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RBI ने बदला रुपये की रक्षा का तरीका! डॉलर बेचने की जगह जुटाने पर जोर, जुलाई में $41 अरब आए

RBI अब विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करने के बजाय अब नए डॉलर भारत लाने पर जोर दे रहा है। FCNR जमा, विदेशी कर्ज और सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश के जरिए रुपये को सहारा देने की कोशिश हो रही है।

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डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट को रोकने का तरीका बदला

RBI Rupee Saving : रुपये पर दबाव बढ़ने पर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) अब केवल विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर बाजार को संभालने की रणनीति पर निर्भर नहीं रहना चाहता। जून से सरकार और RBI ने ऐसी नई नीति अपनाई है, जिसका मकसद विदेशों से ज्यादा से ज्यादा डॉलर भारत लाना है, ताकि जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा भंडार पर कम दबाव पड़े।

क्या नई रणनीति कर रही काम?

अब इस रणनीति के तहत Foreign Currency Non-Resident (FCNR) जमा, विदेशी वाणिज्यिक कर्ज (ECB), बैंकों की विदेशी उधारी और सरकारी बॉन्ड में विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जा रहा है। 31 जुलाई तक इन उपायों के जरिए 40.81 अरब डॉलर जुटाए जा चुके हैं। इनमें अकेले FCNR जमा के जरिए 36.7 अरब डॉलर आए हैं, जबकि ECB स्वैप से 1.5 अरब डॉलर और बैंकों की विदेशी उधारी से 2.57 अरब डॉलर जुटाए गए हैं।

FCNR क्यों नहीं स्थायी हल?

FCNR जमा इस पूरी रणनीति का सबसे बड़ा आधार बनकर उभरा है। इसमें एनआरआई विदेशी मुद्रा में भारतीय बैंकों में जमा करते हैं। RBI की विशेष स्वैप सुविधा के कारण बैंकों को मुद्रा विनिमय जोखिम से राहत मिलती है, जिससे वे अधिक आकर्षक ब्याज दर देकर ज्यादा डॉलर जुटा पा रहे हैं। हालांकि, ये स्थायी पूंजी नहीं है क्योंकि जमा की अवधि पूरी होने पर यह रकम वापस करनी होगी।

बॉन्ड से बढ़ी डॉलर की आवक

सरकार ने विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए सरकारी बॉन्ड पर कर राहत और बाजार तक आसान पहुंच भी दी है। इसका असर यह हुआ कि जून से जुलाई के बीच विदेशी निवेशकों ने बड़ी मात्रा में सरकारी बॉन्ड खरीदे, जिससे रुपये की मांग बढ़ी और सरकार के लिए कर्ज जुटाना भी आसान हुआ। हालांकि, इस तरह का निवेश वैश्विक परिस्थितियों के बदलते ही तेजी से बाहर भी निकल सकता है, इसलिए इसे पूरी तरह स्थायी नहीं माना जा सकता।

हर बार नहीं बेचना होगा डॉलर

विश्लेषण के मुताबिक, नई रणनीति का सबसे बड़ा फायदा यह है कि RBI को हर बार रुपये पर दबाव बढ़ने पर विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचने की जरूरत कम पड़ेगी। इससे विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहेगा और अचानक पैदा होने वाले बाहरी झटकों से निपटने की क्षमता बढ़ेगी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह स्थायी समाधान नहीं है। FCNR जमा की अवधि पूरी होगी, विदेशी कर्ज चुकाना होगा और विदेशी निवेशक कभी भी पैसा निकाल सकते हैं। ऐसे में लंबे समय में निर्यात बढ़ाना, स्थायी विदेशी निवेश आकर्षित करना और उत्पादक क्षेत्रों में विदेशी पूंजी का इस्तेमाल ही इस रणनीति की असली सफलता तय करेगा।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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