Hanuman Bahuk Path Arth Sahit (हनुमान बाहुक पाठ अर्थ सहित): जब जीवन में गंभीर बीमारी, असहनीय दर्द या लंबे समय से चली आ रही कोई समस्या सामने आ जाए और कोई इलाज या उपाय असर न कर रहा हो, तब इंसान मानसिक रूप से बहुत टूटने लगता है। ऐसे समय में हनुमान बाहुक पाठ को एक रामबाण उपाय माना जाता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित यह शक्तिशाली स्तोत्र न केवल शारीरिक कष्टों को कम करने में सहायक है, बल्कि गंभीर रोगों और मानसिक परेशानियों से राहत देने में भी अत्यंत प्रभावी माना जाता है। कहा जाता है कि श्रद्धा और सही विधि से इसका पाठ करने पर जीवन की कई अज्ञात और जटिल समस्याओं में भी सुधार देखने को मिलता है। विशेषकर मंगलवार और शनिवार को किया गया हनुमान बाहुक पाठ अधिक फलदायी माना जाता है। आइए जानते हैं इसका अर्थ, लाभ और सही विधि विस्तार से।
हनुमान बाहुक क्या है (Hanuman Bahuk Path)
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है, जिसमें कुल 44 छंद हैं। मान्यता है कि जब तुलसीदास जी को अत्यंत गंभीर भुजा-पीड़ा (बाहु दर्द) हुआ, तो उन्होंने हनुमान जी की शरण ली। तब भगवान हनुमान ने स्वप्न में आकर उन्हें अपनी स्तुति में यह स्तोत्र रचने का आदेश दिया। जैसे-जैसे तुलसीदास जी यह स्तोत्र लिखते गए, वैसे-वैसे उनका दर्द कम होता गया और अंत में वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए। इसके बाद उन्होंने यह आशीर्वाद मांगा कि जो भी व्यक्ति श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके सभी कष्ट दूर हों।
हनुमान बाहुक पाठ के लाभ
हनुमान बाहुक पाठ को धार्मिक मान्यताओं में एक शक्तिशाली रामबाण उपाय माना जाता है, जो जीवन की कई समस्याओं में सहायक बताया गया है।
1. गंभीर रोगों और शारीरिक पीड़ा में राहत
यह पाठ जोड़ों के दर्द, वात रोग, गले के दर्द, स्नायु संबंधी समस्याओं और असहनीय शारीरिक पीड़ा से राहत दिलाने में रामबाण माना जाता है।
2. अज्ञात बीमारियों में लाभ
ऐसा माना जाता है कि यदि किसी बीमारी का कारण समझ में नहीं आ रहा हो, तो श्रद्धा से किए गए इस पाठ से बीमारी की पहचान और उसमें सुधार की संभावना बनती है।
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3. मानसिक शांति और आत्मविश्वास
यह पाठ मानसिक तनाव, चिंता और मानसिक रोगों को कम करने में सहायक माना जाता है। इसके नियमित पाठ से आत्मविश्वास बढ़ता है और कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है।
4. नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा
घर में हनुमान बाहुक पाठ करने से नकारात्मक ऊर्जा, भय और भूत-प्रेत बाधा दूर होती है और एक प्रकार का आध्यात्मिक सुरक्षा कवच बनता है।
5. जीवन की बाधाओं में राहत
करियर, धन, नौकरी और संतान से जुड़ी रुकावटों को दूर करने के लिए भी यह स्तोत्र अचूक माना जाता है। कई लोग इसे जीवन की रुकावटें कम करने वाला प्रभावी उपाय मानते हैं।
6. आत्मबल और सकारात्मक सोच
इस पाठ से व्यक्ति के अंदर धैर्य, साहस और सकारात्मक सोच बढ़ती है, जिससे जीवन में संतुलन और स्थिरता आती है।
हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में
हनुमान बाहुक गोस्वामी तुलसीदास जी की रचना है, जिसमें उन्होंने भगवान हनुमान से अपने दुख दूर करने की प्रार्थना की है। इस पाठ को सरल हिंदी में पढ़ना आसान होता है, इसलिए ज्यादातर लोग हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में ही करते हैं। इसमें लिखी चौपाइयां मन को शांत करती हैं और एक तरह से ध्यान (मेडिटेशन) जैसा असर देती हैं, जिससे तनाव कम महसूस हो सकता है।
हनुमान बाहुक पाठ अर्थ सहित
॥ अथ श्री हनुमान बाहुक ॥
श्री गणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत
छप्पय
सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन,
रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल
कालहुको काल जनु ॥
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ
सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत
समन सकल-संकट-विकट ॥१॥
अर्थ: जिनका शरीर उदय होते सूर्य की तरह तेजस्वी है, जिन्होंने समुद्र पार करके माता सीता के दुखों को दूर किया। जिनकी भुजाएं लंबी हैं, स्वरूप अत्यंत प्रभावशाली और भयंकर है, और जो स्वयं मृत्यु पर भी अधिकार रखने वाले माने जाते हैं।
जिन्होंने बिना किसी भय के लंका को जला दिया और जो टेढ़ी भौंहों वाले, बलशाली राक्षसों के अभिमान, शक्ति और घमंड को नष्ट करने वाले पवनपुत्र हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि हनुमान जी सच्चे मन से सेवा करने पर सहज ही मिल जाते हैं। वे अपने भक्तों के हमेशा पास रहते हैं। उनके गुणों का गान, स्मरण, नमन और जप करने से बड़े से बड़े संकट भी शांत हो जाते हैं ॥1॥
स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज बज्र-तन ॥।
पिग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लंगूर,
खल-दल बल भानन ॥
कह तुलसिदास बस जासु उर
मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं
सपनेहुं नहिं आवत निकट ॥२॥
अर्थ: जिनका शरीर स्वर्ण पर्वत की तरह तेजस्वी और भव्य है, जिनमें करोड़ों दोपहर के सूर्यों जैसा प्रकाश और ऊर्जा समाई हुई है। जिनकी छाती विशाल है, भुजाएँ बेहद शक्तिशाली हैं और जिनके नाखून वज्र के समान कठोर और मजबूत हैं।
जिनकी आँखें लाल और तेज से भरी हैं, भौंहें भयंकर हैं और जिनका मुख, जीभ और दाँत अत्यंत विकराल रूप लिए हुए हैं। जिनके बाल भूरे रंग के हैं और जिनकी पूँछ इतनी शक्तिशाली है कि वह दुष्टों की सेना और उनकी ताकत को भी नष्ट कर देती है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि जिस व्यक्ति के हृदय में पवनपुत्र हनुमान का यह प्रचंड और दिव्य स्वरूप बसता है, उसके जीवन में दुःख और पाप सपने में भी पास नहीं आते।
झूलना
पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर,
सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली,
बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल,
बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है,
पवन को पूत रजपूत रुरो ॥३॥
अर्थ: हे पवनपुत्र! आप अद्वितीय और महान योद्धा हैं। युद्ध के मैदान में आपकी शक्ति पंचमुखी शिव, षट्मुखी कार्तिकेय, भृगुवंशी परशुराम और बलशाली असुरों से भी बढ़कर मानी जाती है।
वेदों के ज्ञाता विद्वान भी आपकी वीरता का गुणगान करते हैं और आपकी महिमा का विस्तार से वर्णन करते हैं।
आपके गुणों की चर्चा स्वयं श्रीराम करते हैं। आपके अतुलनीय बल के आगे संसार रूपी अथाह सागर भी मानो सूख सा जाता है।
हे तुलसीदास के आराध्य पवनपुत्र हनुमान! आपके सिवा इस संसार में ऐसा कौन है जो राक्षसों के समूह का विनाश कर सके। ॥3॥
घनाक्षरी
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-
अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन,
क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ॥
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि,
लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो ।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै,
तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ॥४॥
