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फ्रांसिस्को डी मिरांडा से मारिया मचाडो तक: आखिर क्यों 250 साल से लैटिन अमेरिका के मामलों में दखल देता रहा है अमेरिका?

वेनेजुएला में निकोलस मादुरो सरकार के पतन, आर्थिक प्रतिबंधों, विपक्षी ताकतों को मिले समर्थन ने यह बहस फिर तेज कर दी है कि क्या अमेरिका आज भी अपने पड़ोसी क्षेत्र को अपने प्रभाव क्षेत्र यानी 'बैकयार्ड' की तरह देखता है।

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लैटिन अमेरिकी देशों में अमेरिकी दखल क्यों?
Edited by: Shiv Shukla
Updated Jul 16, 2026, 01:54 IST

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद से अमेरिका ने लैटिन अमेरिकी देशों में अपना सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक हस्तक्षेप तेज कर दिया है। इन तीनों पहलुओं की सबसे स्पष्ट झलक जनवरी 2026 में वेनेजुएला के तत्कालीन राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिका द्वारा गिरफ्तारी की घटना में देखने को मिली। इन घटनाओं ने एक बार फिर उस पुराने सवाल को दुनिया के सामने ला खड़ा किया है, जो पिछले ढाई सौ वर्षों से बार-बार पूछा जाता रहा है कि आखिर अमेरिका लैटिन अमेरिकी देशों के आंतरिक मामलों में इतना दिलचस्पी क्यों लेता है?

दिलचस्प बात यह है कि यह कहानी डोनाल्ड ट्रंप, मादुरो या मारिया कोरिना मचाडो से शुरू नहीं होती। इसकी जड़ें 19वीं सदी की शुरुआत में उस दौर तक जाती हैं,जब वेनेजुएला के क्रांतिकारी नेता फ्रांसिस्को डी मिरांडा अमेरिकी नेताओं से मदद मांगने वाशिंगटन पहुंचे थे।

जब अमेरिका खुद एक उभरती शक्ति था

साल 1776 में स्वतंत्रता हासिल करने के बाद अमेरिका सिर्फ 13 उपनिवेशों का देश था। लेकिन उसके संस्थापक नेताओं के मन में शुरू से ही विस्तारवादी सोच मौजूद थी। उनका लक्ष्य सिर्फ अपने भूभाग की सुरक्षा नहीं, बल्कि पूरे पश्चिमी गोलार्ध में प्रभाव स्थापित करना भी था। उस समय उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के बड़े हिस्से पर स्पेन, ब्रिटेन और फ्रांस जैसे यूरोपीय साम्राज्यों का नियंत्रण था। अमेरिका के लिए यह सिर्फ राजनीतिक चुनौती नहीं थी, बल्कि आर्थिक अवसर भी था।

दक्षिण अमेरिका सोना, चांदी, कॉफी, कोको, चीनी और अन्य बहुमूल्य संसाधनों का बड़ा स्रोत था। अमेरिका के व्यापारिक वर्ग और निवेशक इन बाजारों तक पहुंच चाहते थे, लेकिन स्पेन के औपनिवेशिक नियंत्रण के कारण यह आसान नहीं था। इसी दौर में वेनेजुएला के क्रांतिकारी नेता फ्रांसिस्को डी मिरांडा अमेरिकी राजनीति के संपर्क में आए।

कौन थे फ्रांसिस्को डी मिरांडा?

