Guruwar Vrat Ke Niyam: जगत के पालनहार भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति ग्रह को गुरुवार (बृहस्पतिवार/वीरवार) का दिन समर्पित है, जिनकी विशेष कृपा पाने के लिए भक्तजन बृहस्पतिवार का व्रत रखते हैं। मान्यता है कि विधिपूर्वक वीरवार का व्रत रखने से शादी में आ रही समस्याएं दूर होती हैं। साथ ही आर्थिक स्थिति, ज्ञान और स्वास्थ्य में सुधार होता है। हालांकि, गुरुवार के व्रत शुरू करने से लेकर समापन तक के कई नियम हैं, जिनका पालन करने पर ही उपवास का पूर्ण फल मिलता है।
आज यहां पर आप जानेंगे कि गुरुवार के व्रत कब से शुरू करने चाहिए और कब से नहीं। साथ ही इसकी समय सीमा और व्रत के दौरान अपनाए जाने वाले नियमों के बारे में आपको पता चलेगा।
कब से शुरू न करें गुरुवार के व्रत?
गुरुवार के व्रत पौष महीने में शुरू नहीं करने चाहिए, जो कि दिसंबर के मध्य से जनवरी के मध्य तक चलता है। इसके अलावा आप किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले बृहस्पतिवार से गुरुवार व्रत की शुरुआत कर सकते हैं।
गुरुवार के कितने व्रत रखने चाहिए?
जो लोग गुरुवार का व्रत रखने की सोच रहे हैं, वो 1, 3, 5, 7, 9, 11 या 16 बृहस्पतिवार के दिन उपवास रख सकते हैं। इसके अलावा आजीवन भी गुरुवार का व्रत रखा जा सकता है। यदि किसी कारणवश बीच में किसी गुरुवार आप व्रत न रख पाएं तो अगले हफ्ते बृहस्पतिवार के दिन उपवास रख सकते हैं।
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गुरुवार व्रत के नियम
- व्रत शुरू करने से पहले इसका संकल्प जरूर लें।
- संकल्प को बीच में न तोड़ें।
- नकारात्मक चीजों से व्रत वाले दिन दूर रहें।
- पारण के खाने में नमक न डालें।
- व्रत वाले दिन बाल न धोएं।
- नाखून या बाल व्रत वाले दिन न काटें।
- कपड़े न धोएं।
- इस दिन उधार न दें और न ही लें।
- बेजुबान पशु-पक्षियों को परेशान न करें।
- काले या नीले रंग की जगह पीले कलर के कपड़े पहनें।
- व्रत वाले दिन अपनी क्षमता के अनुसार दान जरूर करें।
- दिनभर ब्रह्मचर्य का पालन करें।
गुरुवार का व्रत किस समय खोलें?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गुरुवार का व्रत उपवास वाले दिन शाम को सूर्यास्त के बाद खोला (व्रत का पारण) जाता है। वहीं, इसकी शुरुआत सूर्योदय से हो जाती है। इसलिए इससे पहले ही स्नान आदि कार्य करके तैयार हो जाएं। बता दें कि गुरुवार का व्रत खोलने से पहले विष्णु जी, देवगुरु बृहस्पति ग्रह और केले के पेड़ की पूजा जरूर करनी चाहिए। साथ ही गुरुवार व्रत की कथा सुनें और घी के दीपक से देवताओं की आरती करें। इसके बाद शाम में जरूरतमंद लोगों को दान दें और बेजुबान पशु-पक्षियों की सेवा करें।
डिस्क्लेमर: यह पाठ्य सामग्री आम धारणाओं और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री के आधार पर लिखी गई है। टाइम्स नाउ नवभारत इसकी पुष्टि नहीं करता है।
