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जब फोन याद रखता है, तो दिमाग भूलने क्यों लगता है; जानिए क्या कहता है हमारी मेमोरी का मनोविज्ञान

मनोवैज्ञानिक इसे फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट कहते हैं। इसका मतलब है कि किसी पल की फोटो खींचने पर हमारा दिमाग उस अनुभव को उतनी गहराई से याद नहीं रख पाता।

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क्यों फोटो खींचने की आदत हमारे दिमाग को कर रही कुंद (Photo: istock)

फर्ज कीजिए कि आप कहीं घूमने गए हैं। लौटने के बाद अगर आप अपने फोन की गैलरी खोलें, तो शायद एक ही जगह की दर्जनों तस्वीरें मिल जाएंगी। वहीं अगर कोई पूछे कि जहां की ये तस्वीरें हैं उस वक्त वहां की खुशबू कैसी थी, हवा कैसी थी या आपने वहां कैसा महसूस किया था, तो जवाब देना मुश्किल हो सकता है। अमूमन ऐसा होता है कि कुछ यादें भले तस्वीरों में कैद हो जाए लेकिन वो हमारे दिमाग से धुंधली हो जाती हैं। इसके पीछे एक तरह का दिलचस्प विज्ञान काम करता है।

क्या है फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट?

मनोवैज्ञानिक इसे फोटो-टेकिंग इम्पेयरमेंट इफेक्ट कहते हैं। इसका मतलब है कि किसी पल की फोटो खींचने पर हमारा दिमाग उस अनुभव को उतनी गहराई से याद नहीं रख पाता। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि ध्यान उस पल को जीने से हटकर कैमरे के फ्रेम, एंगल और सही शॉट पर चला जाता है।

मोबाइल ने आदत को और बढ़ा दिया

पहले कैमरा निकालना एक अलग तैयारी होती थी। अब स्मार्टफोन हर समय हाथ में रहता है। नतीजा यह है कि हम लगभग हर चीज रिकॉर्ड करने लगते हैं। किसी खूबसूरत नजारे को कुछ देर महसूस करने के बजाय हम तुरंत कैमरा खोल लेते हैं। इससे हमारा ध्यान अनुभव से हटकर रिकॉर्डिंग पर केंद्रित हो जाता है।

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यादें बनती हैं ध्यान से, कैमरे से नहीं

एक्सपर्ट्स का कहना है कि याददाश्त की सबसे बड़ी कुंजी ध्यान है। जब हम किसी जगह को बिना जल्दबाजी के देखते हैं, वहां की आवाजें सुनते हैं और माहौल को महसूस करते हैं, तो दिमाग उस अनुभव को बेहतर तरीके से स्टोर करता है। वहीं जब पूरा ध्यान सही फोटो लेने में लगा रहता है, तो वही अनुभव कमजोर पड़ जाता है।

80:20 का नियम भी यही कहता है

रिपोर्ट में एक दिलचस्प बात सामने आई है। हम जो तस्वीरें लेते हैं, उनमें से लगभग 80 प्रतिशत एक जैसी या फालतू होती हैं। वास्तव में सिर्फ 20 प्रतिशत तस्वीरें ही ऐसी होती हैं, जो किसी खास पल को सही मायने में संजो पाती हैं। यानी सैकड़ों फोटो लेने से जरूरी नहीं कि यादें भी उतनी ही मजबूत बनें।

क्या फोटो लेना छोड़ देना चाहिए?

बिल्कुल नहीं। तस्वीरें हमारी यादों का खूबसूरत हिस्सा हो सकती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि हर पल को कैमरे से देखने के बजाय पहले उसे अपनी आंखों और दिमाग से महसूस करें। पहले कुछ मिनट उस जगह को जीएं, फिर एक-दो अर्थपूर्ण तस्वीरें लें। बाद में उन तस्वीरों को देखकर उस पल को याद करना भी फायदेमंद हो सकता है।

अगली ट्रिप पर ये छोटी आदत अपनाएं:

- हर जगह की दर्जनों फोटो लेने से बचें।

- पहले कुछ पल बिना फोन के उस जगह को महसूस करें।

- सिर्फ खास और मतलब की तस्वीरें लें।

- ट्रिप के बाद चुनी हुई तस्वीरों को देखकर उस अनुभव को याद करें।

आखिरकार सवाल यह नहीं है कि आपने कितनी तस्वीरें लीं। असली सवाल यह है कि आपने उस सफर को कितना जिया। कैमरा यादों को संभाल सकता है, लेकिन यादें बनाने का काम अब भी हमारे दिमाग और ध्यान का ही है।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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