Mystic Saint Devaraha Baba: वृंदावन का नाम आते ही सबसे पहले बांके बिहारी मंदिर, राधा-कृष्ण की लीलाएं और यमुना का किनारा सामने आता है, लेकिन यमुना के दूसरे किनारे एक ऐसी जगह भी है, जिसका नाम आते ही एक रहस्यमयी संत की तस्वीर सामने आती है। यह जगह है देवराहा बाबा का आश्रम। देवराहा बाबा को संतों की परंपरा में एक ऐसे योगी के रूप में याद किया जाता है, जिनका जीवन साधना, योग और रहस्यमयी घटनाओं से जुड़ी कथाओं से भरा रहा। बाबा अक्सर ऊंची लकड़ी की मचान पर विराजमान रहते थे। देश के बड़े नेता, राजनेता और आम लोग तक उनके दर्शन और आशीर्वाद के लिए पहुंचते थे।
शुद्ध बोध थे बाबा
देवराहा बाबा कहते थे कि ‘न मैं स्त्री हूं, न मैं पुरुष हूं, न मैं देवता हूं, न मैं यक्ष हूं और न ही दानव हूं। मैं शुद्ध बोध हूं।’ बाबा अपने स्वरूप को किसी सामान्य सांसारिक पहचान से नहीं जोड़ते थे। उनकी वाणी में आत्मबोध और परमात्मा की अनुभूति को प्रमुख स्थान मिलता था। ‘ॐ देवराहाय दिगंबराय मंचासीनाय नमो नमः।’ मचान पर बैठने के कारण बाबा की पहचान भी देशभर में अलग तरीके से बनी। भक्तों के लिए उनकी मचान ही उनके दर्शन का प्रमुख स्थान बन गई थी।
देवराहा बाबा को क्यों कहा गया 'मचान वाले बाबा'
देवराहा बाबा का ज्यादातर समय ऊंची मचान पर बीतता था। वह नीचे जमीन पर बैठने की बजाय मचान से ही भक्तों को दर्शन और आशीर्वाद देते थे।उनके आशीर्वाद देने का तरीका भी अलग था। बाबा अपने पैर आगे बढ़ाकर भक्तों को आशीर्वाद देते थे। यही वजह रही कि उनकी तस्वीरों में अक्सर उन्हें मचान पर बैठे हुए देखा गया। उनकी एक प्रसिद्ध मचान देवरिया के पास सरयू नदी के किनारे भी रही। नदी के किनारे के लिए ग्रामीण भाषा में देवरा शब्द का इस्तेमाल होता है। इसी से बाबा के नाम के साथ देवरिया और देवराहा पड़ा।
मन की बात पहले ही जान लेते थे बाबा
देवराहा बाबा एक अंतर्यामी संत थे। उनके दर्शन पाने वालों के अनुसार, बाबा सामने वाले के सवाल पूछने से पहले ही उसका जवाब दे देते थे। देश के बड़े नेता हों या सामान्य भक्त, बाबा के सामने सभी एक समान रहते थे। उनके लिए हर व्यक्ति 'बच्चा' था। बाबा के आश्रम से जुड़ी एक कथा नाग और चिड़िया के घोंसले की भी है। कथा के अनुसार एक बार एक नाग चिड़िया के घोंसले की तरफ बढ़ रहा था। बाबा ने उसे वहां जाने से रोक दिया और कहा कि यहां रहने वाले सभी जीवों का जीवन महत्वपूर्ण है। नाग ने सिर झुकाया और वहां से चला गया। बाबा पेड़-पौधों और यहां तक कि पशु-पक्षियों की भी भाषा समझते थे।
बाबा के हृदय में राम, सामने यमुना के उस पार कृष्ण
देवराहा बाबा का आश्रम यमुना के किनारे था। यमुना के दूसरी तरफ वृंदावन और बांके बिहारी का धाम है। एक तरफ वृंदावन में कृष्ण की भक्ति थी तो दूसरी तरफ बाबा के आश्रम में श्रीराम का नाम गूंजता था। बाबा कृष्ण और राम दोनों की भक्ति करते थे।
राम मंदिर को लेकर देवराहा बाबा की भविष्यवाणी
देवराहा बाबा ने कई दशकों पहले ही राम मंदिर निर्माण की भविष्यवाणी कर दी थी। उनसे जुड़े लोगों के अनुसार बाबा ने कहा था कि अयोध्या में रामलला का मंदिर बनेगा और अंततः वहां मंदिर निर्माण का रास्ता खुलेगा।
राजीव गांधी के साथ भी जुड़ा है देवराहा बाबा का प्रसंग