अर्थ: हनुमान जी जब विद्या प्राप्त करने के लिए सूर्यदेव के पास पहुंचे, तब सूर्यदेव ने इसे बालकों का खेल समझकर कहा कि “मैं कभी स्थिर नहीं रह सकता, मेरी गति हमेशा चलती रहती है।”
इस पर हनुमान जी ने हार नहीं मानी। उन्होंने सूर्यदेव की ओर मुख करके, पैरों के सहारे पीछे की ओर चलते हुए आकाश मार्ग में उलटी दिशा में यात्रा शुरू कर दी, ताकि उनकी शिक्षा में कोई बाधा न आए और वे लगातार ज्ञान प्राप्त करते रहें।
यह अद्भुत दृश्य देखकर इंद्र सहित अन्य देवता, भगवान विष्णु, शिव और ब्रह्मा भी चकित रह गए। उनके मन में आश्चर्य के साथ थोड़ी चिंता भी हुई कि यह असाधारण शक्ति आखिर किसकी है।
ओ तुलसी! यह वीरता, धैर्य और अद्भुत साहस किसका हो सकता है? ऐसा लगता है कि हनुमान जी ने अपने भीतर सभी दिव्य शक्तियों और गुणों को समेट लिया है। ॥4॥
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज,
गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कल्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर,
बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ॥
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि,
फलंग फलांग हते घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं,
हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ॥५॥
अर्थ: महाभारत के युद्ध में जब अर्जुन के रथ के ध्वज पर विराजमान श्री हनुमान जी ने प्रचंड गर्जना की, तो उसकी भयंकर ध्वनि सुनकर कौरवों के राजा दुर्योधन की पूरी सेना में हलचल मच गई और उनका मनोबल कमजोर पड़ने लगा।
वे महावीर पवनपुत्र हनुमान, जो वीरता के सागर हैं और जिनका बल अमृत के समान अटूट है, उनकी उस गर्जना ने गुरु द्रोणाचार्य और भीष्म पितामह जैसे महान योद्धाओं के साहस को भी दबा दिया।
ये वही हनुमान हैं, जिन्होंने बचपन में ही स्वाभाविक रूप से पृथ्वी से लेकर सूर्य तक के आकाश को एक ही छलांग में पार कर लिया था।
अंत में सभी योद्धा सिर झुकाकर और हाथ जोड़कर श्री हनुमान जी की ओर देखने लगे। इस प्रकार हनुमान जी का दर्शन पाकर उन्हें जीवन का सच्चा फल प्राप्त हुआ ॥5॥
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक,
निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर,
कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ॥
संकट समाज असमंजस भो रामराज,
काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बांह,
लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ॥६॥
अर्थ: हनुमान जी ने विशाल समुद्र को भी गाय के खुर के छोटे से गड्ढे जैसा तुच्छ समझते हुए सहज ही पार कर लिया। उन्होंने लंका जैसी विशाल नगरी को होलिका की तरह जला डाला और बिना किसी भय के शत्रु की नगरी में हलचल मचा दी।
संजीवनी बूटी लाने के लिए उन्होंने द्रोणाचल पर्वत को केवल अपने संकल्प से ही उखाड़ लिया और उसे ऐसे उठा लाए जैसे कोई गेंद से खेल रहा हो। वह विशाल पर्वत भी उनके लिए मानो एक साधारण फल के समान हो गया।
जब संजीवनी के बिना राम-सेना संकट में घिरकर व्याकुल हो उठी, तब हनुमान जी ने वह कार्य भी एक क्षण में पूरा कर दिया, जो सामान्यतः युगों में संपन्न होता।
हे पराक्रमी और अपार सामर्थ्य वाले हनुमान! तुलसीदास जी आपको बार-बार प्रणाम करते हैं। आपकी शक्तिशाली भुजाएँ ही समस्त लोकपाल देवताओं के संरक्षण और उनके पुनः स्थिर होने का आधार बनीं ॥6॥
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड मानो,
नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो,
महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ॥
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईधन को,
तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान,
सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ॥७॥
अर्थ: धरती को संभालने वाले कच्छप (कछुए) तक भी जिनके चरणों के प्रभाव से ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरा समुद्र उनके लिए केवल नापने का एक छोटा पात्र हो।
जब वे राक्षसों का संहार करते हैं, तब वही समुद्र उनके डर से भागकर छिपने की जगह बन जाता है और विशाल मछलियों व मगरमच्छों का आश्रय स्थल भी वही होता है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद जैसे दुष्टों को भस्म करने के लिए जिनका तेज प्रचंड अग्नि के समान प्रज्वलित हुआ।
भीष्म पितामह का कहना है कि उनके अनुसार तीनों काल और तीनों लोकों में श्री हनुमान जैसा बलवान कोई नहीं है ॥7॥
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको,
तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन,
सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ॥
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो,
प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान,
साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ॥८॥
अर्थ: आप श्रीराम के दूत हैं, पवनदेव के परम तेजस्वी पुत्र और माता अंजनी के प्रिय लाल हैं। आपका तेज सूर्य के समान प्रखर और उज्ज्वल है, जो हर दिशा को प्रकाशित करता है।
आप सीता माता के दुखों को दूर करने वाले, पाप और सभी दोषों का नाश करने वाले हैं। जो भी आपकी शरण में आता है, उसकी रक्षा आप स्वयं करते हैं, और आप लक्ष्मण जी को अपने प्राणों के समान प्रिय हैं।
तुलसीदास जी के जीवन में जो दरिद्रता और कष्ट रूपी रावण था, उसका नाश करने के लिए आप तीनों लोकों में आश्रय के रूप में प्रकट हुए हैं।
आप ज्ञान, गुण और बल से परिपूर्ण हैं और सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं। आप अत्यंत बुद्धिमान और दयालु स्वामी हैं। हे प्रभु! कृपा करके मेरे हृदय में सदैव हनुमान जी का वास बना रहे। ॥8॥
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल,
बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु,
सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ॥
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक,
तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास,
नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ॥९॥
अर्थ: हे हनुमान जी! आप दुष्टों और बुराई का नाश करने वाले हैं। आपका पराक्रम तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। वेद भी आपके गुणों का गुणगान करते हैं और कहते हैं कि देवताओं को बंधन से मुक्त कराने वाला आपके जैसा दूसरा कोई नहीं है।
आप पाप और कष्ट रूपी अंधकार को उसी तरह दूर कर देते हैं, जैसे सूर्य की किरणें धुंध को मिटा देती हैं। आप अपने भक्तों के जीवन में उसी तरह खुशियां और उजाला लाते हैं, जैसे सुबह का सूरज कमल को खिलाता है।
तुलसीदास जी कहते हैं कि उनके हृदय में केवल हनुमान जी का ही सहारा है, इसलिए उन्हें न इस संसार की चिंता है और न ही परलोक की।
आप भगवान श्रीराम के परम प्रिय भक्त हैं और शिवजी के स्वरूप भी माने जाते हैं। हे केसरीनंदन! कलियुग में आपका नाम कल्पवृक्ष के समान है, जो सच्चे मन से मांगी गई हर इच्छा को पूरा करने की शक्ति रखता है। ॥9॥
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत,
महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन,
करुना-कलित मन धारमिक धीर को ॥
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को,
सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को,
सेवक सहायक है साहसी समीर को ॥१०॥
अर्थ: हे हनुमान जी! आप अपार बल और अद्भुत शक्ति के स्वामी हैं, आपका रूप वीर और प्रभावशाली है। आपका पराक्रम ऐसा है जो भगवान श्रीराम के यश और गौरव को और भी बढ़ाता है।
आपका शरीर वज्र के समान मजबूत और अडिग है, और युद्ध में आपका साहस अत्यंत प्रचंड दिखाई देता है। फिर भी आपके भीतर करुणा, धर्म का पालन और अद्भुत धैर्य बसा हुआ है।
आप दुष्टों के लिए काल के समान भयावह हैं, जबकि सज्जनों के लिए रक्षक और सहारा बनते हैं। केवल आपका स्मरण करने मात्र से ही भक्तों के दुःख और कष्ट दूर हो जाते हैं।
आप माता सीता को सुख और आश्वासन देने वाले हैं और भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं। हे वीर पवनपुत्र! आप हमेशा अपने स्वामी के सेवकों की रक्षा करते हैं और हर समय उनका साथ निभाते हैं ॥10॥
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि,
हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को,
सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ॥
खल~दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को,
मांगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहूं पुर,
तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ॥११॥
अर्थ: आप सृष्टि की रचना में ब्रह्मा के समान, पालन-पोषण में विष्णु के समान और दुष्टों के संहार में रुद्र के समान हैं। प्राणों की रक्षा और जीवन देने में आप अमृत के समान कृपालु हैं।
आप धारण करने में पृथ्वी जैसे धैर्यवान, अंधकार को दूर करने में सूर्य जैसे तेजस्वी, सुखाने में अग्नि जैसे प्रबल और पोषण करने में चंद्रमा व सूर्य के समान जीवनदायी हैं।
आप दुष्टों को उनके कर्मों का फल देकर कष्ट दूर करते हैं, वहीं अपने भक्तों को संतोष और सुख प्रदान करते हैं। याचना और अभाव को मिटाकर आप आनंद रूपी मोदक का श्रेष्ठ वरदान देते हैं।
तीनों लोकों में जो भी दुखी और पीड़ित हैं, उनके कष्ट हरने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी के आराध्य श्री हनुमान जी सदैव दृढ़ संकल्पित रहते हैं॥11॥
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,
सानुकरूल सूलपानि नवै नाथ नांक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोर हाथ,
बापुरे बराक कहा और राजा रांक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,
ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आंक को ।
सब दिन रुरो पर पूरो जहां-तहां ताहि,
जाके है भरोसो हिये हनुमान हांक को ॥१२॥
अर्थ: श्रीराम, जिन्हें जानकीनाथ कहा जाता है, हनुमान जी को अपना परम सेवक मानते हैं और उनके प्रति गहरी कृतज्ञता रखते हैं। भगवान शिव हमेशा हनुमान जी के पक्ष में रहते हैं और देवराज इंद्र भी उन्हें सम्मानपूर्वक नमन करते हैं।
देवी-देवता हों या दानव, सभी हनुमान जी के सामने विनम्र होकर हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं। ऐसे में इस संसार के राजा या साधारण व्यक्ति की क्या ही तुलना—अर्थात हनुमान जी के आगे सब छोटे हैं।
जो भक्त हर समय—चाहे जागते हुए, सोते हुए, बैठे या चलते-फिरते—हनुमान जी की शरण में रहता है, उसका कोई भी अनिष्ट नहीं कर सकता।
जिसके मन में अंजनीनंदन हनुमान जी की शरण का अटूट विश्वास होता है, वह हर समय, हर जगह सुरक्षित, समर्थ और संतुष्ट रहता है। ॥12॥
सानुग सगौरि सानुकरूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि,
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,
जाके हिये हुलसति हांक हनुमान की ॥१३॥
अर्थ: जिस व्यक्ति पर श्री हनुमान जी की कृपा हो जाती है, उस पर उनके गणों के साथ-साथ माता पार्वती और भगवान शिव भी प्रसन्न रहते हैं। साथ ही समस्त लोकपाल (इंद्र आदि दिक्पाल), भगवान श्रीराम, माता सीता और श्री लक्ष्मण जी भी उस पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं।
ऐसा भक्त इस लोक और परलोक दोनों के दुखों से मुक्त हो जाता है। तुलसीदास जी कहते हैं कि जिसे इतनी दिव्य कृपा प्राप्त हो, उसे फिर तीनों लोकों में किसी अन्य शक्ति या सहारे की आवश्यकता ही नहीं रहती।
जिस व्यक्ति का हृदय हमेशा दया के सागर केसरी नंदन श्री हनुमान की शरण में लगा रहता है, उस पर मुनि और सिद्ध भी प्रसन्न रहते हैं और उसे बालक की तरह स्नेहपूर्वक संरक्षण देते हैं। वास्तव में, उन करुणामय कपीश्वर की महिमा अत्यंत पवित्र और निर्मल है। ॥13॥
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-
महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही,
नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील,
लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूं प्रकार,
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥१४॥
अर्थ: हे श्री हनुमान! आप करुणा के अथाह सागर हैं। आप बल और बुद्धि के भंडार, आनंद और यश के स्रोत तथा सभी गुणों और ज्ञान के सर्वोच्च आधार हैं।
आप पवनदेव के पुत्र और शिव के अंशस्वरूप हैं, साथ ही भगवान श्रीराम के अत्यंत प्रिय भक्त हैं। आपका नाम मात्र लेने से ही अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ प्राप्त हो जाते हैं।
आप अपनी दिव्य शक्ति से प्रभु श्रीराम के स्वभाव और मर्यादा को भली-भाँति समझने वाले हैं। आप वेदों, शास्त्रों और लोक-परंपराओं के ज्ञाता, विद्वान और आदर्श आचरण वाले हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि आप अपने भक्तों के भीतर और बाहर, हर बात को जानने वाले सर्वज्ञ स्वामी हैं। मैं मन, वचन और कर्म से पूरी तरह आपका सेवक हूँ ॥14॥
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस,
काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर,
जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर,
सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी संवार अंजनी कुमार कीजे मोहि,
जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ॥१५॥
अर्थ: हे कपिराज श्री हनुमान! जिन कार्यों को मन में सोचना भी बेहद कठिन था, उन्हें आपने भगवान श्री राम के लिए अपनी शक्ति और प्रयास से सहज ही पूरा कर दिया।
हे केसरी नंदन! आप देवताओं को बंधन से मुक्त कराने वाले और युद्धभूमि में पराक्रम दिखाने वाले महान वीर हैं। आपकी महिमा और यश युगों-युगों से पूरे संसार में गूंजती रही है।
हे अतुलनीय बल के धनी वीर! ऐसा क्यों लगता है कि तुलसीदास पर आपकी कृपा कम हो गई है? यह देखकर सज्जन लोग चिंतित हैं और दुष्ट लोग प्रसन्न हो रहे हैं।
हे अंजनीपुत्र श्री हनुमान! जैसे आप हमेशा अपने भक्तों की बिगड़ी को बनाते आए हैं, वैसे ही कृपा करके मेरी इस कठिन स्थिति को भी सुधार दीजिए। ॥15॥
सवैया
जान सिरोमनि हौ हनुमान
सदा जन के मन बास तिहारो ।
कारो बिगारो मैं काको कहा
केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते तो हातो
कियो सो तहां तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये ते आगेहूं को
होशियार हैं हों मन तौ हिय हारो ॥१६॥
अर्थ: हे हनुमान जी! आप ज्ञान के सागर और श्रेष्ठतम हैं, और अपने भक्तों के हृदय में सदा विराजमान रहते हैं।
मैं तो किसी का बुरा करने वाला नहीं हूँ, फिर भी आखिर किस वजह से आप मुझसे रुष्ट हैं?
