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भारत में नहीं, दुनिया के इस देश में मौजूद है सबसे बड़ा मंदिर, इस राजा ने करवाया था निर्माण

दुनिया भर में फैले मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि इतिहास और संस्कृति की अमूल्य धरोहर भी हैं। समय के साथ धर्म, परंपराएं और स्थापत्य कला ने भव्य मंदिरों का रूप लिया, जो आज भी शोध और चर्चा का विषय बने हुए हैं। ऐसा ही एक अद्भुत मंदिर, जो भारत से दूर होते हुए भी हिंदू मान्यताओं से गहराई से जुड़ा है। ऐसे में आइए जानें इसके बारे में।

Largest Hindu Temple in World

दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर

Photo : टाइम्स नाउ डिजिटल

World Largest Temple: देश-विदेश में लाखों-करोड़ों मंदिर हैं, जो किसी प्रांत की सांस्कृतिक और धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं। मानव सभ्यता जैसे-जैसे विकसित हुई धर्म और परंपराएं भी वैसे ही विकसित और गूढ़ होती चली गईं। हर मंदिर किसी न किसी राजा या ऐतिहासिक तथ्य से जुड़ा है और इनकी वास्तुकला भी युगों-युगों तक चर्चा का विषय बनी रहती है। आज हम जिस मंदिर की बात कर रहे हैं वो भले ही भारत से हजारों किलोमीटर दूर हो लेकिन इसका जुड़ाव हिंदू पौराणिक मान्यताओं और भारतीय इतिहास से जुड़ा है। हम बात कर रहे हैं दुनिया के सबसे बड़े मंदिर या टेंपल स्ट्रक्चर के बारे जिसे अंगकोर वाट कहा जाता है। ऐसे में आज हम आपको इसी के बारे में बताएंगे।

Where is Angkor Wat?

कहां है अंगकोर वाट?

कहां है अंगकोर वाट?

लगभग 400 एकड़ में फैला अंगकोर वट, कंबोडिया के सिएम रीप के पास अंगकोर में स्थित एक प्राचीन मंदिर परिसर है, जिसे 12वीं शताब्दी में खमेर साम्राज्य के राजा सूर्यवर्मन द्वितीय (शासनकाल 1113–लगभग 1150) ने बनवाया था। यह विशाल धार्मिक परिसर एक हजार से अधिक इमारतों का संग्रह है और इसे दुनिया के प्रमुख सांस्कृतिक आश्चर्यों में से एक माना जाता है। अंगकोर वट दुनिया की सबसे बड़ी धार्मिक संरचना है, जो लगभग 400 एकड़ क्षेत्र में फैली हुई है और खमेर वास्तुकला की शानदार उपलब्धि को दर्शाती है।

कितने सालों में हुआ मंदिर का निर्माण?

अंगकोर शहर खमेर (Khmer Kingdom) राजा के वंश का शाही केंद्र रहा, जिसने दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास के सबसे बड़े, समृद्ध और विकसित साम्राज्यों में से एक पर शासन किया। 9वीं शताब्दी के अंत से लेकर 13वीं शताब्दी की शुरुआत तक यहां कई निर्माण कार्य किए गए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण अंगकोर वट था। इसे सूर्यवर्मन द्वितीय ने एक विशाल अंत्येष्टि संबंधी मंदिर के रूप में बनवाया था, जिसमें उनकी अस्थियां रखी जानी थीं। माना जाता है कि इसके निर्माण में लगभग तीन दशकों का समय लगा। आज, यह अंगकोर आर्कियोलॉजिकल पार्क का ताज है और 14 दिसंबर 1992 से UNESCO वर्ल्ड हेरिटेज साइट है।

Angkor Wat's association with Hinduism

अंगकोर वाट का हिंदू धर्म से जुड़ाव

किस देवता को समर्पित है मंदिर?

