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वो यात्री: वास्को द गामा का हैरान कर देने वाला सफर, जिसने बदल दिया था दुनिया का नक्शा

Great travellers of the world (Vasco da Gama Travelogue): वास्को द गामा का नाम आज बड़े खोजकर्ताओं में लिया जाता है। वास्को द गामा की कहानी सिर्फ खोज की नहीं है, बल्कि ताकत, राजनीति और साम्राज्य बनाने की भी है।

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वास्को द गामा का हैरान कर देने वाला सफर
Authored by: prabhat sharma
Updated Apr 10, 2026, 13:55 IST

Great travellers of the world (Vasco da Gama Travelogue): जब स्कूल के बच्चे खोज के दौर के बारे में पढ़ते हैं तो उन्हें कुछ यूरोपीय नाविकों के नाम याद करने होते हैं। ये वो लोग थे जो नई-नई जगहों की खोज करने के लिए अजीब से कपड़े और टोपी पहनकर अनजान समुद्रों में निकल जाते थे। इन्हीं में एक नाम आता है वास्को द गामा का। ये एक पुर्तगाली खोजकर्ता थे, जिन्होंने सबसे पहले यूरोप से अफ्रीका के दक्षिणी सिरे को पार करते हुए भारत तक समुद्री रास्ता ढूंढ निकाला था। सीधे शब्दों में समझें तो, उन्होंने वो रास्ता खोजा जिससे यूरोप वाले सीधे भारत तक पहुंच सके और यही बात उन्हें इतिहास में खास बनाती है।

बचपन और शुरुआती जिंदगी

पुर्तगाल के एक छोटे से शहर साइनेस में करीब 1460–1469 के बीच वास्को द गामा का जन्म हुआ था। पिता राजा के दरबार में काम करते थे, इसलिए उन्हें अच्छी पढ़ाई का मौका मिला। बचपन से ही उनका झुकाव समुद्र की तरफ था। जहाजों को देखना, उनके बारे में सीखना ये सब उनका शौक बन गया। उन्होंने गणित और नेविगेशन भी सीखा, जो बाद में उनके बहुत काम आया। मजेदार बात ये है कि सिर्फ 20 साल की उम्र में ही वो जहाज के कप्तान बन गए थे।

सबसे बड़ी यात्रा

वास्को द गामा की सबसे बड़ी यात्रा 8 जुलाई 1497 को शुरू हुई थी। वो करीब 170 लोगों की टीम और 4 जहाजों के साथ लिस्बन (पुर्तगाल) से निकले थे। उनके बेड़े में अलग-अलग जहाज थे जिसमें 'साओ गैब्रियल'का कमांड खुद उनके पास था, जबकि उनके भाई पाउलो द गामा 'साओ राफेल' जहाज संभाल रहे थे। इसके अलावा दो और जहाज भी थे।

वास्को द गामा की सबसे बड़ी यात्रा

वास्को द गामा की सबसे बड़ी यात्रा

आसान नहीं था सफर

शुरुआत में वे कैनरी द्वीप और फिर केप वर्डे पहुंचे। वहां कुछ दिन रुकने के बाद उन्होंने आगे का सफर शुरू किया। रास्ते में बहुत तेज तूफान और खतरनाक समुद्री धाराएं मिलीं, इसलिए उन्हें अपना रास्ता थोड़ा बदलकर दक्षिण अटलांटिक की तरफ जाना पड़ा। काफी मुश्किलों के बाद 22 नवंबर को उन्होंने अफ्रीका के सबसे खतरनाक हिस्से 'केप ऑफ गुड होप' को पार किया और फिर दक्षिण अफ्रीका के मोसेल बे में रुके।

आगे बढ़ते हुए वे अफ्रीका के अलग-अलग इलाकों जैसे मोजाम्बिक और केन्या पहुंचे। लेकिन यहां एक बड़ी समस्या आ गई उनकी टीम के कई लोग स्कर्वी नाम की बीमारी से बीमार पड़ गए, जो विटामिन C की कमी से होती है। फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और आगे बढ़ते रहे।

भारत पहुंचने का ऐतिहासिक पल

भारत पहुंचने का ऐतिहासिक पल ज्यादा दूर नहीं था। मालिंदी से उन्होंने एक पायलट लिया और करीब 23 दिन समुद्र में सफर करने के बाद 20 मई 1498 को वे भारत पहुंच गए। वे कालीकट (आज का कोझिकोड) के पास उतरे और वहां के राजा से मिले। हालांकि, राजा उनके लाए गए तोहफों से ज्यादा प्रभावित नहीं हुए, फिर भी वास्को द गामा ने वहां कुछ महीने बिताए, व्यापार किया और भारतीय संस्कृति को समझा।

वास्को द गामा का सफर नहीं था आसान

वास्को द गामा का सफर नहीं था आसान

मुश्किल रही वापसी

अगस्त में उन्होंने भारत से वापसी शुरू की। रास्ते में फिर से बीमारी और मुश्किलों का सामना करना पड़ा। हालात इतने खराब हो गए कि उन्हें अपना एक जहाज जलाना पड़ा ताकि बीमारी ज्यादा ना फैले। कई लोगों की जान भी चली गई। तमाम मुश्किलों को पारकर वास्को दा गामा सितंबर 1499 में वापस पुर्तगाल पहुंचे जहां उनकी बड़ी कामयाबी से राजा बहुत खुश हुए। उन्हें खूब इनाम मिला और एडमिरल का बड़ा पद भी दिया गया।

