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Asian Games: चैंपियन बाप-बेटे की जोड़ी ने रचा इतिहास, मिलकर जलाई एशियन गेम्स की मशाल

जापान के शिगेनोबु मुरोफुशी और उनके बेटे कोजी मुरोफुशी ने मिलकर नागोया में 20वें एशियाई खेलों की मशाल जलाई, जिससे मशाल रिले का समापन यादगार रहा। शिगेनोबु और कोजी दोनों ही हैमर थ्रो में एशियाई खेलों के पूर्व चैंपियन रह चुके हैं। मशाल जलाने से पहले, दोनों ने साथ मिलकर पोडियम तक की सीढ़ियां चढ़ीं।

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पिता-पुत्र की जोड़ी ने जलाई मशाल। फोटो- सोशल मीडिया

स्पोर्ट्स डेस्क, नई दिल्ली। हैमर थ्रो में अपनी पहचान बनाने वाले पिता-पुत्र की जोड़ी ने शनिवार को एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह के सबसे यादगार पलों में से एक में हिस्सा लिया। जापान के शिगेनोबू मुरोफुशी और उनके बेटे कोजी मुरोफुशी ने मिलकर नागोया में 20वें एशियाई खेलों की मशाल जलाई और इस तरह मशाल रिले का यादगार समापन हुआ।

शिगेनोबू और कोजी दोनों ही हैमर थ्रो में एशियाई खेलों के पूर्व चैंपियन रह चुके हैं। मशाल जलाने से पहले दोनों ने साथ मिलकर पोडियम तक की सीढ़ियां चढ़ीं। आइची-नागोया में एशियाई खेलों की आधिकारिक शुरुआत के साथ ही इस समारोह में डांस, संगीत और आतिशबाजी का अद्भुत नजारा देखने को मिला।

ओलंपिक चैंपियन से लेकर पिता-पुत्र के यादगार पल तक

मशाल जलाने की यह प्रक्रिया एक रिले का आखिरी हिस्सा थी, जिसमें जापान के कई बड़े खिलाड़ी शामिल थे। महिला पहलवान फुजिनामी अकारी मशाल लेकर स्टेडियम में आईं और फिर इसे चार बार के ओलंपिक तैराकी चैंपियन किताजिमा कोसुके को सौंपा। इसके बाद मशाल इतो कोजी के पास गई, जिन्होंने 1998 के बैंकॉक एशियाई खेलों में एथलेटिक्स में तीन गोल्ड मेडल जीते थे। उनके बाद 2016 रियो ओलंपिक में बैडमिंटन महिला डबल्स की चैंपियन ताकाहाशी अयाका की बारी आई।

asian Games Torch. फोटो- AP

एशियन गेम्स मशाल।

इसके बाद मशाल को 2004 एथेंस ओलंपिक में हैमर थ्रो चैंपियन रहे कोजी मुरोफुशी को सौंपी गई। आखिरी मशाल वाहक उनके पिता शिगेनोबू मुरोफुशी थे, जिन्होंने लगातार पांच बार एशियाई खेलों में हैमर थ्रो का खिताब जीता था। फिर दोनों ने मिलकर मशाल (कॉलड्रॉन) जलाई।

कौन हैं शिगेनोबू मुरोफुशी

शिगेनोबू मुरोफुशी जापान के सबसे सफल हैमर थ्रोअर्स में से एक हैं। उन्होंने तीन ओलंपिक खेलों (म्यूनिख 1972, मॉन्ट्रियल 1976 और लॉस एंजिल्स 1984) में हिस्सा लिया। वह 1984 के ओलंपिक में जापान के ध्वजवाहक भी रहे। हैमर थ्रो शुरू करने से पहले मुरोफुशी ने सुमो और शॉट पुट में भी हाथ आजमाया था। 1984 में उन्होंने 75.96 मीटर का जापानी रिकॉर्ड बनाया। यह रिकॉर्ड तब तक कायम रहा जब तक उनके बेटे कोजी ने 1998 में इसे तोड़ा नहीं।