फ्रांसिस्को डी मिरांडा को अक्सर "लैटिन अमेरिकी स्वतंत्रता आंदोलनों का अग्रदूत" कहा जाता है। उन्होंने अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटेन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। बाद में वे फ्रांसीसी क्रांति में भी शामिल हुए। यूरोप और अमेरिका के राजनीतिक आंदोलनों में सक्रिय रहने के कारण उन्हें अपने समय का सबसे अंतरराष्ट्रीय क्रांतिकारी नेता माना जाता था।

उनका सबसे बड़ा सपना था स्पेनिश शासन से वेनेजुएला और दक्षिण अमेरिका को मुक्त कराना। मिरांडा को विश्वास था कि अमेरिका, जिसने खुद औपनिवेशिक शासन के खिलाफ लड़कर स्वतंत्रता हासिल की है, वह उनके संघर्ष का समर्थन करेगा। मिरांडा ने दो दशकों से अधिक समय तक अमेरिका में सहयोगियों की तलाश की। उनका उद्देश्य दक्षिण अमेरिका में गणतंत्र की स्थापना और काराकास सहित अन्य क्षेत्रों में स्पेनिश औपनिवेशिक शासन को समाप्त करना था। उन्होंने अमेरिकी प्रभावशाली नेताओं से इतने मजबूत संबंध बनाए कि अमेरिका के पहले वित्त मंत्री अलेक्जेंडर हैमिल्टन उनके प्रमुख समर्थकों में शामिल हो गए। वर्ष 1784 में हैमिल्टन ने मिरांडा को उन प्रभावशाली लोगों की सूची भेजी, जो दक्षिण अमेरिका में हस्तक्षेप के पक्षधर हो सकते थे।

इसके बाद 1798 में जब हैमिल्टन को अमेरिकी सेना का महानिरीक्षक नियुक्त किया गया, तब उन्होंने संकेत दिया कि हाल ही में विस्तारित अमेरिकी सेना स्पेन के नियंत्रण वाले क्षेत्रों पर कब्जा करने का माध्यम बन सकती है। हालांकि उस समय यह योजना साकार नहीं हुई, लेकिन मिरांडा को यह विश्वास हो गया कि अमेरिकी नेतृत्व उनके विचारों के प्रति सहानुभूति रखता है। 19वीं सदी की शुरुआत तक स्पेन के अधीन वह क्षेत्र (जो आगे चलकर वेनेजुएला बना) औपनिवेशिक शासन के खिलाफ आंदोलनों से प्रभावित होने लगा था। रक्षा खर्च बढ़ने, किलों के निर्माण और स्थानीय मिलिशिया तैयार करने के कारण स्पेन ने कर बढ़ा दिए, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा। इससे पहले 18वीं सदी के अंतिम दशकों में कई कर-विरोधी विद्रोह भी हो चुके थे।स्पेन के व्यापारिक एकाधिकार तथा सरकारी पदों पर केवल स्पेन में जन्मे अधिकारियों की नियुक्ति को लेकर भी व्यापक असंतोष था।

क्रांतिकारी योजना की शुरुआत

अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अमेरिका में आम तौर पर दक्षिण अमेरिकी उपनिवेशों के लोगों के प्रति सहानुभूति थी, हालांकि वहां की राजनीतिक परिस्थितियों की समझ सीमित थी। इसके साथ ही अमेरिकी निवेशक दक्षिण अमेरिका के चांदी के व्यापार तक पहुंच चाहते थे और वेनेजुएला की कॉफी, कोको तथा इंडिगो पर स्पेन के एकाधिकार का अंत भी चाहते थे। आज की तरह उस समय भी आर्थिक हित अमेरिकी रुचि का प्रमुख कारण थे।

इसी पृष्ठभूमि में 1805 की शरद ऋतु में मिरांडा न्यूयॉर्क पहुंचे। उनका उद्देश्य स्वतंत्रता संग्राम के लिए सहयोगी जुटाना था। मिरांडा ने अपने पुराने मित्र विलियम स्मिथ से मुलाकात की, जो पूर्व राष्ट्रपति जॉन एडम्स के दामाद भी थे। न्यूयॉर्क बंदरगाह के सर्वेक्षक के रूप में कार्यरत स्मिथ ने उनकी मुलाकात धनी व्यापारी सैमुअल ओग्डेन से कराई, जो सशस्त्र जहाजों के साथ अक्सर हैती जाया करते थे।