बाद की यात्राएं

वास्को द गामा की बाद की यात्राओं में उनका व्यवहार पहले जैसा शांत नहीं था। 1502 में उन्होंने फिर से 10 जहाजों के बड़े बेड़े के साथ यात्रा शुरू की। रास्ते में वे अफ्रीका के कई इलाकों में रुके वहां उन्होंने स्थानीय शासकों को डराकर पुर्तगाल के राजा के प्रति वफादारी की कसम दिलवाई।

इसके अलावा जब वह भारत के कालीकट पहुंचे, तो उन्होंने वहां के बंदरगाह पर हमला कर दिया और कई मुस्लिम व्यापारियों को मार दिया। बाद में कोचीन में भी उन्होंने अरब जहाजों से लड़ाई की और उन्हें भगा दिया। सीधे शब्दों में समझें तो वास्को द गामा अब सिर्फ खोजकर्ता नहीं रहे थे, बल्कि वो पुर्तगाल का साम्राज्य फैलाने में लगे हुए थे और इसके लिए उन्होंने काफी सख्ती और हिंसा का सहारा लिया।

वास्को द गामा की यात्राएं

वास्को द गामा की यात्राएं

भारत वापसी

पुर्तगाल के नए राजा ने वास्को द गामा को भारत का वायसराय (गवर्नर) बनाकर भेजा था। 1524 में वे फिर भारत आए और गोवा पहुंचे। गोवा पहुंचकर उन्होंने यहां के हालात को काफी हद तक सुधारने का काम किया था। लेकिन उसी साल उनकी तबीयत खराब हो गई। आखिरकार 24 दिसंबर 1524 को कोचीन (भारत) में उनका निधन हो गया। शुरू में उन्हें वहीं दफनाया गया, लेकिन बाद में 1539 में उनके अवशेष वापस पुर्तगाल ले जाया गया।

महान खोजकर्ता या सख्त और खतरनाक व्यक्तित्व

इतिहासकारों का मानना है कि वास्को द गामा सिर्फ एक महान खोजकर्ता ही नहीं थे, बल्कि उनका स्वभाव काफी सख्त और कई बार हिंसक भी था। इतिहासकार मार्क नुकप कहते हैं कि द गामा ऐसे इंसान थे जो जो चाहते थे, उसे हासिल करने के लिए ताकत का इस्तेमाल करने से भी पीछे नहीं हटते थे। यहां तक कि तोप का सहारा भी लेने से वो नहीं कतराते थे।

वहीं इतिहास के प्रोफेसर संजय सुब्रमण्यम के मुताबिक वास्को द गामा ने खुद ज्यादा कुछ लिखकर नहीं छोड़ा, लेकिन उनके साथ यात्रा करने वाले लोगों के लिखे हुए नोट्स और चिट्ठियां उनके बारे में एक अलग ही तस्वीर दिखाती हैं। उनके मुताबिक, उन रिकॉर्ड्स से पता चलता है कि दा गामा का स्वभाव काफी गुस्सैल था और वो कई बार खतरनाक फैसले भी लेते थे। यहां तक कि उस दौर के हिसाब से भी उन्हें काफी हिंसक माना जाता था।

डीएवी पीजी कॉलेज, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मीकांत सिंह बताते हैं कि यूरोपीय वास्को द गामा की खोज को भारत की खोज बताते हैं। लेकिन, भारत की सभ्यता और इतिहास द गामा के आने के हजारों सालों पहले से समृद्ध था। वास्को द गामा की टीम में भाई-साले समेत तमाम रिश्तेदार थे। पुर्तगाल से भारत की यात्रा से करीब 6 साल पहले वह अफ्रीका के दक्षिणी छोर तक पहुंच चुका था। यहां तक का रास्ता जाना पहचाना था, भारत की ओर आने पर जब वह अफ्रीका के पूर्वी तट की ओर बढ़ता है तो कई रोमांच मिलते हैं। एक सुल्तान के यहां उसे सम्मान मिलता है, उपहार मिलता है। बीच में उसके साथ लूटपाट की कोशिश भी होती है। इसी बीच एक ऐसी घटना होती है, जिससे यह समुद्री यात्रा बेहद आसान हो गई। द गामा को एक भारतीय मिलता है, जो उसे आश्वासन देता है कि वह उसे भारत ले चलेगा।

Vasco da Gama

Vasco da Gama

डॉ. लक्ष्मीकांत आगे कहते हैं, 'इस बीच द गामा को अरब सागर में कुछ मुस्लिम यात्री मिलते हैं। संभवतः वह मक्का-मदीना की यात्रा पर जा रहे होते हैं, जिनको वास्को की टीम लूट लेती है। वो भारत में कालीकट से थोड़ी दूर पर था, जहां उसे मछुआरों ने देखा और लूटपाट की कोशिश की। जिसपर उसने उनकी सारी मछलियों को खरीदने का बात कहकर, उन्हें अपने वश में कर लिया और लूटे जाने से बच गया। उन्होंने उसे कालीकट भेजा, 1498 में कालीकट के बंदरगाह पर पहुंचा, जो पहले से व्यापार और अर्थव्यवस्था के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था। यहां से कैलिको नाम के खास कपड़े निर्यात होते थे। कालीकट में जमोरिन (राजा) से उसकी मुलाकात होती है।'

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