Ajab Gajab News: पाकिस्तान में दातुन को आमतौर पर मिसवाक कहा जाता है। उर्दू में इसे “मिसवाक” ही लिखा और बोला जाता है। यह पेड़ की एक पतली टहनी होती है, जिससे लोग दांत साफ करते हैं। भारत में इसे दातुन या दातौन कहा जाता है, जो अक्सर नीम या बबूल की टहनी से बनाई जाती है। पाकिस्तान में भी यही परंपरा है, लेकिन वहां इसे खास तौर पर मिसवाक के नाम से जाना जाता है। पाकिस्तान में सबसे ज्यादा पीलू के पेड़ की लकड़ी से बनी मिसवाक इस्तेमाल की जाती है। इसे लोग प्राकृतिक और फायदेमंद मानते हैं। इस्लामी परंपरा में भी मिसवाक का खास महत्व है।
रमजान के महीने में बढ़ जाती है मांग
माना जाता है कि पैगंबर मुहम्मद ने दांतों की सफाई के लिए मिसवाक को पसंद किया और इसकी तारीफ की। इसी वजह से कई लोग इसे सुन्नत समझकर अपनाते हैं। रमजान के महीने में इसकी मांग और भी बढ़ जाती है, क्योंकि रोजेदार नमाज से पहले इसका उपयोग करते हैं। मिसवाक के कई स्वास्थ्य लाभ बताए जाते हैं। यह दांतों को साफ रखने में मदद करती है और मुंह की बदबू दूर करती है। इसमें प्राकृतिक तत्व होते हैं जो मसूड़ों को मजबूत बनाते हैं। नियमित उपयोग से दांतों पर जमा गंदगी कम होती है और मुंह ताजा महसूस होता है। इसमें किसी तरह का केमिकल नहीं होता, इसलिए कई लोग इसे सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प मानते हैं।
भारत में नीम की दातुन भी बहुत लोकप्रिय है। नीम में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं, जो दांत और मसूड़ों के लिए अच्छे माने जाते हैं। नीम की दातुन करने से मुंह के कीटाणु कम होते हैं और दांत मजबूत बनते हैं। ग्रामीण इलाकों में आज भी लोग सुबह उठकर नीम या बबूल की दातुन करते हैं। कुछ जगहों पर मिसवाक को सिवाक या अराक भी कहा जाता है, लेकिन रोजमर्रा की भाषा में “मिसवाक” शब्द ज्यादा प्रचलित है। कुल मिलाकर, चाहे भारत हो या पाकिस्तान, दातुन या मिसवाक दांतों की सफाई का एक पुराना और प्राकृतिक तरीका है, जिसे आज भी लाखों लोग अपनाते हैं।
