भारतीय वित्तीय बाजारों (Financial Markets) में इन दिनों एक बेहद अजीब और चौंकाने वाला विरोधाभास देखने को मिल रहा है। विदेशी संस्थागत निवेशक (FPIs/FIIs) भारतीय शेयर बाजार (Stock Market) से तो अपने पैर पीछे खींच रहे हैं, लेकिन ठीक इसी समय वे देश के सरकारी बॉन्ड मार्केट (Debt Market) पर दिल खोलकर पैसा लुटा रहे हैं। एडेलवाइस म्यूचुअल फंड (Edelweiss MF) की हालिया फिक्स्ड-इनकम रिपोर्ट के आंकड़ों ने हैरान कर दिया है। डेटा और नीतिगत बदलावों के जरिए समझते हैं कि विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी को डंप करके बॉन्ड को क्यों गले लगा रहे हैं। 2026 में विदेशी निवेशकों के रुख में आया यह ऐतिहासिक अंतर नीचे दिए गए आंकड़ों से बिल्कुल साफ हो जाता है।
| समय सीमा (Timeline) | शेयर बाजार (Equity Outflows) | बॉन्ड मार्केट (Debt Inflows) |
| जून 2026 (Fortnight/MTD) | ₹63,450 करोड़ की भारी बिकवाली | ₹22,695 करोड़ का शुद्ध निवेश |
| कैलेंडर वर्ष 2026 (CYTD) | ₹2,88,382 करोड़ बाजार से बाहर | ₹30,961 करोड़ का रिकॉर्ड निवेश |
टैक्स की नो-टेंशन
5 जून 2026 को केंद्र सरकार और आरबीआई ने विदेशी निवेशकों के लिए घरेलू ऋण बाजार के दरवाजे पूरी तरह खोल दिए। FPIs के लिए सरकारी बॉन्ड्स (G-Secs) पर लगने वाले 12.5% लॉन्ग-टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स और ब्याज आय पर लगने वाले 20% विदहोल्डिंग टैक्स (Withholding Tax) को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। इसने विदेशी फंडों के रिटर्न (Yield-after-tax) को सीधे तौर पर बढ़ा दिया है। इसके साथ ही RBI ने बिना किसी निवेश सीमा (No Ceiling) वाले Fully Accessible Route (FAR) के दायरे को बढ़ाते हुए इसमें 15-वर्षीय, 30-वर्षीय और 40-वर्षीय लंबी अवधि के नए सरकारी बॉन्ड को भी शामिल कर दिया है।
US-ईरान पीस डील और कच्चे तेल में गिरावट
अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए अस्थायी शांति समझौते के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड फिसलकर $83 प्रति बैरल के पास आ गया है। इसकी वजह से भारत का चालू खाता घाटा (CAD) सुधरने, आयात बिल घटने और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में मजबूती की उम्मीद है। इसके चलते बॉन्ड में निवेश आकर्षक हो गया है।
शेयरों में प्रॉफिट बुकिंग और महंगे वैल्यूएशन
भारतीय शेयर बाजार (Nifty/Sensex) के ऐतिहासिक रूप से ऊंचे वैल्यूएशन पर होने के कारण वैश्विक फंड्स लगातार मुनाफावसूली (Profit-Booking) कर रहे हैं। ग्लोबल अनिश्चितताओं को देखते हुए निवेशक इक्विटी जैसे जोखिम भरे एसेट से पैसा निकालकर भारतीय सरकारी बॉन्ड जैसी 'सुरक्षित और निश्चित आय' (Safe Haven) वाली जगहों पर पार्क कर रहे हैं।
बैंकिंग सिस्टम में सरप्लस लिक्विडिटी
आरबीआई के नीतिगत उपायों के चलते भारतीय बैंकिंग प्रणाली में नकदी (Liquidity) अब सरप्लस यानी अधिशेष की स्थिति में आ चुकी है। मनी मार्केट में कमर्शियल पेपर (CP) और सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट (CD) की दरें नीचे आई हैं, जिससे बॉन्ड यील्ड में गिरावट (सॉफ्टनिंग) आई है और बॉन्ड की कीमतें बढ़ी हैं। इससे प्राइमरी कॉर्पोरेट बॉन्ड बाजार में भी कंपनियों द्वारा उधारी जुटाने की गतिविधियां दोबारा तेज हो गई हैं।
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