Tata Group Power Battle Explained : देश के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी घरानों में से एक 'टाटा ग्रुप' (Tata Group) में एक बार फिर कंट्रोल को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस बार मुकाबला टाटा ग्रुप की मुख्य होल्डिंग कंपनी 'टाटा संस' (Tata Sons) और उसमें 66% की अधिकतर हिस्सेदारी रखने वाले 'टाटा ट्रस्ट्स' (Tata Trusts) के बीच है। टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा (Noel Tata) ने एन. चंद्रशेखरन (N. Chandrasekaran) को टाटा संस का दोबारा चेयरमैन चुने जाने की प्रक्रिया को गैर-कानूनी, अमान्य और नियमों के खिलाफ बताया है। इस पूरे विवाद, इसके पीछे के कानूनी पहलुओं और दोनों पक्षों की तैयारियों को समझें।
विवाद की शुरुआत: 17 सितंबर की बोर्ड मीटिंग में क्या हुआ?
17 सितंबर 2026 (गुरुवार) को टाटा संस के बोर्ड की एक अहम बैठक हुई, जो करीब चार घंटे तक चली। इस बैठक में टाटा संस के मौजूदा चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन को अगले 5 वर्षों (तीसरे कार्यकाल) के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त करने का प्रस्ताव रखा गया। छह सदस्यों वाले टाटा संस के बोर्ड में वोटिंग के दौरान गंभीर मतभेद सामने आए। टाटा ट्रस्ट्स के नामित (Nominee) नोएल टाटा और वेणु श्रीनिवासन ने इस पुनर्नियुक्ति के खिलाफ वोट दिया। चेयरमैन चंद्रशेखरन के पक्ष में अन्य डायरेक्टर्स ने वोट दिया, जिससे मामला टाई (बराबर) हो गया। बैठक की अध्यक्षता कर रहे स्वतंत्र डायरेक्टर हरीश मनवानी ने अपने निर्णायक वोट यानी 'कास्टिंग वोट' का इस्तेमाल करते हुए चंद्रशेखरन के पक्ष में फैसला सुना दिया। इसके तुरंत बाद टाटा संस ने एक पन्ने का बयान जारी कर घोषणा कर दी कि बोर्ड ने बहुमत से चंद्रशेखरन को 5 साल के लिए फिर से चेयरमैन नियुक्त कर दिया है।
नोएल टाटा की आपत्ति: फैसला गैर-कानूनी और गुमराह करने वाला
बोर्ड मीटिंग के बाद नोएल टाटा ने टाटा संस के कंपनी सचिव सुप्रकाश मुखोपाध्याय को दो पत्र लिखकर बेहद कड़ा ऐतराज जताया और पूरी प्रक्रिया को शुरू से ही अमान्य करार दिया। नोएल टाटा के मुख्य आरोप निम्नलिखित हैं:-
- शर्तों का उल्लंघन:- बोर्ड बैठक में यह सहमति बनी थी कि जब तक कानूनी सलाह नहीं मिल जाती और आम बैठक (AGM) में शेयरधारक चंद्रशेखरन की डायरेक्टशिप को मंजूरी नहीं दे देते, तब तक इस फैसले की सार्वजनिक घोषणा नहीं की जाएगी। इसके बावजूद टाटा संस ने प्रेस नोट जारी कर दिया।
- बाजार को गुमराह करने का प्रयास:- नोएल टाटा ने लिखा कि इस तरह का गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार बोर्ड का अपमान है। बिना शर्तों के पूरा हुए सार्वजनिक रूप से निर्णय की घोषणा करने से शेयरधारकों, कर्मचारियों और निवेशकों में गलत संदेश जाता है।
- बैठक की रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखने की मांग:- उन्होंने कंपनी सचिव से यह सुनिश्चित करने को कहा कि 17 सितंबर की बैठक की कोई भी चर्चा या रिकॉर्डिंग हटाई या बदली न जाए।
नियम 118 बनाम नियम 121: टाटा संस के अनुच्छेद पर है विवाद?
इस पूरी कानूनी जंग की जड़ में टाटा संस के 'आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन' (Articles of Association - AoA) के दो नियम हैं:-
- आर्टिकल 118:- यह नियम विशेष रूप से टाटा संस के चेयरमैन के चयन और पुनर्नियुक्ति की प्रक्रिया को संचालित करता है। इसके तहत चेयरमैन के चुनाव के लिए टाटा ट्रस्ट्स के नामांकित डायरेक्टर्स का बहुमत से समर्थन अनिवार्य होता है।
- आर्टिकल 121:- यह नियम कंपनी के सामान्य और रणनीतिक मामलों से जुड़ा है।
नोएल टाटा का तर्क
नोएल टाटा ने याद दिलाया कि 2022 में जब चंद्रशेखरन को पहली बार दोबारा नियुक्त किया गया था, तब प्रक्रिया आर्टिकल 118 के तहत ही हुई थी। उन्होंने 11 फरवरी 2022 की बैठक के मिनट्स भी सबूत के तौर पर संलग्न किए। नोएल टाटा का कहना है कि 2026 में जानबूझकर आर्टिकल 121 का हवाला देकर ट्रस्ट के अधिकारों को दरकिनार किया गया।
टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष
टाटा ट्रस्ट्स के प्रवक्ता ने कहा कि जब तक ट्रस्ट के नामांकित निदेशकों का बहुमत समर्थन न हो, तब तक चेयरमैन की नियुक्ति का प्रस्ताव पास नहीं हो सकता। किसी भी चेयरमैन (जैसे हरीश मनवानी) का 'कास्टिंग वोट' ट्रस्ट के इस विशेषाधिकार को खत्म नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि एक अवैध कास्टिंग वोट किसी मरे हुए प्रस्ताव में जान नहीं फूंक सकता।