स्मिथ और ओग्डेन ने सलाह दी कि मिरांडा पहले वाशिंगटन जाकर अमेरिकी सरकार का आधिकारिक समर्थन हासिल करें, उसके बाद वेनेजुएला की सरकार को उखाड़ फेंकने की योजना पर आगे बढ़ें। व्हाइट हाउस पहुंचने पर मिरांडा ने मंत्रिमंडल की बैठक में हिस्सा लिया और राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन के साथ रात्रिभोज भी किया। दोनों के बीच क्रांति पर चर्चा हुई। जेफरसन ने स्वतंत्रता के प्रति सहानुभूति जताई और कहा कि यह परिवर्तन जल्द ही होगा।

बाद में जेफरसन ने अमेरिका में स्पेन के राजदूत डॉन वेलेंटिन डी फोरोंडा को लिखा कि उनकी सरकार को इस बात का कोई संदेह नहीं था कि मिरांडा अमेरिका से लोगों की भर्ती करना चाहते हैं। यह मानना हालांकि कठिन है कि जेफरसन को मिरांडा की वास्तविक योजना की भनक न लगी हो। राजधानी के राजनीतिक और कारोबारी हलकों में उनके अभियान की व्यापक रूप से चर्चा हो रही थी।

वाशिंगटन के व्यापारी और निवेशक विलियम मेन डंकैनसन ने तो स्वयं जेफरसन से इस अभियान में शामिल होने की इच्छा भी जताई थी, क्योंकि उन्हें विश्वास था कि राष्ट्रपति मिरांडा की योजना के प्रति सहानुभूति रखते हैं। फिर भी जेफरसन अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय कानून का भी ध्यान रखते थे। इसलिए उन्होंने कई वर्षों तक स्पेन को यह भरोसा दिलाने की कोशिश की कि अमेरिकी सरकार इस अभियान के आयोजन में शामिल नहीं थी।

विदेश में विफलता, देश में राजनीतिक विवाद

जनवरी 1806 की शुरुआत में मिरांडा आधिकारिक समर्थन के बिना न्यूयॉर्क लौट आए। फिर भी उन्हें विश्वास था कि जेफरसन प्रशासन का मौन समर्थन उन्हें प्राप्त है। इसके बाद मिरांडा, स्मिथ और ओग्डेन ने ’लीएंडर’ नामक एक व्यापारी जहाज को सैन्य सामग्री और लगभग 200 लोगों के साथ तैयार किया। इनमें से कई लोगों को अपने अभियान के वास्तविक उद्देश्य की पूरी जानकारी भी नहीं थी। दो फरवरी 1806 को यह जहाज न्यूयॉर्क से रवाना हुआ और अमेरिकी समाचारपत्रों में इसके गंतव्य तथा अभियान को लेकर अटकलें शुरू हो गईं।

फिलाडेल्फिया गजट में 22 फरवरी को विदेश मंत्री जेम्स मैडिसन से जुड़े कई सवाल प्रकाशित हुए। ऐसा माना गया कि यह लेख स्पेन के राजदूत की ओर से भेजा गया था। इसमें जेफरसन और मैडिसन पर मिरांडा की गतिविधियों को मौन स्वीकृति देने का आरोप लगाया गया। देश और विदेश दोनों जगह जवाबदेही से बचने के लिए जेफरसन ने ओग्डेन और स्मिथ के खिलाफ मुकदमा चलाने का निर्णय लिया। दोनों को गिरफ्तार किया गया और उसी वर्ष संघीय अदालत में मुकदमा चला, लेकिन सहानुभूतिपूर्ण जूरी ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।

उधर, मिरांडा के अभियान में शामिल कई लोगों को वेनेजुएला के तट के निकट स्पेनिश सैनिकों ने गिरफ्तार कर लिया। विद्रोह के आरोप में उन पर मुकदमा चला। अधिकांश को कारावास मिला, जबकि 10 लोगों को फांसी दे दी गई। मिरांडा किसी तरह अरूबा भाग निकले। बाद में 1810 में शुरू हुए वेनेजुएला के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और कुछ समय के लिए देश का नेतृत्व भी किया। हालांकि बाद में उनके शिष्य और महान स्वतंत्रता सेनानी सिमोन बोलिवार ने उन पर स्पेन के साथ समझौता करने का आरोप लगाया और उन्हें स्पेनिश अधिकारियों के हवाले कर दिया। मिरांडा की 1816 में स्पेन की एक जेल में मृत्यु हो गई।

