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कैसे 100 GW परमाणु ऊर्जा से भारत बनेगा AI सुपरपावर, क्या दोस्त रूस फिर आएगा काम

भारत को आगे बढ़ने के लिए अथाह स्वच्छ ऊर्जा की जरूरत है। सोलर, विंड और हाइड्रो पावर के साथ ही न्यूक्लियर एनर्जी भी भारत के लिए ऊर्जा के प्रमुख विकल्पों में शामिल है, जो देश के कायापलट में सक्षम है।

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देश को AI के साथ आगे बढ़ाने के लिए चाहिए अथाह ऊर्जा
Authored by: Yateendra Lawaniya
Updated Aug 17, 2026, 15:23 IST
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मजबूत इकोनॉमी, मजबूत सेना के साथ ही एक देश को सुपरपावर बनने के लिए ऊर्जा के लिहाज से आत्मनिर्भर होना अहम है। दुनिया अब AI युग में है, जहां इंसानों से ज्यादा पानी और बिजली की जरूरत AI को पड़ने लगी है। अगली सदी में ही देश दुनिया पर राज करेंगे, जो AI और डाटा की रेस में आगे रहेंगे। अगर भारत को इस दौड़ में आगे जाना है, तो AI और Data Centers के लिए अथाह बिजली की आपूर्ति करनी होगी। देश के नीति निर्माता इस जरूरत को समझते हैं।

यही वजह है कि भारत अगले दो दशक में सिर्फ परमाणु बिजली उत्पादन बढ़ाने की तैयारी नहीं कर रहा, बल्कि अपनी बढ़ती डिजिटल और AI अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा पावर बेस तैयार कर रहा है। सरकार ने 2047 तक देश की परमाणु बिजली क्षमता को मौजूदा करीब 8.78 GW से बढ़ाकर 100 GW करने का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य पूरा हुआ तो परमाणु ऊर्जा भारत के पावर सिस्टम में कहीं बड़ी भूमिका निभाएगी। सवाल यह है कि इसका AI से क्या संबंध है और इस पूरी दौड़ में रूस की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण हो सकती है?

AI को आखिर इतनी बिजली क्यों चाहिए?

AI की असली ताकत सिर्फ चिप और सॉफ्टवेयर में नहीं है। इसके पीछे विशाल डेटा सेंटर हैं, जहां हजारों-लाखों शक्तिशाली चिप लगातार काम करती हैं। इन सर्वरों को चलाने के साथ-साथ उन्हें ठंडा रखने के लिए भी बहुत बड़ी मात्रा में बिजली चाहिए। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के मुताबिक दुनिया के डेटा सेंटरों की बिजली खपत 2030 तक दोगुने से ज्यादा होकर करीब 945 TWh तक पहुंच सकती है। AI इस बढ़ोतरी का सबसे बड़ा कारण है। भारत में भी बिजली की मांग तेजी से बढ़ रही है। IEA का अनुमान है कि 2026 से 2030 के बीच भारत की बिजली मांग औसतन 6.4% सालाना की दर से बढ़ सकती है। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में डेटा सेंटर, मैन्युफैक्चरिंग, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और बाकी डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर सभी को ज्यादा बिजली चाहिए होगी। यहीं परमाणु ऊर्जा की अहमियत सामने आती है।

AI के लिए परमाणु बिजली क्यों खास है?

AI डेटा सेंटर को सिर्फ बहुत ज्यादा बिजली नहीं चाहिए। उसे लगातार और भरोसेमंद बिजली चाहिए। एक बड़ा डेटा सेंटर हर समय चल सकता है। उसे यह भरोसा चाहिए कि बिजली सिर्फ दिन में या मौसम अनुकूल होने पर ही उपलब्ध नहीं होगी। सोलर और विंड ऊर्जा तेजी से बढ़ रही हैं और भारत की बिजली जरूरत पूरी करने में इनकी भूमिका बहुत बड़ी होगी। लेकिन इनकी उपलब्धता मौसम और समय पर निर्भर करती है। परमाणु बिजली का फायदा यह है कि यह 24 घंटे बेसलोड बिजली दे सकती है। भारत सरकार भी परमाणु ऊर्जा को इसी वजह से भरोसेमंद बेसलोड स्रोत मानती है।इसका मतलब यह नहीं कि AI सिर्फ परमाणु बिजली पर चलेगा। असली मॉडल सोलर, विंड, हाइड्रो, गैस, स्टोरेज और न्यूक्लियर इन सभी का मिश्रण होगा। लेकिन जब बिजली की मांग बहुत बड़ी और लगातार हो, तब न्यूक्लियर एक मजबूत आधार दे सकता है।