यदि आपने अपने सेवक समझकर मुझे त्याग भी दिया है, तो इसमें तुलसी का कोई बस नहीं चलता।
भले ही मेरा मन अंदर से टूट चुका हो, फिर भी कृपा करके मेरा दोष बता दीजिए, मेरी भूल समझा दीजिए, ताकि मैं आगे से सावधान रह सकूँ और वही गलती दोबारा न करूँ॥16॥
तेरे थपे उथपै न महेस,
थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज
बिराजत बैरिन के उर साले ॥
संकट सोच सबै तुलसी लिये
नाम फट मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार,
कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥१७॥
अर्थ: हे वानरराज श्री हनुमान! जिस स्थान को आप अपनी कृपा से सुरक्षित कर देते हैं, उसे स्वयं भगवान शिव भी नहीं उजाड़ सकते। और जिस घर से आपकी कृपा हट जाए, उसे फिर कौन संवार सकता है?
हे दीन-दुखियों पर दया करने वाले प्रभु! जिन पर आपकी कृपा होती है, वे अपने शत्रुओं के दिल में भय और पीड़ा का कारण बन जाते हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि आपके नाम का स्मरण करते ही सारे संकट और चिंताएँ ऐसे टूटकर खत्म हो जाती हैं, जैसे मकड़ी का जाला एक झटके में बिखर जाता है।
हे प्रभु श्री हनुमान! क्या मेरी बारी आने तक आप थक गए हैं? या फिर इतने लोगों का सहारा बनते-बनते आप विश्राम कर रहे हैं, इसलिए मेरी मदद में देर हो रही है? ॥17॥
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल,
जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले
अरि-कुजर छैल छवा से ॥
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई
सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर,
लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ॥१८॥
अर्थ: आपने समुद्र को पार कर शक्तिशाली और क्रूर राक्षसों का संहार किया और लंका जैसे कठिन, टेढ़े-मेढ़े और दुर्गम किले को भी जला डाला।
हे रणभूमि के सिंह! आपने शत्रु रूपी हाथियों के समान बलवान राक्षसों को भी एक सिंह की तरह सहज ही परास्त कर दिया।
आप जैसे समर्थ और महान स्वामी की सेवा में रहते हुए भी तुलसीदास दुःख और दोष की अग्नि सह रहा है—यह सचमुच आश्चर्य की बात है।
हे वानर रूपी बाज! दुष्ट लोग पक्षियों की तरह बढ़ते जा रहे हैं, आप उन्हें बटेर की भांति पकड़कर नष्ट क्यों नहीं कर देते? ॥18॥
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि
दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुभकरन्न-से
कुजर केहरि-बारो ॥
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ,
बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूं-तें
सदा तुलसी कहूं सो रखवारो ।।१९।।
हे अक्षयकुमार का वध करने वाले श्री हनुमान जी! आपने अशोक वाटिका को पूरी तरह नष्ट कर दिया और रावण जैसे शक्तिशाली व प्रतापी शत्रु के सामने भी बिना किसी भय के डटकर खड़े रहे।
मेघनाद, अकम्पन और कुम्भकर्ण जैसे बड़े-बड़े योद्धाओं के अभिमान को चकनाचूर करने में आप ऐसे थे जैसे एक युवा सिंह अपने शत्रुओं पर टूट पड़ता है।
शत्रुओं को तिनके के ढेर की तरह भस्म करने के लिए श्रीराम का तेज मानो अग्नि के समान है, और उस अग्नि को प्रज्वलित करने वाले स्वयं पवनपुत्र हनुमान जी ही हैं।
तुलसीदास जी कहते हैं कि वही पवननंदन हनुमान जी मुझे हमेशा पाप, शाप और संताप—इन तीनों से बचाकर सुरक्षित रखें ॥19॥
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुं कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी संभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति,
मोदक मरे जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीरजूके,
बांह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥२०॥
अर्थ: हे हनुमान जी! पूरा संसार यह भली-भांति जानता है कि जिस पर आपकी कृपा दृष्टि पड़ जाती है, वह सदा सुरक्षित और आनंद से परिपूर्ण रहता है। मैं मन ही मन आपकी उस प्रतिज्ञा का स्मरण करते हुए आपसे विनती करता हूँ कि कृपया अपने वचन को विस्मृत न करें।
हे स्वामी कपिराज! यह तुलसीदास तो आपकी सेवा के योग्य भी कहाँ है। यदि मुझसे कोई भूल या अपराध हो गया हो, तो अपने स्वामी-सुलभ मर्यादित और अत्यंत उदार स्वभाव को याद कर मेरी रक्षा कीजिए।
यदि आप मुझे अपराधी मानते हैं, तो चाहे जितनी भी सज़ा दे दें, परंतु जो व्यक्ति केवल मीठे लड्डुओं से जीवित रह सकता है, उसे विष देकर मृत्यु के मुख में न धकेलें।
हे महाबली! आप अत्यंत वीर, पवनदेव के प्रिय पुत्र और श्रीराम के परम प्रिय हैं। कृपा करके मेरी भुजाओं के कष्ट को शीघ्र दूर कर दीजिए ॥20॥
बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो,
दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल,
आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ॥
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो,
माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर,
बांहुपीर राहुमातु ज्यौ पारि मारिये ॥२१॥
अर्थ: हे दीनों के बंधु! मैं आप पर पूर्ण रूप से समर्पित हूँ। आपने बालक को देखकर उसे अपने संरक्षण में लिया और बिना किसी स्वार्थ के, अनुपम तथा निष्काम करुणा का परिचय दिया।
यह तुलसीदास आपका ही सहारा, आपका ही बल और आपकी ही आशा लेकर बैठा है। कृपा करके मुझे अपना दास समझकर मेरी ओर भी अपनी दयादृष्टि कीजिए।
अत्यंत भयानक कलियुग ने किसे व्याकुल नहीं किया है? इस बलवान कलि का प्रभाव मेरे मस्तक पर भी है, कृपा करके इसे दूर कीजिए।
हे केसरीनन्दन! आप रणभूमि में गर्जना करने वाले अत्यंत पराक्रमी वीर हैं। जैसे आपने राहु की माता सिंहिका का संहार किया था, वैसे ही मेरी भुजाओं के कष्ट और पीड़ा को भी समाप्त कर दीजिए ॥21॥
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार,
केसरी कुमार बल आपनो संभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत,
मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ॥
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर,
सोऊ अपराध बिनु बीर, बांधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बांहु, बलि, बारिचर पीर,
मकरी ज्यौ पकरि कै बदन बिदारिये ॥२२॥
अर्थ: हे केसरीकुमार! आप उजड़े हुए को फिर से बसाने वाले और बसे हुए को उजाड़ देने वाले हैं। कृपा करके अपने उस असीम बल का स्मरण कीजिए।
हे रामदूत! आप श्रीराम के भक्तों के लिए कल्पवृक्ष के समान हैं। मेरे जैसे दीन-दुर्बल के लिए तो आप ही एकमात्र सहारा हैं।
हे समर्थ स्वामी! आपके होते हुए भी तुलसीदास को कष्ट भोगना पड़ रहा है। यदि कोई अपराध हुआ भी हो, तो बिना बताए इस तरह दंड देना उचित नहीं है।
मैं आप पर पूर्ण रूप से बलिहारी जाता हूँ। मेरी भुजा विशाल तालाब के समान है और उसमें यह पीड़ा जलचर की तरह निवास कर रही है। कृपा करके इस पीड़ा को मगरमच्छ की तरह पकड़कर उसका मुख फाड़ दीजिए ॥22॥
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय,
राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे,
जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ॥
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पव्बयते,
सुथल सुबेल भालू बैठि कैः बिचारिये ।
महाबीर बांकुरे बराक बांह-पीर क्यों न,
लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ॥२३॥
अर्थ: मुझमें श्रीरामचंद्र के प्रति गहरा स्नेह है। श्रीराम, श्री लक्ष्मण और माता सीता की कृपा से मेरे भीतर साहस भी है और भक्ति भी—इसलिए मेरे शोक और सभी संकटों का नाश कीजिए।
आनंद-स्वरूप वानर (मन) रोग-रूपी विशाल समुद्र को देखकर पूरी तरह हताश हो गया है, लेकिन जीव-रूपी जाम्बवन्त को आप पर पूरा विश्वास है—उसका सारा भार अब आप ही संभालिए।
हे कृपालु प्रभु! इस तुलसी के सुंदर प्रेम-रूपी पर्वत से एक छलांग लगाइए और श्रेष्ठ स्थान (हृदय) रूपी सुबेल पर्वत पर विराजमान जीव-रूपी जाम्बवन्त को संभाल लीजिए, जो आपकी प्रतीक्षा में बैठा है।
हे महाबली, वक्र और पराक्रमी वीर! मेरी भुजा के कष्ट रूपी लंकिनी को अपने प्रहार से मरोड़कर समाप्त क्यों नहीं कर देते—अर्थात इस पीड़ा को पूरी तरह नष्ट क्यों नहीं कर देते? ॥23॥
लोक-परलोकटूं तिलोक न बिलोकियत,
तोसे समरथ चष चारिहूं निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,
नाथ हाथ सब निज महिमा विचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये |
बात तरुमूल बंहुसूल कपिकच्छरु-बेलि,
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥२४॥
अर्थ: इस लोक, परलोक तथा तीनों लोकों में—चारों दिशाओं में खोज लेने पर भी—आपके समान बलशाली और कोई भी दिखाई नहीं देता।
हे नाथ! कर्म, काल, लोकपाल (देवता) और समस्त स्थावर तथा जंगम प्राणी—सभी आपके ही अधीन हैं। कृपा करके अपनी इस अपार महिमा पर एक बार विचार करें।
हे देव! तुलसी आपका परम भक्त/सेवक है और उसका हृदय आपके ही निवास से भरा हुआ है, फिर भी वह गहन कष्ट में दिखाई देता है।
वात-व्याधि से उत्पन्न यह भुजा का दर्द केवाँच की बेल की तरह फैल गया है। कृपा करके इसकी जड़ को समेटकर, वानर की क्रीड़ा के समान सहजता से उखाड़ फेंकिए—अर्थात इसे पूरी तरह समाप्त कर दीजिए ॥24॥
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे,
बकी बकभगिनी काहू ते कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कदि,
बहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाइ बेष आप ही विचारि देख,
पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौ कपिकान्ह तुलसी की,
बोंहपीर महाबीर तेरे मारे मरगी ॥२५॥
अर्थ: कर्म रूपी भयानक कंस के भरोसे रहने वाली बकासुर की बहिन पूतना भला किसी से क्यों डरेगी?
वह अत्यंत भयानक और क्रूर है, जो छोटे बच्चों का संहार करने वाली है, जिसकी लीलाएँ शब्दों में बयान नहीं की जा सकतीं। वह अपने बल और छल से सुंदर एवं छोटे बालकों को धोखे में फँसा लेती है।
आप स्वयं विचार कीजिए—वह सुंदर वेश धारण करके आई है। यदि वह आप जैसे गुणी और शक्तिशाली के आश्रय में आ जाए, तो सबके पाप स्वतः नष्ट हो सकते हैं।
हे महाबली कपिराज! तुलसीदास जी की भुजा की पीड़ा भी पूतना पिशाचिनी के समान ही भयंकर है, और आप स्वयं बालकृष्ण के समान हैं—यह पीड़ा केवल आपके प्रहार से ही समाप्त हो सकती है ॥25॥
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है,
बेदन विषम पाप ताप छल छांह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की,
पराहि जाहि पापिनी मलीन मन मांह की ॥
पैटहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि,
बाबरी न होहि बानि जानि कपि नह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की,
सपथ महाबीर की जो रहै पीर बांह की ॥२६॥
अर्थ: यह भयंकर पीड़ा क्या मेरे कपाल की लिखी हुई किस्मत है, या यह समय, क्रोध अथवा त्रिदोषों का प्रभाव है? क्या यह पाप, ताप और छल की परछाईं का परिणाम है?
क्या यह मेरे अपने कर्मों का बोझ है, या फिर यंत्र, मंत्र और तंत्र जैसे अदृश्य प्रभावों का फल है? हे पापरूपिणी पूतना, अर्थात मैले और विकृत मन से उत्पन्न यह पीड़ा! तू यहाँ से तुरंत चली जा, दूर भाग जा।
मैं स्पष्ट चेतावनी देता हूँ—दंड भोगने से पहले ही यहाँ से चली जा। कपिराज हनुमान के स्वभाव को जानकर भी यदि तू नहीं मानेगी तो यह मूर्खता होगी।
मैं बलवान हनुमान की शपथ लेता हूँ और महावीर का स्मरण करता हूँ—अब यह भुजा की पीड़ा यहाँ अधिक समय तक नहीं टिकेगी ॥26॥
सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल,
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी,
रावन की रानी मेघनाद महतारी है ।
भीर बांह पीर की निपट राखी महाबीर,
कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ॥२७॥
अर्थ: आपने सिंहिका के बल का नाश किया, सुरसा के छल को निष्फल कर दिया, लंकिनी को पराजित करके मार डाला और अशोक वाटिका को उजाड़ दिया।
आपने लंका को अग्नि में भस्म कर दिया, बार-बार राक्षसों का संहार किया और बड़े-बड़े जातुधानों को धूल में मिला दिया।
आपने यमराज की तलवार के समान कठोर मर्यादा को भी तोड़ते हुए रावण की पटरानी मंदोदरी और मेघनाद की माता को राजमहल से बाहर निकाल दिया।
हे महाबली! जब आपने इतने विशाल-विशाल भय का अंत कर दिया, तो फिर मेरी भुजा की पीड़ा को अब तक क्यों नहीं मिटाया? किस संकोच के कारण आप तुलसीदास के इस गहरे शोक को बढ़ा रहे हैं? ॥27॥
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर,
भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बांह बसत बिसोक लोकपाल सब,
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहू की ॥
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,
हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है,
एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ॥२८॥
अर्थ: हे वीर! आपके बचपन के पराक्रमों की चर्चा मात्र से ही बड़े-बड़े धीर पुरुष भी भयभीत हो जाते हैं। यहाँ तक कि इन्द्र, सूर्य और राहु जैसे शक्तिशाली देवता भी आपके प्रभाव से अपनी सुध-बुध खो बैठते हैं।
आपकी भुजाओं के संरक्षण में सभी लोकपाल पूर्ण रूप से निश्चिंत होकर स्थित रहते हैं, और आपका नाम लेने मात्र से ही हर किसी का दुख समाप्त हो जाता है।
साम, दान और भेद जैसी नीतियाँ तथा वेद-उपवेद भी यही सिद्ध करते हैं कि चाहे कोई चोर हो या साहूकार—सभी की डोर वास्तव में कपिनाथ के ही हाथ में है, अर्थात सब आपके ही अधीन हैं।
इतने दिनों से तुलसीदास की भुजा में जो पीड़ा बनी हुई है, वह आपका आलस्य है, क्रोध है, परिहास है या फिर कोई शिक्षा देने का माध्यम—यह समझ में नहीं आता ॥28॥
टूकनि को घर-घर डोलत केगाल बोलि,
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है संभार सार अंजनी कुमार बीर,
आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भोति समरथ आजु,
कपिराज सांची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,
चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ॥२९॥
अर्थ: हे गरीबों का पालन करने वाले कृपानिधान! मैं पहले टुकड़ों के लिए दर-दर भटकता फिरता था, लेकिन आपने मुझे बुलाकर एक बालक की तरह अपना स्नेह और पालन-पोषण दिया।
हे वीर अंजनीकुमार! आपने ही मुख्य रूप से मेरी रक्षा की है, और मुझे पूरा विश्वास है कि आप अपने सेवक को कभी नहीं भूलेंगे।
आज आप हर प्रकार से पूर्ण समर्थ हैं। मैं सत्य कहता हूँ—तीनों लोकों में आपके समान और कौन हो सकता है?