मुनरो सिद्धांत: अमेरिका ने पश्चिमी गोलार्ध को अपना क्षेत्र माना

फिर 1823 में राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने एक नीति पेश की, जिसे बाद में "मुनरो सिद्धांत" कहा गया। इस सिद्धांत का मूल संदेश था कि यूरोपीय शक्तियां अमेरिका महाद्वीप के देशों के मामलों में हस्तक्षेप न करें। पहली नजर में यह नीति लैटिन अमेरिकी देशों की सुरक्षा के लिए बनाई गई लगती थी, लेकिन धीरे-धीरे इसका दूसरा अर्थ निकलने लगा, यदि यूरोप यहां हस्तक्षेप नहीं करेगा, तो इस क्षेत्र में सबसे प्रभावशाली शक्ति अमेरिका ही होगा।

यहीं से अमेरिका ने खुद को पश्चिमी गोलार्ध का संरक्षक और निर्णायक शक्ति मानना शुरू कर दिया।

20वीं सदी, जब हस्तक्षेप की राजनीति का हुआ विस्तार

20वीं सदी में अमेरिका का लैटिन अमेरिका में हस्तक्षेप कहीं अधिक खुलकर सामने आया। 1904 में राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट ने मोनरो सिद्धांत का विस्तार करते हुए कहा कि यदि किसी लैटिन अमेरिकी देश में अस्थिरता पैदा होती है, तो अमेरिका वहां हस्तक्षेप कर सकता है। इसके बाद अमेरिका ने क्यूबा, निकारागुआ, हैती, डोमिनिकन रिपब्लिक और पनामा जैसे देशों में सैन्य हस्तक्षेप किए। पनामा नहर इसका सबसे बड़ा उदाहरण थी। अमेरिका ने नहर निर्माण और उसके नियंत्रण को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक व्यापार के लिए आवश्यक माना।

शीत युद्ध और साम्यवाद का डर

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ। इस दौर में अमेरिका के लिए लैटिन अमेरिका सिर्फ पड़ोसी क्षेत्र नहीं रहा, बल्कि वैचारिक संघर्ष का मैदान बन गया। 1959 में क्यूबा की क्रांति और फिदेल कास्त्रो के सत्ता में आने के बाद अमेरिका को डर था कि साम्यवाद पूरे क्षेत्र में फैल सकता है।इसके बाद अमेरिका ने कई देशों में वामपंथी सरकारों और आंदोलनों के खिलाफ कार्रवाई का समर्थन किया। 1954 में ग्वाटेमाला में सरकार परिवर्तन, 1961 में क्यूबा के खिलाफ बे ऑफ पिग्स अभियान, 1973 में चिली के राष्ट्रपति साल्वाडोर आयेंदे की सरकार के पतन और निकारागुआ में कॉन्ट्रा विद्रोहियों को समर्थन जैसे उदाहरण अक्सर इस संदर्भ में दिए जाते हैं।

तेल, खनिज और बाजार की राजनीति भी है अमेरिकी रुचि का कारण

दरअसल, लैटिन अमेरिका दुनिया के सबसे संसाधन संपन्न क्षेत्रों में से एक है। वेनेजुएला के पास दुनिया के सबसे बड़े तेल भंडारों में से एक है। चिली तांबे का प्रमुख उत्पादक है। बोलिविया के पास विशाल लिथियम भंडार हैं, जबकि ब्राजील कृषि और खनिज उत्पादन की बड़ी शक्ति है। इन संसाधनों ने ही अमेरिका की रणनीतिक रुचि को हमेशा लैटिन अमेरिका में बनाए रखा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि लोकतंत्र, मानवाधिकार और सुरक्षा जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण जरूर होते हैं, लेकिन ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार और निवेश जैसे आर्थिक हित भी अमेरिकी नीतियों को प्रभावित करते हैं।

