई मुलाकात। ANI
मिस्र क्यों पहुंचे शी जिनपिंग?
एससीओ के बाद शी जिनपिंग मिस्र पहुंचे। यह दौरा भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि मिस्र मध्य पूर्व में अमेरिका का अहम साझेदार है और स्वेज नहर की वजह से उसकी रणनीतिक अहमियत बहुत ज्यादा है। चीन और मिस्र के बीच आर्थिक संबंध भी तेजी से बढ़े हैं। चीन ने मिस्र में बुनियादी ढांचे और तकनीक से जुड़े कई प्रोजेक्ट में निवेश किया है। बीजिंग के लिए मिस्र के साथ संबंध मजबूत करना मध्य पूर्व में अपनी मौजूदगी बढ़ाने का एक अहम हिस्सा है।चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल-फतह अल-सिसी की फाइल फोटो। AP
ट्रंप से पहले 'कूटनीतिक ताकत' दिखाने की कोशिश?
शी जिनपिंग का लगातार कई देशों से संपर्क करना महज सामान्य विदेश यात्रा नहीं माना जा रहा। इसके जरिए चीन यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि वह वैश्विक स्तर पर अकेला नहीं है। रूस, भारत, ईरान, मध्य एशिया और मध्य पूर्व के देशों के साथ चीन के रिश्ते अमेरिका के साथ उसकी बातचीत में रणनीतिक महत्व रखते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग खुद को अमेरिका के विकल्प के तौर पर एक प्रभावशाली वैश्विक साझेदार के रूप में पेश करना चाहता है।
ट्रंप और शी की मुलाकात में क्या दांव पर है?
ट्रंप-शी बैठक में व्यापार सबसे बड़ा मुद्दा हो सकता है। दोनों देशों के बीच टैरिफ, चीनी कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंध, तकनीक, दुर्लभ खनिज और निर्यात जैसे मुद्दे लंबे समय से तनाव का कारण रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक, शी इस बार अमेरिका दौरे पर एक बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल को भी साथ ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। इसका मकसद अमेरिका के साथ व्यावसायिक संबंधों को स्थिर करने का संदेश देना हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और शी जिनपिंग की फाइल फोटो। AP
क्या चीन अमेरिका की जगह लेना चाहता है?
विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि शी जिनपिंग लंबे समय में चीन को अमेरिकी नेतृत्व वाले वैश्विक ढांचे के विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। बीजिंग बहुध्रुवीय दुनिया और वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी की बात करता है। हालांकि, यह रणनीति आसान नहीं है। ग्लोबल साउथ के कई देश चीन के आर्थिक प्रभाव से सावधान भी हैं और जरूरी नहीं कि वे चीन को अमेरिका के स्थान पर नया वैश्विक नेता मानने लगें।
भारत के लिए भी क्यों अहम है शी का दौरा?
शी जिनपिंग के दौरे का अगला महत्वपूर्ण पड़ाव भारत है, जहां वह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने वाले हैं। भारत और चीन के रिश्ते 2020 के गलवान संघर्ष के बाद बेहद तनावपूर्ण रहे हैं। लेकिन हाल के समय में दोनों देशों ने रिश्तों को धीरे-धीरे स्थिर करने की कोशिश की है। चीन के लिए भारत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत ग्लोबल साउथ की एक बड़ी आवाज है। अगर बीजिंग भारत के साथ संबंधों में सुधार दिखाने में सफल रहता है, तो इससे चीन की उस छवि को मजबूती मिल सकती है जिसमें वह खुद को विकासशील देशों की आवाज के तौर पर पेश करता है।
पीएम मोदी और शी जिनपिंग की फाइल फोटो। ANI
अमेरिका के लिए चीन का क्या संदेश?
शी जिनपिंग की इस पूरी कूटनीतिक कवायद को एक संदेश के तौर पर भी देखा जा सकता है। ड्रैगन अमेरिका से टकराव नहीं चाहता, लेकिन वह बातचीत में कमजोर स्थिति में भी नहीं जाना चाहता। यानी ट्रंप से मुलाकात से पहले शी जिनपिंग एक तरफ रूस, भारत, ईरान और मध्य पूर्व के साथ संबंधों को मजबूत कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्तों को स्थिर करने की कोशिश भी कर रहे हैं।
शी जिनपिंग का यह 'डिप्लोमैटिक मैराथन' दरअसल चीन की दोहरी रणनीति को दिखाता है। बीजिंग एक तरफ अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ ग्लोबल साउथ और गैर-पश्चिमी देशों में अपना प्रभाव बढ़ाकर अपनी सौदेबाजी की ताकत मजबूत कर रहा है। ट्रंप के साथ होने वाली बैठक में यही कूटनीतिक ताकत चीन के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
चीन भले ही अभी अमेरिका का पूरी तरह विकल्प नहीं बन पाया हो, लेकिन पिछले डेढ़ दशक में उसने यह साबित कर दिया है कि वैश्विक राजनीति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सामरिक समीकरणों को प्रभावित करने की उसकी क्षमता लगातार बढ़ी है। दुनिया के कई देश भी अब इस बदलती तस्वीर को महसूस करने लगे हैं। उन्हें एहसास है कि आने वाले वर्षों में वैश्विक व्यवस्था सिर्फ अमेरिका के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं रहेगी, बल्कि चीन समेत अन्य शक्तियां भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाएंगी।