देवराहा बाबा से जुड़ी चर्चित कथाओं में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का प्रसंग भी आता है। जानकारों के अनुसार राजीव गांधी बाबा से मिलने के लिए वृंदावन आना चाहते थे। उनकी सुरक्षा के लिए आश्रम के आसपास हेलीपैड बनाने की योजना पर चर्चा हुई। इसके लिए कुछ पेड़ों को काटने की जरूरत पड़ी। लोगों ने बताया कि उस समय एक पेड़ ने बाबा से अपनी रक्षा की गुहार लगाई और बाबा ने उसे आश्वस्त किया कि उसे कोई नुकसान नहीं होगा। अगले दिन राजीव गांधी का कार्यक्रम रद्द होने की खबर आई और पेड़ बच गया।
देश के प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद के बारे में की थी भविष्यवाणी
देवराहा बाबा की उम्र और उनकी भविष्यवाणियों से जुड़ी सबसे चर्चित कथाओं में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद का प्रसंग भी आता है। राजेंद्र प्रसाद बचपन में अपने परिवार के साथ बाबा से मिलने गए थे। उस समय बाबा ने बालक राजेंद्र प्रसाद के भविष्य को लेकर कहा था कि यह बालक देश के बड़े पद पर आसीन होगा और अंत में ऐसा ही हुआ। राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने। जब राजेंद्र प्रसाद बाबा से दोबारा मिले तो उन्होंने कहा कि बचपन में भी उन्होंने बाबा को ऐसे ही देखा था।
अटल बिहारी वाजपेयी को भी दिया था आशीर्वाद
कथा के अनुसार अटल बिहारी वाजपेयी बाबा से मिलने पहुंचे तो बाबा ने उन्हें आशीर्वाद देते हुए कहा था कि एक दिन वह देश का नेतृत्व करेंगे। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी ने ऐसी संभावना दूर-दूर तक दिखाई न देने की बात कही थी, बाद में वह देश के प्रधानमंत्री बने। वहीं, एक बार लाल कृष्ण आडवाणी बाबा से मिलने पहुंचे थे। बाबा ने उन्हें कठिन रास्ते पर चलते रहने और अपने संकल्प से पीछे न हटने का आशीर्वाद दिया। राम मंदिर आंदोलन के दौरान आडवाणी की रथयात्रा और बाद में अयोध्या में राम मंदिर निर्माण हुआ।
कैसे मिला कांग्रेस को चुनाव चिह्न
देवराहा बाबा की सबसे चर्चित राजनीतिक कथाओं में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ा प्रसंग भी है। आपातकाल के बाद के राजनीतिक दौर में इंदिरा गांधी के बाबा से मिलने पहुंचीं। कथा के अनुसार इंदिरा गांधी अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर बाबा के पास पहुंचीं। बाबा ने उन्हें हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। इंदिरा गांधी ने बाबा के हाथ की ओर देखते हुए उनसे अपने साथ रहने और आशीर्वाद देने की इच्छा जताई। इसके बाद कांग्रेस पार्टी ने अपना चुनाव चिह्न हाथ का पंजा रखा।
देवराहा बाबा की उम्र आज भी सबसे बड़ा रहस्य
देवराहा बाबा के जीवन का सबसे बड़ा रहस्य उनकी उम्र को लेकर रहा। उनकी उम्र को लेकर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। कुछ कथाओं में उन्हें 200 से अधिक वर्ष का बताया गया, तो कुछ में 400 वर्ष और कुछ कथाओं में इससे भी अधिक उम्र के दावे सामने आते हैं। बाबा से जुड़े लोगों ने उनकी योग साधना और कायाकल्प की बात भी कही जाती है। माना जाता है कि खेचरी मुद्रा, योग और साधना के जरिए वे शरीर पर नियंत्रण कर सकते थे। रांची में बाबा ने एक विशेष स्थान पर कायाकल्प साधना की थी। इस दौरान बाबा लंबे समय तक एक गुफा में रहे। कई वर्षों की साधना के बाद जब वह गुफा से बाहर आए तो उनका शरीर बेहद युवा दिखाई दे रहा था।
19 जून 1990 को ली महासमाधि
देवराहा बाबा से जुड़े विवरण के अनुसार 19 जून 1990 को उन्होंने महासमाधि ली। कहा जाता है कि उन्होंने अपनी महासमाधि की तारीख पहले ही बता दी थी।