शिगेनोबू ने 1970, 1974, 1978, 1982 और 1986 में एशियाई खेलों में हैमर थ्रो का गोल्ड पदक जीता। उन्होंने 1966 में रजत पदक भी जीता था। एशियाई खेलों में उनके पदकों के रिकॉर्ड में पांच गोल्ड पदक और एक रजत पदक शामिल है। उन्होंने 1979 और 1981 की एशियाई चैंपियनशिप में भी गोल्ड पदक जीता। हालांकि, शिगेनोबू का एशियाई खेलों में दबदबा रहा, लेकिन ओलंपिक पदक उनसे दूर ही रहा। वे 1972 म्यूनिख ओलंपिक में आठवें, मॉन्ट्रियल 1976 में 11वें और लॉस एंजिल्स 1984 में 15वें स्थान पर रहे।

बेटे ने पूरा किया सपना

बाद में उनके बेटे ने वह हासिल किया जो वे ओलंपिक में नहीं कर पाए थे। कोजी मुरोफुशी ने अपने पिता के नक्शेकदम पर चलना शुरू किया। कोजी ने अपने पिता की देखरेख में 10 साल की उम्र में हैमर थ्रो शुरू किया। आगे चलकर वे दुनिया के प्रमुख हैमर थ्रोअर्स में से एक बने। कोजी ने 2001 वर्ल्ड चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल जीता और फिर 2003 में ब्रॉन्ज मेडल हासिल किया। उनके ओलंपिक करियर का सबसे यादगार पल 2004 के एथेंस गेम्स में आया, जब उन्होंने हैमर थ्रो में गोल्ड मेडल जीता। उन्होंने 2012 के लंदन गेम्स में ओलंपिक ब्रॉन्ज मेडल भी अपने नाम किया। कोजी 2011 में डेगू में वर्ल्ड चैंपियन भी बने।

कोजी का एशियाई खेलों में मेडल का रिकॉर्ड

कोजी ने एशियाई खेलों में अपने परिवार की सफलता का सिलसिला जारी रखा। उन्होंने 1998 में बैंकॉक और 2002 में बुसान में हैमर थ्रो में गोल्ड मेडल जीता। इससे पहले, उन्होंने 1994 में हिरोशिमा में सिल्वर मेडल जीता था। इस तरह, एशियाई खेलों में उनके नाम दो गोल्ड मेडल और एक सिल्वर मेडल दर्ज हैं। कोजी ने 2002 एशियाई चैंपियनशिप में भी गोल्ड मेडल जीता और 1993, 1995 और 1998 में कॉन्टिनेंटल चैंपियनशिप में तीन सिल्वर मेडल जीते।

मुरोफुशी परिवार ने अपनी लंबी खेल विरासत में एक और खास अध्याय जोड़ा है। शिगेनोबू का 1970 और 1980 के दशक में एशियाई खेलों में दबदबा रहा। कोजी ने उनके नक्शेकदम पर चलते हुए इस इवेंट में हिस्सा लिया और बाद में ओलंपिक और वर्ल्ड चैंपियन बने। शनिवार को पिता और पुत्र एशियाई खेलों के उद्घाटन समारोह में आकर्षण का केंद्र रहे। मुकाबला करने के लिए नहीं, बल्कि उस मशाल को जलाने के लिए जिससे खेलों की आधिकारिक शुरुआत हुई।

Umesh Kumar
उमेश कुमारauthor

उमेश कुमार पत्रकारिता में पिछले 7 वर्षों से सक्रिय हैं। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई की है। करियर की शुरुआत प्रिंट मीडिया से करने के बाद उन्होंने डिजिटल मीडिया में बतौर स्पोर्ट्स राइटर अपनी मजबूत पहचान बनाई। उमेश ने अमर उजाला (प्रिंट), ईटीवी भारत (हैदराबाद), दैनिक भास्कर और दैनिक जागरण जैसे संस्थानों के साथ काम किया है। उमेश ने क्रिकेट की कई बायलेटरल सीरीज, आईपीएल, वर्ल्ड कप, प्रो कबड्डी लीग, फीफा वर्ल्ड कप, हॉकी वर्ल्ड कप और ओलंपिक जैसे बड़े राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों को कवर किया है। खेलों की गहरी समझ और डेटा-ड्रिवन स्टोरीटेलिंग उनकी लेखनी की खासियत है।

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