फिर भी यह आपका सेवक दंड और दुर्दशा सह रहा है, और आप उसे मानो एक खेल-परिहास की तरह देख रहे हैं—जैसे बच्चों के खेल में कोई चिड़िया मर जाए ॥29॥
आपने ही पाप तें त्रिपात ते कि साप तें,
बढ़ी है बाह बेदन कही न सहि जाति है ।
ओषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल,
को है जगजाल जो न मानत इताति है |
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कल्यो राम दूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ॥३०॥
अर्थ: मेरे ही पापों, तीनों तापों अथवा किसी शाप के कारण यह भुजा-पीड़ा बढ़ गई है, जिसे न तो बताया जा सकता है और न ही सहा जा रहा है।
अनेक प्रकार की औषधियाँ, यंत्र-मंत्र और टोटके किए गए, यहाँ तक कि देवताओं की भी आराधना की गई, पर सब प्रयास निष्फल रहे—पीड़ा घटने के बजाय और बढ़ती ही चली गई।
ब्रह्मा (सृष्टि के रचयिता), विष्णु (पालनकर्ता), महेश (संहारकर्ता), साथ ही कर्म, काल और संपूर्ण जगत—ऐसा कौन है जो आपकी आज्ञा का पालन नहीं करता?
तुलसीदास आपके दास हैं और आपने स्वयं मुझे अपना सेवक स्वीकार किया है। हे वीर रामदूत! आपकी यह देरी मुझे इस भुजा-पीड़ा से भी अधिक कष्ट दे रही है ॥30॥
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को,
समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बांकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,
रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ॥
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज,
सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बांह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को,
कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ॥३१॥
अर्थ: आप श्रीरामचन्द्रजी के दूत, पवनदेव के श्रेष्ठ पुत्र, हाथ-पाँव से समान रूप से समर्थ और असहायों के सच्चे सहायक हैं।
आपकी यशगाथा अत्यंत सुंदर और सर्वत्र प्रसिद्ध है, जिसका गुणगान वेद भी करते हैं। रावण जैसे महान योद्धा भी आपके घूँसे की मार से आहत हो गया था।
इतने महान और समर्थ स्वामी की कृपा होने के बावजूद आज आपका यह विनम्र सेवक तन, मन और वचन से कष्ट में है।
तुलसीदास को इस छोटी-सी भुजा की पीड़ा पर भी अत्यधिक दुःख और ग्लानि हो रही है। यह किस पाप या किस क्रोध का परिणाम है कि आपका प्रत्यक्ष प्रभाव अब प्रतीत नहीं हो रहा है? ॥31॥
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,
छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,
राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ॥
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग,
हनुमान आन सुनि छाडत निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को,
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥३२॥
अर्थ: देवी-देवता, दैत्य, मनुष्य, मुनि, सिद्ध, नाग आदि सभी प्रकार के जड़ और चेतन प्राणी, चाहे वे छोटे हों या बड़े, साथ ही पूतना, पिशाचिनी, राक्षसी और राक्षस जैसे सभी कुटिल और दुष्ट स्वभाव वाले प्राणी—ये सभी रामदूत श्री हनुमान जी की आज्ञा को श्रद्धा से सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं।
भयानक यंत्र-मंत्र, छल-कपट, धोखा देने वाली प्रवृत्तियाँ तथा दुष्ट रोग भी हनुमान जी का नाम सुनते ही अपना प्रभाव और स्थान छोड़ देते हैं।
हे प्रभु! मेरे बुरे कर्मों पर आप कृपा करके क्रोध करें, तुलसीदास को सन्मार्ग का ज्ञान दें और जो भी दोष हमें कष्ट देते हैं, उनका पूर्ण रूप से शमन और नाश करें ॥32॥
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों,
तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,
सकल समाज साज साजे रघुबर के ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ,
देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ॥३३॥
अर्थ: आपके ही अद्भुत बल और पराक्रम से वानर सेना ने युद्ध में रावण को पराजित किया, और आपके द्वारा किए गए संहार से समस्त राक्षस नष्ट होकर तितर-बितर हो गए।
आपके ही सामर्थ्य के कारण श्रीराम ने देवताओं के सभी कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण किए, और रघुनाथ जी की पूरी सेना तथा युद्ध-संबंधी सभी व्यवस्थाओं का साज-सज्जा भी आपने ही किया।
आपके गुणों का श्रवण कर देवता भी भाव-विभोर होकर रोमांचित हो उठते हैं, और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश तक की आँखें भी प्रेम और भक्ति के भाव से भर जाती हैं।
हे वानर-सेनापति! कृपा करके तुलसीदास के मस्तक पर अपना कर-कमल रखें। आप जैसे मर्यादा और करुणा से परिपूर्ण स्वामी अपने दास को कभी दुखी देखकर उपेक्षित नहीं करते ॥33॥
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न,
कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष,
पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ॥
अबु तू हौ अंबुचर, अबु तू हों डिंभ सो न,
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,
तुलसी की बांह पर लामी लूम फेरिये ॥३४॥
अर्थ: मैं तो आपके ही अंशों पर जीवन यापन करने वाला हूँ। यदि मुझसे कोई भूल हो भी जाए, तो कृपया मौन होकर मुझे त्याग मत दीजिए। मैं अत्यंत तुच्छ, निर्धन और पापों से भरा हुआ हूँ, फिर भी आप अपनी कृपा-दृष्टि मुझ पर बनाए रखिए।
हे भोले स्वामी! आपका स्वभाव अत्यंत सरल और भोला है, इसलिए आप छोटी-सी भूल पर भी शीघ्र ही रुष्ट हो जाते हैं। अब आप प्रसन्न होकर मेरा पालन-पोषण कीजिए और मुझे अपना सेवक मानकर कभी भी तिरस्कृत मत कीजिए।
यदि आप जल हैं, तो मैं उसमें रहने वाली एक छोटी मछली हूँ; और यदि आप माता हैं, तो मैं आपका नन्हा-सा बालक हूँ। इसलिए अब और विलंब न कीजिए, क्योंकि मेरा एकमात्र सहारा केवल आप ही हैं।
मुझे व्याकुल बालक के समान समझकर, मेरे प्रेम और समर्पण को स्वीकार कीजिए और मेरी रक्षा कीजिए। हे हनुमान जी! तुलसीदास की पीड़ित भुजा पर अपनी लंबी पूँछ फेरकर उसे आशीर्वाद दीजिए, जिससे उसकी समस्त पीड़ा सदा के लिए समाप्त हो जाए ॥34॥
घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौ,
बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस,
रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ॥
करुनानिधान हनुमान महा बलवान,
हेरि हंसि होकि फूंकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि,
केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ॥३५॥
अर्थ: रोगों, अशुभ योगों और दुष्ट लोगों ने मुझे इस तरह चारों ओर से घेर लिया है, जैसे दिन के समय अचानक काले बादलों का घना समूह आकाश में छा जाए और तेजी से उमड़ पड़े।
जैसे अग्नि जवासे को जला डालती है, वैसे ही ये कष्ट भी पीड़ा रूपी वर्षा बरसाकर मेरे यश और तेज को भीतर ही भीतर झुलसा रहे हैं। बिना किसी अपराध के भी क्रोधपूर्वक मेरा जीवन धुएँ और मैल से भर गया है।
