भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अब चक्रवातों की तीव्रता और उनके रास्ते का पता लगाने के लिए 'एडवांस्ड डवोरक तकनीक' और सैटेलाइट आधारित AI टूल्स का उपयोग कर रहा है। AI की मदद से अब चक्रवात आने के 96 घंटे पहले ही उसके सटीक रास्ते का 96% सटीकता के साथ पता लगाया जा सकता है। इससे तटीय इलाकों को समय रहते खाली कराने और बुनियादी ढांचे को बचाने में बड़ी मदद मिल रही है।
भारत ने पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के माध्यम से 22 पेटाफ्लॉप्स (PetaFLOPS) क्षमता वाले हाई-पावर कंप्यूटिंग सिस्टम स्थापित किए हैं। इस सिस्टम का एक बड़ा हिस्सा विशेष रूप से AI और मशीन लर्निंग रिसर्च के लिए समर्पित है। यह सुपरपावर तकनीक भविष्य के मौसम मॉडल विकसित करने और मानसून का 18 दिन पहले ही सटीक पूर्वानुमान लगाने में वैज्ञानिकों की मदद कर रही है।
हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन (Landslide) एक बड़ी चुनौती है। भारत ने एक स्वदेशी AI-आधारित अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया है, जो मिट्टी की नमी और हलचल को भांपकर भूस्खलन से 3 घंटे पहले ही चेतावनी दे देता है। हिमाचल प्रदेश में 60 से अधिक स्थानों पर लगे ये सेंसर 90% से अधिक सटीकता के साथ काम कर रहे हैं, जो कीमती जानों को बचाने में ढाल साबित हो रहे हैं।
अब मौसम की जानकारी केवल शहरों तक सीमित नहीं है। 'भारत फॉरकास्टिंग सिस्टम' (BharatFS) के जरिए अब गांव के स्तर पर 6 किलोमीटर के बारीक दायरे में सटीक जानकारी उपलब्ध है। 'ई-ग्रामस्वराज' और 'मौसम ग्राम' जैसे ऐप्स के माध्यम से किसान अपनी फसल की बुवाई, सिंचाई और कटाई के फैसले अब मौसम के मिजाज को देखकर ले पा रहे हैं।
किसानों और आम जनता की मदद के लिए सरकार 'मौसम-GPT' (MausamGPT) नामक एक AI चैटबॉट विकसित कर रही है। यह चैटबॉट लोगों को खेती, बारिश के पैटर्न, बिजली गिरने और कोहरे जैसी समस्याओं पर तत्काल सलाह देगा। इसके अलावा, AI का उपयोग अब जंगलों में आग लगने और वज्रपात जैसी घटनाओं के पूर्वानुमान के लिए भी किया जा रहा है।
AI तकनीक अब भारतीय वनों की 'तीसरी आंख' बन गई है। मशीन विजन (MV) और AI कैमरों के जरिए जंगलों में लगने वाली आग, अवैध कटाई और अतिक्रमण की रीयल-टाइम निगरानी की जा रही है। साथ ही, जंगल की सीमाओं पर लगे कैमरे वन्यजीवों को बस्तियों में आने से पहले ही पहचान लेते हैं, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोका जा रहा है।
IIT कानपुर और IIT दिल्ली मिलकर AI के जरिए शहरों की वायु गुणवत्ता (Air Quality) की रीयल-टाइम निगरानी कर रहे हैं। वहीं, IIT खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने गंगा के मैदानी इलाकों में पीने के पानी में आर्सेनिक प्रदूषण का पता लगाने के लिए AI मॉडल बनाया है। यह तकनीक सुरक्षित पेयजल स्रोतों की पहचान कर 'जल जीवन मिशन' को सफल बनाने में जुटी है।