अंगकोर वट की प्रारंभिक धार्मिक कलाकृतियां पूर्णतः हिंदू धर्म से प्रेरित थीं और यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित किया गया था। इसके मध्य स्थित पांच प्रमुख शिखर हिंदू मान्यताओं के अनुसार देवताओं के निवास स्थान माने जाने वाले मेरु पर्वत की चोटियों का प्रतीक हैं। पौराणिक कथाओं में मेरु पर्वत को चारों ओर से महासागर से घिरा हुआ बताया गया है और मंदिर परिसर के चारों ओर बनी विशाल खाई उसी समुद्र का संकेत देती है जो संसार की सीमा पर स्थित माना जाता है।

मंदिर की वास्तुकला

Britannica.com के मुताबिक, लगभग 617 फुट (188 मीटर) लंबा एक पुल इस स्थल तक पहुंचने का लोगों को रास्ता देता है। मंदिर तक पहुंचने के लिए तीन मंडपों (गैलरियों) से होकर गुजरना पड़ता है, जिन्हें पत्थरों से बनी पक्की पगडंडियां अलग करती हैं। मंदिर की दीवारों पर उत्कृष्ट गुणवत्ता की उभरी हुई नक्काशी (बास-रिलीफ) की गई है, जिनमें हिंदू देवताओं, प्राचीन खमेर जीवन के दृश्य, तथा महाभारत और रामायण से संबंधित प्रसंगों का सुंदर चित्रण किया गया है।

Sculptures of Angkor Wat

अंगकोर वाट की मूर्तियां

अंगकोर पर बौद्ध धर्म का प्रभाव

1177 में वर्तमान वियतनाम के चाम लोगों द्वारा अंगकोर पर आक्रमण किए जाने के बाद, राजा जयवर्मन सप्तम (King Jayavarman VII) (शासनकाल 1181–लगभग 1220) ने यह मान लिया कि हिंदू देवता उनकी रक्षा करने में असफल रहे। इसके बाद उन्होंने पास ही एक नई राजधानी बसाई, जिसे अंगकोर थॉम कहा गया और उसे बौद्ध धर्म को समर्पित किया। समय के साथ अंगकोर वट भी एक बौद्ध उपासना स्थल में परिवर्तित हो गया और यहां की कई हिंदू मूर्तियों तथा नक्काशियों को बौद्ध कलाकृतियों से बदल दिया गया।

यूरोपीय यात्रियों के लिए आकर्षण का केंद्र

15वीं शताब्दी के प्रारंभ में अंगकोर को त्याग दिया गया, लेकिन थेरवाद बौद्ध भिक्षु वहां बने रहे। उनकी मौजूदगी के कारण अंगकोर वट एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल के रूप में जीवित रहा और यूरोपीय यात्रियों को भी आकर्षित करता रहा। 1863 में फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन (French Colonial Regime) स्थापित होने के बाद, फ्रांसीसी अन्वेषक हेनरी मौहॉट (Henri Mouhot) ने इसे पश्चिमी जगत के लिए पुनः परिचित कराया।

मंदिर के संरक्षण कार्य

20वीं शताब्दी में मंदिर के संरक्षण और मरम्मत के लिए कई पुनर्स्थापन परियोजनाएं शुरू की गईं, लेकिन 1970 के दशक में कंबोडिया की राजनीतिक अशांति के कारण यह कार्य रुक गया। 1980 के दशक के मध्य में जब संरक्षण कार्य दोबारा शुरू हुआ, तब तक काफी क्षति हो चुकी थी और कई हिस्सों को अलग कर फिर से बनाया गया। 1992 में यूनेस्को ने अंगकोर परिसर (जिसमें अंगकोर वट शामिल है) को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया और उसे “संकटग्रस्त विश्व धरोहर” (World Heritage in Danger) सूची में भी रखा। निरंतर संरक्षण प्रयासों के चलते 2004 में इसे इस खतरे की सूची से हटा दिया गया। आज अंगकोर वट दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है और एक लोकप्रिय पर्यटन आकर्षण भी है। इसकी छवि कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी अंकित है।

 Nilesh Dwivedi
Nilesh Dwivedi author

निलेश द्विवेदी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में काम कर रहे हैं। वे शहरों से जुड़ी लोकल घटनाएं, क्राइम, राजनीति, इंफ्रास्ट्रक्चर और राज्यवार अप... और देखें

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