टाटा वर्सेस टाटा: टाटा संस के चेयरमैन पद पर छिड़ी आर-पार की जंग (तस्वीर-AI)
दो पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और वकीलों की राय का टकराव
बैठक के दौरान और बाद में देश के टॉप कानूनी विशेषज्ञों की राय को लेकर भी भारी घमासान देखने को मिला।
- डी.वाई. चंद्रचूड़ की राय:- नोएल टाटा ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) डॉ. डी.वाई. चंद्रचूड़ की कानूनी राय पेश की। जस्टिस चंद्रचूड़ की स्पष्ट राय थी कि टाटा संस के आर्टिकल्स के मुताबिक चेयरमैन का चुनाव केवल टाटा ट्रस्ट्स के नामांकित डॉयरेक्टर्स के बहुमत से ही हो सकता है। आरोप है कि बोर्ड ने इस राय को रिकॉर्ड पर लेने से भी इनकार कर दिया।
- सुदीप्तो सरकार की राय:- टाटा संस के बोर्ड ने इसके बजाय कोलकाता के वकील सुदीप्तो सरकार की कानूनी राय पर भरोसा किया, जिसके आधार पर हरीश मनवानी ने कास्टिंग वोट का इस्तेमाल किया।
शेयर बाजार की लिस्टिंग और शेयरधारक संप्रभुता का मुद्दा
विवाद का एक अन्य बड़ा कारण टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने (Public Listing) को लेकर बना मतभेद है:-
- चंद्रशेखरन और बोर्ड का रुख:- वे टाटा संस को पब्लिक लिमिटेड कंपनी बनाकर शेयर बाजार में लिस्ट कराने के पक्ष में हैं, ताकि पारदर्शिता आए और पेशेवर टैलेंट को जोड़ा जा सके।
- नोएल टाटा का रुख:- नोएल टाटा चाहते हैं कि टाटा संस एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी ही बनी रहे ताकि टाटा ट्रस्ट्स का नियंत्रण बना रहे।
प्रोक्सी एडवाइजरी फर्म IiAS (Institutional Investor Advisory Services) ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि बोर्ड का यह कदम 'शेयरधारक संप्रभुता' के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। किसी प्रमोटर या मुख्य शेयरधारक के खिलाफ बोर्ड का इस तरह का रुख कॉर्पोरेट इंडिया के इतिहास में एक अप्रत्याशित और चिंताजनक घटना है।
देश के सबसे दिग्गज वकीलों की फौज आमने-सामने
यह मामला अब केवल बोर्डरूम तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि देश की सबसे बड़ी अदालत की चौखट तक पहुंचने की पूरी तैयारी में है। दोनों पक्षों ने भारत के सबसे महंगे और नामी कानूनी सलाहकारों को अपनी टीम में शामिल कर लिया है।
टाटा ट्रस्ट्स और नोएल टाटा की लीगल टीम
- लॉ फर्म:- देश की टॉप लॉ फर्मों में से एक सिरिल अमरचंद मंगलदास (CAM) इस मामले को देख रही है। इसके प्रबंध साझेदार सिरिल श्रॉफ खुद इस केस की कमान संभाल रहे हैं।
- भारत वसाणी:- टाटा संस के 17 साल तक ग्रुप जनरल काउंसल रहे भारत वसाणी भी इस टीम का हिस्सा हैं।
- सीनियर एडवोकेट:- अदालत में पैरवी के लिए एस्पी चिनॉय, जनक द्वारकादास, डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और मुकुल रोहतगी को रिटेन किया गया है।
- सिंघवी का रुख:- वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि टाटा ट्रस्ट्स और टाटा संस के 100 साल पुराने रिश्ते को इस तरह तोड़ना अकल्पनीय है और शेयरधारकों के मौलिक अधिकारों को इस तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
टाटा संस और एन. चंद्रशेखरन की लीगल टीम
लॉ फर्म:-अनाग्राम पार्टनर्स (Anagram Partners) और उनके पार्टनर शुव मंडल (जो टाटा संस के पूर्व ग्रुप जनरल काउंसल रह चुके हैं) टाटा संस की पैरवी कर रहे हैं। शुव मंडल ने ही 2016 में साइरस मिस्त्री को हटाए जाने के बाद कानूनी लड़ाई में टाटा संस को जीत दिलाई थी।
सीनियर एडवोकेट:- भारत के पूर्व सॉलिसिटर जनरल हरीश साल्वे और वरिष्ठ अधिवक्ता रवि कदम को जोड़ा गया है।
साल्वे का रुख:- हरीश साल्वे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि टाटा संस को एक पब्लिक कंपनी बनना ही होगा, क्योंकि इतना बड़ा वैश्विक संस्थान केवल कुछ ट्रस्टियों के भरोसे नहीं चलाया जा सकता।
2016 में साइरस मिस्त्री बनाम टाटा संस के ऐतिहासिक विवाद के बाद, यह दूसरा मौका है जब टाटा ग्रुप के भीतर इतना बड़ा बवंडर उठा है। एक तरफ जहां टाटा ट्रस्ट्स इसे अपनी 66% मालिकाना हक और परंपराओं की रक्षा की लड़ाई मान रहा है, वहीं दूसरी तरफ टाटा संस का बोर्ड इसे कॉर्पोरेट गवर्नेंस और पेशेवर प्रबंधन का मामला बता रहा है। दोनों पक्षों द्वारा दिग्गज कानूनी धुरंधरों को तैनात किए जाने से यह साफ है कि यदि बातचीत से समाधान नहीं निकला, तो भारत का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट घराना एक लंबी और तीखी कानूनी लड़ाई का केंद्र बनने वाला है।
