क्यों मनाई जाती है लोहड़ी? लोहड़ी के पीछे की कहानी क्या है
- Authored by: Srishti
- Updated Jan 10, 2026, 12:47 PM IST
Lohri Kyu Manate Hain: सिख समुदाय में लोहड़ी के त्योहार का बहुत ही विशेष महत्व है। ये मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लोहड़ी मनाई क्यों जाती है। इस सवाल का सही-सही जवाब यहां मौजूद है। साथ ही इसके पीछे की कहानी भी यहां से पढ़ सकते हैं।
क्यों मनाई जाती है लोहड़ी लोहड़ी के पीछे की कहानी क्या है (pc: canva)
Lohri Kyu Manate Hain: लोहड़ी का त्योहार मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। ये पंजाब, हरियाण और दिल्ली में खासतौर पर मनाया जाता है। लोहड़ी के दिन सूर्य देव की पूजा की जाती है। शाम के समय अग्नि जलाकर अग्नि देव की पूजा की जाती है। इसके साथ ही इस दिन पंजाबी लोकगीत और लोक नृत्य भी करने परंपरा है। लोहड़ी की अग्नि में तिल, गुड़ और रेवड़ी भी डाली जाती है। लेकिन लोहड़ी मनाई क्यों जाती है, इसकी जानकारी आपको यहां से मिलेगी। साथ ही लोहड़ी के पीछे की कहानी भी यहां दी गई है।
लोहड़ी कब है?
साल 2026 में लोहड़ी का त्योहार 13 जनवरी, मंगलवार के दिन मनाया जाएगा। इसकी तैयारियां भी चल रही हैं।
लोहड़ी क्यों मनाई जाती है?
लोहड़ी मुख्य रूप से फसल कटाई और ऋतु परिवर्तन के उत्सव के रूप में मनाई जाती है। ये पर्व रबी की फसल, खासकर गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए आभार व्यक्त करने तथा शीत ऋतु के अंत और वसंत के आगमन का स्वागत करने का प्रतीक है। इस दिन अग्नि देवता की पूजा कर सुख-समृद्धि की कामना की जाती है और लोकनायक दुल्ला भट्टी को भी याद किया जाता है।
लोहड़ी के पीछे की कहानी क्या है?
एक समय में दो अनाथ लड़कियां थीं। जिनका नाम सुंदरी एवं मुंदरी था। उनकी विधिवत शादी न करके उनका चाचा उन्हें एक राजा को भेंट कर देना चाहता था। उसी समय में एक दुल्ला भट्टी नाम का डाकू हुआ है । उसने सुंदरी एवं मुंदरी को जालिमों से छुड़ा कर उन की शादियां कर दीं। दुल्ला भट्टी ने इस मुसीबत की घड़ी में लड़कियों की मदद की। दुल्ला भट्टी ने लड़के वालों को मनाया और एक जंगल में आग जला कर सुंदरी और मुंदरी का विवाह करवा दिया। उन दोनों का कन्यादान भी दुल्ले ने खुद ही किया। ये भी कहा जाता है कि शगुन के रूप में दुल्ले ने उनको शक्कर दी थी। दुल्ले ने उन लड़कियों को जब विदा किया तब उनकी झोली में एक सेर शक्कर ड़ाली। दुल्ला भट्टी ने ड़ाकू हो कर भी निर्धन लड़कियों के लिए पिता की भूमिका निभाई। साथ ही ये भी कहते हैं कि यह पर्व संत कबीर की पत्नी लोई की याद में मनाते हैं। इसीलिए यह पर्व को लोई भी कहते हैं।