हे करुणा के भंडार, महाबली हनुमान जी! कृपा-दृष्टि से मुझे देखिए, मुस्कराइए और एक फूँक भर से ही इन शत्रु-रूपी सेनाओं को दूर उड़ा दीजिए।
हे केशरीकिशोर वीर! जब कुरोग रूपी क्रूर राक्षस तुलसीदास को निगलने को तत्पर था, तब आपने अपने पराक्रम से मेरी रक्षा की और मेरा जीवन बचाया ॥35॥
सवैया
राम गुलाम तु ही हनुमान
गोसांई सुसांई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौ बाल ज्यों आखर दू
पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ॥
बांह की बेदन बांह पगार
पुकारत आरत आनंद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर
रहौ दरबार परो लटि लूलो ॥३६॥
अर्थ: हे गोस्वामी हनुमान जी! आप परम श्रेष्ठ स्वामी हैं और सदैव श्रीराम भक्तों के हित में रहने वाले अत्यंत कृपालु प्रभु हैं।
आपने मुझे एक बालक की तरह स्नेहपूर्वक पाला-पोसा है। मेरे लिए “राम-राम” ये दो पवित्र अक्षर ही माता-पिता के समान हैं, जिनसे मुझे संपूर्ण मंगल और आनंद की प्राप्ति हुई है।
हे अपनी भुजाओं का आश्रय देने वाले प्रभु! मेरी बाँहों का दर्द अब बहुत बढ़ चुका है। इस पीड़ा के कारण मैं सारा सुख-चैन भूलकर व्याकुल होकर आपको पुकार रहा हूँ।
हे रघुकुल के वीर हनुमान जी! कृपा करके मेरी इस वेदना को दूर कीजिए, ताकि मैं निर्बल और लाचार अवस्था में भी आपके चरणों में पड़ा रह सकूँ ॥36॥
घनाक्षरी
काल की करालता करम कठिनाई कर्थ,
पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे।
बेदन कुभांति सो सही न जाति राति दिन,
सोई बांह गही जो गही समीर डाबरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,
सींचिये मलीन भो तयो है तिहूं तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान,
जानियत सबही की रीति राम रावरे ॥३७॥
अर्थ: न जाने यह काल की भयावहता है, कर्मों की कठोरता है, पापों का प्रभाव है या फिर स्वभाव की किसी उन्मत्त अवस्था का परिणाम है।
दिन-रात अत्यन्त कष्टदायक पीड़ा बनी हुई है, जो सहन नहीं हो पा रही है, और उसी बाँह को थामे हुए हैं, जिसे कभी पवनकुमार श्री हनुमान जी ने अपने हाथों से पकड़ा था।
तुलसी रूपी यह वृक्ष आपने ही रोपा था, जो अब तीनों तापों की अग्नि से झुलसकर मुरझा गया है। कृपा करके इस ओर दृष्टि डालें और अपनी करुणा रूपी जलधारा से इसे पुनः सींच दें।
हे दया के भंडार श्रीराम! आप भूत, वर्तमान और भविष्य—सबके, अपने और पराए सभी के जीवन की स्थिति और रहस्य को भली-भाँति जानते हैं ॥37॥
पंय पीर पेट पीर बह पीर मुंह पीर,
जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ॥
हौ तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें,
ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुंभज के कंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि,
हाय राम राय ऐसी हाल कहूं भई है ॥३८॥
अर्थ: पाँवों की पीड़ा, पेट की पीड़ा, भुजाओं की पीड़ा और मुख की पीड़ा—मेरा सारा शरीर दुखों से भरकर बिल्कुल जीर्ण-शीर्ण हो गया है।
देवता, भूत, पितर, कर्म, दुष्ट लोग, काल और ग्रह—ये सभी एक साथ मुझ पर टूट पड़े हैं, जैसे मुझ पर तोपों की कतार से लगातार प्रहार हो रहा हो।
मैं तो स्वयं को बलि चढ़ा चुका हूँ; बचपन से ही बिना किसी मूल्य के मैं पूरी तरह आपका हो चुका हूँ। मैंने अपने मस्तक पर राम नाम का ही आश्रय अंकित कर लिया है।
हाय! हे राजा रामचन्द्र जी! क्या कभी ऐसा हुआ है कि अगस्त्य मुनि का कोई सेवक गाय के खुर के गड्ढे में डूबकर इस तरह व्याकुल हो जाए? ॥38॥
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,
मुंहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग,
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ॥
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ,
जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी संभारि ताडका संहारि भारि भट,
बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ॥३९॥
अर्थ: बाँह की पीड़ा नीच राक्षस सुबाहु के समान है, शरीर की दुर्बलता मारीच जैसी प्रतीत होती है, मुख की पीड़ा ताड़का जैसी है और अन्य प्रकार के बुरे रोग केतुज (ग्रहजन्य) राक्षसों के समान लगते हैं। ये सभी मिलकर मुझे निरंतर कष्ट दे रहे हैं।
मैं प्रेमपूर्वक रामनाम-जप रूपी यज्ञ करना चाहता हूँ, लेकिन ये कालदूत जैसे भूत-प्रेत और रोग मुझे अपने वश में नहीं करने दे रहे हैं।
जिस दो अक्षरों की महान कीर्ति से सारा संसार जाग्रत हो उठता है, अब मैं उन्हीं का स्मरण करता हूँ—वही अब मेरी रक्षा करेंगे और मेरी सहायता बनेंगे।
हे तुलसी! ताड़का का वध करने वाले उस महान योद्धा श्रीराम का ध्यान करो। वे इन रोग-रूपी राक्षसों को अपने बाणों से उसी प्रकार भेद देंगे, जैसे बरगद के फल को तीर आसानी से भेद देता है। ॥39॥
बालपने सूथे मन राम सनमुख भयो,
राम नाम लेत मांगि खात टूकटाक हां ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय,
मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौ ॥
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,
अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौ ।
तुलसी गुसांई भयो भोंडे दिन भूल गयो,
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥४०॥
अर्थ: अपने बाल्यकाल से ही मैं सरल और निष्कपट भाव के साथ श्रीरामचन्द्रजी के समक्ष उपस्थित रहता था और मुख से निरंतर रामनाम का जप करते हुए छोटे-छोटे टुकड़ों पर निर्भर होकर अपना जीवन चलाता था।
किन्तु जब मैं सांसारिक जीवन और लोक-व्यवहार में उलझ गया, तब मोह के वशीभूत होकर मैंने श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की उस पवित्र प्रीति को त्याग दिया और संसार के भोग-विलास में डूब गया।
जब मैं गलत और अनैतिक आचरण करने लगा, तब अंजनीनन्दन श्री हनुमान जी ने मुझे अपनाया और श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र हस्तों के माध्यम से मेरा उद्धार कराया।
इसके पश्चात मैं तुलसीदास कहलाया। मेरे सभी पूर्व के बुरे दिन मानो समाप्त हो गए और अब मैं अपने कर्मों का उचित फल भोग रहा हूँ। ॥40॥
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,
देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो,
दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ॥
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो,
बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को |
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ॥४१॥
अर्थ: मुझे भोजन और वस्त्र से रहित, गहरे विषाद में डूबा हुआ, अत्यंत दीन और दुर्बल अवस्था में देखकर कौन ऐसा था जो करुणा से “हाय-हाय” न करता?