100 GW का लक्ष्य कितना बड़ा है?

आज भारत की स्थापित परमाणु क्षमता करीब 8.78 GW है। सरकार के रोडमैप के मुताबिक इसे 2031-32 तक करीब 22 GW और 2047 तक 100 GW तक पहुंचाने की योजना है। इसमें NPCIL अकेले करीब 54 GW क्षमता तैयार करने की दिशा में काम करेगा। बाकी करीब 46 GW क्षमता दूसरे सरकारी उपक्रमों, राज्य सरकारों, निजी क्षेत्र और संयुक्त उपक्रमों के जरिए विकसित की जानी है। यानी भारत के लिए यह केवल कुछ बड़े परमाणु संयंत्र बनाने का प्रोजेक्ट नहीं है। यह पूरे न्यूक्लियर सेक्टर को तेजी से विस्तार देने की योजना है। सरकार ने छोटे मॉड्यूलर रिएक्टर यानी SMR पर भी काम शुरू किया है। भारत कम से कम पांच स्वदेशी SMR को 2033 तक विकसित और तैनात करने का लक्ष्य रखता है। इनका इस्तेमाल ऊर्जा-गहन उद्योगों, पुराने थर्मल पावर प्लांट की जगह और दूरदराज के इलाकों में किया जा सकता है। भविष्य में यही मॉडल कुछ बड़े औद्योगिक क्लस्टर या डेटा सेंटरों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

रूस फिर क्यों जरूरी हो सकता है?

भारत ने परमाणु क्षेत्र में अपनी स्वदेशी क्षमता काफी मजबूत की है। देश 700 MW के स्वदेशी PHWR यानी प्रेसराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। इसके साथ ही सरकार ने बड़े विदेशी रिएक्टरों को भी ग्रीनफील्ड साइट पर लगाने की रणनीति रखी है। यहीं रूस की भूमिका भी अहम हो जाती है। कुडनकुलम में रूस ने VVER-1000 रिएक्टर लगाए गए हैं। रूसी कंपनी TVEL लंबे समय से इन रिएक्टरों के लिए परमाणु ईंधन सप्लाई कर रही है। 2022 से TVEL ने TVS-2M ईंधन की सप्लाई शुरू की, जिससे कुडनकुलम के रिएक्टरों के फ्यूल साइकल को 12 महीने से बढ़ाकर 18 महीने करने में मदद मिली। इसका मतलब है कि ईंधन बदलने के लिए यूनिट को कम बार रोकना पड़ता है और लंबे समय तक बिजली उत्पादन किया जा सकता है।

कुडनकुलम की नई यूनिट 3 और 4 के लिए भी TVEL ने पूरे ऑपरेशन साइकल के लिए ईंधन सप्लाई का कॉन्ट्रैक्ट लिया है और इन यूनिटों को शुरुआत से 18 महीने के फ्यूल साइकल पर चलाने की योजना है। यानी रूस के पास सिर्फ रिएक्टर बेचने का अनुभव नहीं है। उसके पास रिएक्टर, ईंधन और ऑपरेशन के बीच लंबे समय का व्यावहारिक अनुभव भी है।

लागत में भी रूस बन सकता है मजबूत विकल्प

परमाणु बिजली की सबसे बड़ी चुनौती ईंधन की कीमत नहीं, बल्कि शुरुआत में होने वाला भारी निवेश है। रिएक्टर बनाना, सुरक्षा सिस्टम तैयार करना, साइट विकसित करना और प्रोजेक्ट पूरा करना बहुत महंगा होता है। यही वजह है कि अगर किसी विदेशी रिएक्टर की तकनीक भारत में कम लागत पर लग सकती है, तो वह बड़े पैमाने पर क्षमता बढ़ाने में फायदा दे सकती है। रूस के VVER रिएक्टरों को लेकर भारतीय परमाणु उद्योग में लंबे समय से लागत और स्थानीयकरण के नजरिए से चर्चा होती रही है। हालांकि किसी भी नई परियोजना की वास्तविक लागत जमीन, वित्तपोषण, निर्माण अवधि, स्थानीयकरण और सुरक्षा मानकों पर निर्भर करेगी। इसलिए यह कहना अभी जल्दबाजी होगी कि रूस हर मामले में अमेरिका या फ्रांस से सस्ता साबित होगा। लेकिन रूस के साथ भारत का पुराना परमाणु सहयोग उसे एक महत्वपूर्ण शुरुआती बढ़त जरूर देता है।

भारत को परमाणु ऊर्जा की जरूरत

भारत को परमाणु ऊर्जा की जरूरत

क्या 100 GW से भारत सचमुच AI सुपरपावर बन जाएगा?

सिर्फ 100 GW परमाणु क्षमता से भारत AI सुपरपावर नहीं बन जाएगा। AI की ताकत के लिए सस्ती बिजली के साथ हाई-एंड चिप, डेटा सेंटर, फाइबर नेटवर्क, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर, कुशल इंजीनियर और मजबूत डिजिटल कंपनियां भी चाहिए। लेकिन पर्याप्त और लगातार उपलब्ध बिजली के बिना इनमें से कोई भी चीज बड़े पैमाने पर नहीं चल सकती। यही वजह है कि भारत का परमाणु मिशन AI रणनीति से अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाता है। आने वाले वर्षों में जिस देश के पास चिप + डेटा सेंटर + सस्ती और भरोसेमंद बिजली का मजबूत कॉम्बिनेशन होगा, वह AI की रेस में ज्यादा तेजी से आगे बढ़ सकेगा। भारत ने 100 GW का लक्ष्य इसलिए केवल बिजली बढ़ाने के लिए नहीं रखा है। इसके पीछे ऊर्जा सुरक्षा, औद्योगिक विकास और नेट जीरो लक्ष्य के साथ भविष्य की अर्थव्यवस्था की जरूरतें भी हैं।

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