Char Dham Yatra Update: चारधाम यात्रा का इंतजार कर रहे श्रद्धालुओं के लिए अच्छी खबर सामने आई है। बता दें कि 23 अप्रैल 2026 से बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। हर साल की तरह इस बार भी कपाट खुलने से पहले भगवान बदरी-विशाल के अभिषेक के लिए पवित्र तिलों का तेल तैयार किया गया है। यह परंपरा टिहरी राजपरिवार की देखरेख में पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई गई। आस्था और परंपरा से जुड़ी यह खास प्रक्रिया चारधाम यात्रा की शुरुआत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है और भक्तों में खास उत्साह देखने को मिल रहा है।
बद्रीनाथ धाम गेट ऑपनिंग - Badrinath Dham Gate Opening
नरेंद्रनगर राजमहल में निभाई गई परंपरा
उत्तराखंड के नरेंद्रनगर स्थित राजमहल में भगवान बदरी-विशाल के अभिषेक के लिए तिलों का तेल तैयार किया गया। यह परंपरा कई पीढ़ियों से टिहरी राजपरिवार निभाता आ रहा है। मान्यता है कि कपाट खुलने से पहले भगवान के अभिषेक में इस्तेमाल होने वाला यह तेल बेहद पवित्र माना जाता है और इसे खास विधि से तैयार किया जाता है।
सुहागिन महिलाओं ने श्रद्धा से तैयार किया तेल
महारानी माला राज्य लक्ष्मी शाह की अगुआई में सुहागिन महिलाओं ने इस धार्मिक परंपरा को निभाया। तिल के तेल को खास जड़ी-बूटियों के साथ पकाकर शुद्ध किया गया। आयुर्वेद में तिल के तेल को शुद्ध और पौष्टिक माना जाता है, इसलिए पूजा-अर्चना में इसका विशेष महत्व बताया जाता है। तैयार तेल को चांदी के कलश में भरकर विधिवत पूजा की गई।
‘गाडू घड़ा’ में भरकर बदरीनाथ धाम के लिए रवाना
पूजा के बाद इस पवित्र तेल कलश को ‘गाडू घड़ा’ कहा जाता है। डिमरी केंद्रीय धार्मिक पंचायत और राजपरिवार की मौजूदगी में धार्मिक रीति-रिवाज पूरे किए गए। इसके बाद भव्य शोभायात्रा के साथ इस पवित्र कलश को बदरीनाथ धाम के लिए रवाना किया गया, जहां भगवान बदरी-विशाल का अभिषेक किया जाएगा।
23 अप्रैल सुबह 6:15 बजे खुलेंगे कपाट
धार्मिक पंचांग के अनुसार 23 अप्रैल 2026 को सुबह 6 बजकर 15 मिनट पर बदरीनाथ धाम के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाएंगे। कपाट खुलने के साथ ही चारधाम यात्रा का उत्साह और बढ़ जाता है। हर साल लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं।
इस अवसर पर महारानी माला राज्य लक्ष्मी शाह ने भगवान बदरीनाथ से देश और प्रदेश की खुशहाली, शांति और समृद्धि की कामना की। चारधाम यात्रा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति और परंपरा की पहचान भी है।