वेनेजुएला क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

वेनेजुएला लंबे समय से अमेरिका की लैटिन अमेरिकी नीति का केंद्र रहा है। एक समय वेनेजुएला अमेरिका को तेल निर्यात करने वाले सबसे बड़े देशों में शामिल था। लेकिन ह्यूगो शावेज और बाद में निकोलस मादुरो के शासन के दौरान दोनों देशों के संबंध लगातार खराब होते गए। अमेरिका ने मादुरो सरकार पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने, चुनावों में गड़बड़ी और ड्रग्स का व्यापार करने के आरोप लगाए। दूसरी तरफ मादुरो सरकार का आरोप रहा कि अमेरिका वेनेजुएला की सरकार बदलना चाहता है ताकि देश के तेल संसाधनों और राजनीतिक दिशा पर प्रभाव स्थापित किया जा सके।

मारिया कोरिना मचाडो और नया अध्याय

वेनेजुएला की विपक्षी नेता मारिया कोरिना मचाडो को पश्चिमी देशों में लोकतांत्रिक बदलाव की आवाज के रूप में देखा जाता है। मचाडो वर्ष 2025 के नोबेल शांति पुरस्कार की विजेता हैं और लंबे समय से मादुरो की प्रमुख आलोचक रही हैं। आज की मचाडो की तरह मिरांडा का उद्देश्य भी अमेरिकी समर्थन हासिल करना था। उनकी रणनीति और फ्रांसिस्को डी मिरांडा की राजनीति के बीच कई इतिहासकार समानताएं देखते हैं।

दोनों नेताओं ने अपने देश में राजनीतिक बदलाव के लिए अमेरिकी समर्थन को महत्वपूर्ण माना। दोनों ने यह विश्वास जताया कि बाहरी समर्थन घरेलू सत्ता संरचना को बदलने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है।हालांकि दोनों दौरों में एक बड़ा अंतर भी है।मिरांडा के समय अमेरिका खुद एक उभरती हुई शक्ति था, जबकि आज वह दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य शक्तियों में शामिल है।

फ्रांसिस्को डी मिरांडा और मारिया मचाडो में क्या समानता

फ्रांसिस्को डी मिरांडा और मारिया मचाडो के बीच दो सदियों से अधिक का अंतर है, लेकिन दोनों में एक समानता मौजूद है और वह है स्थानीय राजनीतिक ताकतों का अमेरिकी समर्थन की ओर देखना।फर्क सिर्फ इतना है कि आज दुनिया पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल और बहुध्रुवीय हो चुकी है। लैटिन अमेरिकी देशों में भी राष्ट्रीय संप्रभुता और बाहरी हस्तक्षेप के खिलाफ राजनीतिक भावना काफी मजबूत हुई है।इसके बावजूद अमेरिका का प्रभाव अभी भी क्षेत्र की राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा संरचना में गहराई से मौजूद है।

अमेरिकी दखल के ये भी हैं कारण

विशेषज्ञ आमतौर पर इसके पीछे चार प्रमुख कारण बताते हैं-

सुरक्षा

अमेरिका नहीं चाहता कि उसके निकटवर्ती क्षेत्र में कोई ऐसी शक्ति प्रभावशाली हो जाए, जिसे वह अपने हितों के खिलाफ मानता हो।

आर्थिक हित

ऊर्जा संसाधन, व्यापारिक मार्ग और निवेश के अवसर अमेरिकी नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।

वैचारिक कारण

अमेरिका लंबे समय से खुद को लोकतंत्र और उदार राजनीतिक व्यवस्था का समर्थक बताता रहा है।

भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा

पहले सोवियत संघ और अब चीन तथा रूस की बढ़ती मौजूदगी भी अमेरिका की चिंताओं में शामिल है।

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