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रुपये से लेकर डॉलर तक... कौन तय करता है दुनियाभर में करेंसी की वैल्यू?

दुनियाभर की अर्थव्यवस्था में करेंसी (मुद्रा) का उतार-चढ़ाव किसी पहेली से कम नहीं है। अक्सर मन में यह सवाल आता है कि आखिर वह कौन सी ताकत है जो तय करती है कि आज एक डॉलर के बदले आपको कितने रुपये मिलेंगे? क्या इसके पीछे IMF या वर्ल्ड बैंक जैसी कोई बड़ी संस्था है, या फिर यह पूरी तरह बाजार के भरोसे है? आइए जानते हैं कि ग्लोबल फॉरेक्स मार्केट कैसे काम करता है और किसके हाथ में है असली 'कंट्रोल' की चाबी।

Currency Rates

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दुनियाभर की अर्थव्यवस्था में करेंसी (मुद्रा) का रोल सबसे अहम होता है। कभी हम सुनते हैं कि डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत हो गया है, तो कभी खबर आती है कि रुपया अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर वह कौन है जो यह तय करता है कि एक डॉलर के बदले आपको कितने रुपये मिलेंगे? क्या इसके पीछे कोई एक इंसान है, कोई संस्था है या कोई अदृश्य ताकत? करेंसी की वैल्यू तय होने की प्रक्रिया जितनी पेचीदा दिखती है, उतनी ही दिलचस्प भी है। यह सब कुछ डिमांड, सप्लाई और वैश्विक राजनीति के एक बड़े खेल का हिस्सा है।

डिमांड और सप्लाई का खेल

ज्यादातर देशों में करेंसी की वैल्यू 'फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट' (Floating Exchange Rate) सिस्टम के जरिए तय होती है। इसे आसान भाषा में बाजार की ताकतें यानी 'डिमांड' (मांग) और 'सप्लाई' (आपूर्ति) कह सकते हैं। जिस तरह बाजार में किसी फल या सब्जी की मांग बढ़ती है तो उसकी कीमत बढ़ जाती है, ठीक वैसे ही जब किसी देश की करेंसी की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ती है, तो उसकी वैल्यू भी बढ़ जाती है। मान लीजिए, अगर दुनिया के ज्यादातर देश भारत से सामान खरीदना चाहते हैं, तो उन्हें भुगतान करने के लिए रुपयों की जरूरत होगी। इससे रुपये की मांग बढ़ेगी और डॉलर के मुकाबले रुपया मजबूत होगा। इसके विपरीत, अगर मांग कम होती है, तो वैल्यू गिर जाती है।

RBI का रोल

भले ही बाजार वैल्यू तय करता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सरकारों का इस पर कोई नियंत्रण नहीं होता। हर देश का केंद्रीय बैंक (जैसे भारत में RBI और अमेरिका में Federal Reserve) अपनी करेंसी की स्थिरता पर नजर रखता है। जब रुपया बहुत तेजी से गिरने लगता है, तो आरबीआई अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) से डॉलर बेचकर बाजार में रुपयों की सप्लाई को संतुलित करता है ताकि रुपये को सहारा मिल सके। इसी तरह, देश की ब्याज दरें भी करेंसी की वैल्यू को प्रभावित करती हैं। अगर आरबीआई ब्याज दरें बढ़ाता है, तो विदेशी निवेशक भारत में निवेश करना ज्यादा फायदेमंद समझते हैं, जिससे रुपये की मांग बढ़ती है।

किसकी है बादशाहत?

किसी भी देश की करेंसी उसकी अर्थव्यवस्था की सेहत का आईना होती है। जिस देश में राजनीतिक स्थिरता होती है, जीडीपी ग्रोथ अच्छी होती है और महंगाई काबू में रहती है, उस देश की करेंसी पर दुनिया भरोसा करती है। इसके उलट, युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता या भारी कर्ज वाले देशों की करेंसी की वैल्यू तेजी से गिरने लगती है। डॉलर की मजबूती का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और दुनियाभर का ज्यादातर व्यापार डॉलर में ही होता है। इसे 'रिजर्व करेंसी' माना जाता है, इसलिए संकट के समय में भी लोग डॉलर पर ही भरोसा करते हैं।

विदेशी निवेश और व्यापार घाटा

करेंसी की वैल्यू तय करने में विदेशी निवेश (FDI और FPI) का भी बड़ा हाथ होता है। जब विदेशी कंपनियां भारत में पैसा लगाती हैं, तो वे डॉलर लेकर आती हैं और उसे रुपये में बदलती हैं, जिससे रुपया मजबूत होता है। इसके साथ ही 'ट्रेड डेफिसिट' (व्यापार घाटा) भी अहम है। अगर कोई देश निर्यात (Export) कम और आयात (Import) ज्यादा करता है, तो उसे भुगतान के लिए विदेशी मुद्रा की ज्यादा जरूरत पड़ती है, जिससे उसकी अपनी करेंसी कमजोर हो जाती है।

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रिचा त्रिपाठी
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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