भगवान महादेव की जटाओं से मा गंगा बहती हैं। राजा भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर जब मां गंगा धरती लोक पर आने लगी तो उनका वेग बहुत तेज था। माता का ये तेज वेग धरती लोक सहन ना कर पाता, इस कारण भगवान शिव ने मां गंगा के वेग को कम करने के लिए उन्हें अपनी जटाओं में बांध लिया और उनकी एक धारा को धरती लोक पर भेज दिया।
भगवान भोलेनाथ तीन नेत्र वाले हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिव का त्रिनेत्र विवेक और धैर्य का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि शिव का तीसरा नेत्र हमें विपरीत परिस्थिति में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करता है।
भगवान शिव नीलकंठ वाले हैं। सागर मंथन के दौरान जब समुंद्र में विष निकला तब भगवान शिव ने विष का घड़ा उठाया और विष का प्याला पी लिया। भगवान शिव ने विष को अपने कंठ में ही सीमित रखा। जिस कारण उनका गला नीला पड़ गया।
भगवान भोलेनाथ त्रिशूलधारी हैं। उनके हाथों में हमेशा त्रिशूल रहता है। शिव जी का त्रिशूल रज, तम और सत गुणों का प्रतीक माना जाता है। इन गुणों के बिना सृष्टि का संचालन करना मुश्किल था। इस कारण शिव ने त्रिशूल रूप में इन्हें धारण कर लिया।
भगवान भोलेनाथ के माथे पर चंद्रमा सुशोभित है। चांद को मन का कारक माना जाता है। शिव पुराण के अनुसार चन्द्रमा का विवाह राजा दक्ष की 24 पुत्रियों से हुआ था। लेकिन वो सिर्फ अपनी एक पत्नी रोहिणी से विशेष स्नेह करते थे। जिसके कारण उनकी और रानियां उनकी शिकायत अपने पिता दक्ष से कर देती हैं। जिसके बाद राजा दक्ष चंद्रमा को क्षय रोग का शाप दे देते हैं। चंद्रमा इससे मुक्त होने के लिए शिव की तपस्या करते हैं। चंद्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिव चंद्रमा को अपने शीश पर धारण करते हैं।
भगवान भोलेनाथ ने अपने बदन पर मृग छाल धारण किया हुआ है। पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान विष्णु ने प्रह्ललाद की रक्षा के लिए नरसिंह अवतार लिया और हिरण्यकश्यप का वध किया। उसके वध के बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। तब उनके क्रोध को शांत करने के लिए शिव ने शालभ रूप में अवतार लिया और भगवान नरसिंह की चोंच पर वार करके उन्हें घायल कर दिया। उसके बाद विष्णु जी ने याचना की शिव उनके छाल को अपने वस्त्र के रूप में धारण करें। तब से शिव मृग छाल धारण करते हैं।
भगवान भोलेनाथ के हाथो में डमरू विराजमान है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार संगीत का जनक शिव भगवान को ही माना जाता है। डमरू को ब्रह्म का स्वरूप माना जाता है। संसार में सतुलन बनाये रखने के लिए शिव ने इसे अपने हाथों में धारण कर रखा है।