शादी करना और घर बसाना भले लोगों को आसान लगे, लेकिन असली चुनौती बच्चे होने के बाद सामने आती है। इस चुनौती का नाम है पेरेंटिंग। जब कोई महिला पहली बार मां बनती है तो वह कई बार पेरेंटिंग में गलतियां करती है, नई चीजें सिखती है और अपना शत प्रतिशत देने की कोशिश करती है। वहीं अगर आप दूसरी बार मां बनने जा रही हैं, तो आपके पास एक बड़ा फायदा है। आपके पास अनुभव है। अब जरूरत है उस अनुभव से सीखने की। ताकि इस बार सफर थोड़ा आसान और ज्यादा संतुलित हो।
हमेशा परफेक्ट बनने की कोशिश न करें
पहली बार मां बनने पर कई महिलाएं खुद पर बहुत दबाव डाल लेती हैं। उन्हें लगता है कि हर काम बिल्कुल सही होना चाहिए। अगर बच्चा रो रहा है, तो शायद उनसे कोई गलती हुई है। जबकि ऐसा नहीं है। बच्चे का रोना उसके विकास का सामान्य हिस्सा भी हो सकता है। इस बार खुद पर अनावश्यक दबाव न डालें।
हर सलाह को नियम न मानें
पहली पेरेंटिंग में रिश्तेदार, दोस्त और पड़ोसी सभी सलाह देते हैं। कई बार ये सलाह एक-दूसरे से बिल्कुल अलग होती हैं। ऐसे में नई मां उलझ जाती है। इस बार हर बात पर भरोसा करने के बजाय अपने डॉक्टर की सलाह को प्राथमिकता दें। हर बच्चा अलग होता है। इसलिए हर तरीका सभी पर लागू नहीं होता।
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बच्चे की भावनाओं को नजरअंदाज न करें
दूसरे बच्चे के आने की खुशी में कई बार पहले बच्चे को हम उतना ध्यान नहीं दे पाते जितना देना होता है। उसे लग सकता है कि अब मम्मी-पापा का प्यार बंट गया है। यह भावना सामान्य है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान ही बड़े बच्चे को इस बदलाव के लिए तैयार करें। उसके साथ समय बिताएं। उसे यह महसूस कराएं कि वह आज भी उतना ही खास है।
अपनी सेहत को पीछे न छोड़ें
मां अपनी पूरी ऊर्जा बच्चों पर लगा देती है, लेकिन अगर मां ही थकी हुई और तनाव में रहेगी, तो पूरे परिवार पर उसका असर पड़ेगा। पर्याप्त नींद लें। संतुलित भोजन करें। जरूरत हो तो परिवार से मदद मांगें। अपनी देखभाल करना कोई स्वार्थ नहीं है।
बच्चे की तुलना न करें
कई माता-पिता दूसरे बच्चे की हर बात की तुलना पहले बच्चे से करने लगते हैं। जैसे पहला बच्चा जल्दी चलने लगा था या पहले जल्दी बोलने लगा था। लेकिन बच्चों के विकास की गति अलग-अलग होती है। तुलना करने से केवल चिंता बढ़ती है। हर बच्चे को उसकी अपनी गति से बढ़ने दें।
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मदद लेने में संकोच न करें
पहली बार कई महिलाएं सब कुछ अकेले संभालने की कोशिश करती हैं। इसका असर उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस बार जिम्मेदारियां बांटें। जीवनसाथी, परिवार और दोस्तों की मदद लें। इससे आप बच्चों के साथ बेहतर समय भी बिता पाएंगी।
गिल्ट को खुद पर हावी न होने दें
दूसरे बच्चे के आने के बाद कई मांओं को लगता है कि वे किसी एक बच्चे को पूरा समय नहीं दे पा रही हैं। यह अपराधबोध बहुत सामान्य है। ऐसे में बच्चे को जितना समय दे अच्छा समय दें। कुछ अच्छे पल कई घंटों की मौजूदगी से ज्यादा असर छोड़ते हैं।
दूसरी बार मां बनना केवल एक नए बच्चे का स्वागत करना नहीं है। यह खुद को एक बेहतर और ज्यादा आत्मविश्वासी मां के रूप में देखने का भी मौका है। पहली पेरेंटिंग की गलतियां याद रखने के लिए नहीं, उनसे सीखने के लिए होता है। हर बच्चा नया अनुभव लेकर आता है। इसलिए इस बार खुद पर भरोसा रखें। जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की सलाह लें और इस सफर का आनंद भी उठाएं। आखिर एक खुश मां ही बच्चे की सबसे बड़ी ताकत होती है।