ऐसे अनाथ तुलसी को दयासागर रघुनाथजी ने अपना सनाथ बनाकर सहारा दिया और अपनी करुणा से उसे उत्तम फल प्रदान किया।
लेकिन इसी बीच यह नीच (मैं) सम्मान पाकर अहंकार से भर गया और तन, मन और वाणी से प्रभु का भजन छोड़ बैठा।
इसी कारण अब शरीर में घोर पीड़ा और फोड़े-फुंसियों के रूप में यह प्रतीत होता है मानो राजा रामचंद्रजी का नमक-ऋण टूट-टूटकर बाहर निकल रहा हो। ॥41॥
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन,
मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूं हाथ मोदक हैं ऐसे ठांउ,
जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को
मोको झूटो सांचो लोग राम को कहत सब,
मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर ते बिहाल होत,
सोऊ रघुबीर बिनु सके दूर करि को ॥४२॥
अर्थ: मैं संसार में जानकी-जीवन श्रीराम का दास कहलाकर जीवन बिताऊँ और मृत्यु के समय काशी तथा गंगा (सुरसरि) के तट की प्राप्ति हो जाए।
ऐसी स्थिति में तुलसीदास के लिए दोनों हाथों में लड्डू हैं—अर्थात जीवन और मृत्यु, दोनों ही शुभ हैं। इनके होने या न होने से किसी प्रकार की चिंता का कारण नहीं रहता।
लोग मुझे सच्चा या झूठा, जैसा भी कहें, मैं स्वयं को केवल राम का ही दास मानता हूँ। मेरे मन में यह दृढ़ विश्वास है कि मैं न शिव का हूँ, न विष्णु का—मैं केवल श्रीराम का ही हूँ।
शरीर की तीव्र और असहनीय पीड़ा से मैं अत्यंत व्याकुल हूँ। इस पीड़ा को श्रीरघुवीर के अतिरिक्त और कौन दूर कर सकता है? ॥42॥
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,
हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ॥
व्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की,
समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,
रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कैः ॥४३॥
हे हनुमान जी! सीतापति श्रीराम सदा आपके सहायक हैं और हितोपदेश देने वाले महादेव आपके गुरु के समान हैं।
मैं मन, वचन और शरीर से आपके चरणों की शरण में हूँ। आपके ही भरोसे रहते हुए मैंने किसी भी देवता को अलग से देवता मानकर पूजा नहीं की।
यदि रोग, भूत-प्रेत या किसी दुष्ट शक्ति के कारण कोई कष्ट उत्पन्न हुआ हो, तो उसे दूर कर दीजिए और अपने इस तुलसी नामक सेवक पर कृपा करते हुए उसे शांत कर दें।
हे कपिनाथ! हे रघुनाथ के प्रिय! हे भोलानाथ और भूतनाथ! आप इस रोग-रूपी विशाल सागर को गाय के खुर के बराबर छोटा क्यों नहीं कर देते? ॥43॥
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों,
कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई,
बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ॥
माया जीव काल के करम के सुभाय के,
करैया राम बेद कहैं सांची मन गुनिये ।
तुम्ह तं कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि,
हौ हूं रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ॥४४॥
अर्थ: मैं श्री हनुमान जी से, सुजान राजा राम से और कृपानिधान भगवान शंकर से विनम्र निवेदन करता हूँ कि कृपा करके ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनिए।
यह संसार हर्ष और विषाद, राग और द्वेष, गुण और दोष से भरा हुआ है। यह सब सृष्टि विधाता ने ही रचा है, और यह बात प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देती है।
वेदों में कहा गया है कि माया, जीव, काल, कर्म और स्वभाव—इन सबके मूल कर्ता श्रीराम ही हैं। इस सत्य को मैंने अपने मन से पूरी तरह स्वीकार कर लिया है।
अब आप ही मुझे यह समझाइए कि ऐसा क्या है जो आपसे संभव नहीं है। तब मैं यह जानकर शांत हो जाऊँगा कि जैसा बोया है, वैसा ही काट रहा हूँ। ॥44॥
॥ इति श्री हनुमान बाहुक सम्पूर्णं ॥
हनुमान बाहुक पाठ के लाभ
हनुमान बाहुक पाठ के लाभ को लोग सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं मानते, बल्कि इसे जीवन से जुड़े अनुभवों से भी जोड़कर देखते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया यह पाठ इंसान को अंदर से मजबूत बनाता है और मुश्किल समय में सहारा देता है।
सबसे बड़ा फायदा यह माना जाता है कि यह पाठ कष्ट और परेशानियों को कम करने में मदद करता है। जब इंसान बार-बार भगवान हनुमान का स्मरण करता है, तो उसके अंदर हिम्मत और धैर्य बढ़ता है, जिससे समस्याओं का सामना करना आसान हो जाता है।
इसके साथ ही, नियमित पाठ करने से मानसिक शांति मिलती है। दिनभर की भागदौड़ और तनाव के बीच जब कुछ समय भगवान के नाम में बिताया जाता है, तो मन धीरे-धीरे शांत होने लगता है और बेचैनी कम होती है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह पाठ नकारात्मक ऊर्जा को दूर करके सकारात्मक सोच बढ़ाने में मदद करता है। जब सोच पॉजिटिव होती है, तो इंसान अपने काम पर ज्यादा ध्यान दे पाता है, जिससे जीवन में सफलता और तरक्की के रास्ते खुलते हैं।
कई लोग यह भी मानते हैं कि हनुमान बाहुक का नियमित पाठ करने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और आर्थिक स्थिति बेहतर होने लगती है। हालांकि यह पूरी तरह आस्था पर आधारित है, लेकिन इससे मिलने वाली मानसिक मजबूती और आत्मविश्वास ही असली ताकत बन जाते हैं।
कुल मिलाकर, यह पाठ सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन को संभालने और जीवन में संतुलन बनाए रखने का एक आसान और असरदार तरीका माना जाता है।
हनुमान बाहुक पाठ का महत्व (hanuman bahuk path ka mahatva)
हनुमान बाहुक पाठ का महत्व केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि यह जीवन में कठिन समय से लड़ने की मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति भी देता है। यह व्यक्ति को अंदर से मजबूत बनाता है और विश्वास जगाता है कि हर समस्या का समाधान संभव है।
हनुमान बाहुक पाठ करने की विधि
हनुमान बाहुक पाठ की विधि सरल है, लेकिन इसे श्रद्धा और नियम से करना जरूरी माना गया है।
सुबह ब्रह्ममुहूर्त या शाम के समय स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें
घर के मंदिर में हनुमान जी की प्रतिमा या चित्र के सामने बैठें
दीपक जलाकर वातावरण शांत करें
एक पात्र में स्वच्छ जल रखकर अपने सामने रखें
सबसे पहले भगवान श्रीराम का स्मरण करें
“ॐ नमो भगवते हनुमते नमः” मंत्र का 3 या 11 बार जाप करें
इसके बाद बिना रुकावट श्रद्धा से हनुमान बाहुक का पाठ करें
पाठ पूरा होने पर अपनी समस्या और कष्टों के निवारण की प्रार्थना करें
अंत में रखा हुआ जल ग्रहण करें और अगले दिन नया जल रखें
ऐसा आपको कम से कम 11 दिन करना है। गंभीर कष्ट या रोगों के लिए 21 या 40 दिन तक करने की सलाह दी जाती है। मंगलवार और शनिवार को इसका पाठ विशेष रूप से श्रेष्ठ माना जाता है
हनुमान बाहुक पाठ को श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो यह केवल एक धार्मिक स्तोत्र नहीं, बल्कि जीवन की गंभीर बीमारियों, मानसिक तनाव और बाधाओं में एक रामबाण उपाय माना जाता है। यह व्यक्ति को न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी मजबूत बनाता है।
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