Saanson Ki Mala Pe Original Writer: फिल्म मिर्जापुर द मूवी में ‘सांसों की माला’ सुनते हुए मेरा ध्यान कुछ पल के लिए कहानी से हटकर गीत पर टिक गया। यह धुन जानी-पहचानी थी, लेकिन दृश्य के साथ उसका असर बिल्कुल नया लगा। बीना त्रिपाठी के भीतर दबे प्रेम, दर्द और उलझन को गीत वह आवाज दे रहा था, जो शायद संवाद नहीं दे सकते थे।
फिल्म के लिए इसका नया संस्करण मधुर शर्मा और वैभव पानी ने तैयार किया है। इसके मूल में उस्ताद नुसरत फतेह अली खान की यादगार प्रस्तुति मौजूद है। मिर्जापुर ने इस पुराने कलाम को नई पीढ़ी के सामने रखा तो इसके कुछ दिन बाद दिलजीत दोसांझ ने इसे विदेशी मंच पर गाकर चर्चा और बढ़ा दी।
12 सितंबर 2026 को लंदन के Wembley Stadium में दिलजीत ने ‘सांसों की माला’ के जरिए नुसरत फतेह अली खान को संगीतमय श्रद्धांजलि दी। उनकी आवाज में यह सूफी कलाम वहां मौजूद दर्शकों पर भी अपना जादू चला गया। लेकिन गीत की नई लोकप्रियता के बीच पुराना सवाल फिर सामने है कि आखिर ‘सांसों की माला पे सिमरूं मैं पी का नाम’ आखिर लिखा किसने था? ये मूल रूप से किसकी रचना है।
इस सवाल का जवाब खोजने के लिए इसकी यात्रा को शुरुआत से समझना होगा।
कहानी शुरू होती है तुफैल होशियारपुरी से
उपलब्ध लिखित प्रमाण इस कलाम को 20वीं सदी के उर्दू कवि और गीतकार तुफैल होशियारपुरी से जोड़ते हैं। तुफैल का जन्म 1914 में पंजाब के होशियारपुर में हुआ था। विभाजन के बाद वह पाकिस्तान चले गए और वहां कविता के साथ फिल्मी गीतों की दुनिया में भी सक्रिय रहे।
उनकी कविताओं के संग्रह ‘सोच माला’ में ‘सांसों की माला पर सिमरूं निस दिन पी का नाम’ रचना उनके नाम से दर्ज है। रेख्ता के पुस्तक रिकॉर्ड में इसके लेखक तुफैल होशियारपुरी, संपादक राजेंद्र मल्होत्रा और प्रकाशन वर्ष 1995 बताया गया है। इंटरनेट पर मौजूद जानकारी के अनुसार, सूफी साहित्य के डिजिटल संग्रह सूफीनामा पर भी यह पूरा कलाम तुफैल के नाम से उपलब्ध है। यही इस रचना के लेखक को लेकर सबसे मजबूत दस्तावेजी आधार है। हालांकि इसकी कहानी इतनी सीधी भी नहीं है।
वर्ष 1979 में भारत में गूंजा नुसरत का कलाम
इस गीत की लोकप्रिय यात्रा में अगला बड़ा नाम उस्ताद नुसरत फतेह अली खान का है। बताया जाता है कि 1979 में अपनी पहली भारत यात्रा के दौरान नुसरत साहब ने ऋषि कपूर और नीतू कपूर के विवाह से जुड़े एक कार्यक्रम में इसे गाया था।
इस प्रसंग के अधिकतर विवरण बाद की खबरों और लोगों की यादों में मिलते हैं। उस दौर का स्पष्ट समकालीन रिकॉर्ड सीमित है, इसलिए इसे स्थापित तथ्य के बजाय लोकप्रिय संगीत-वृत्तांत की तरह पढ़ना अधिक सही होगा। इतना जरूर साफ है कि नुसरत की प्रस्तुति ने इस कलाम को वह पहचान दी, जिसके बाद यह किसी एक देश या धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं रहा।
वर्ष 1982 की रिकॉर्डिंग बनी अहम पड़ाव
साल 1982 में EMI Pakistan से नुसरत फतेह अली खान की ‘सांसों की माला’ रिकॉर्डिंग सामने आई। उनकी आवाज में यह साधारण प्रेम गीत नहीं रह गया था। ‘पी’ कभी प्रेमी लगता था, कभी ईश्वर और कभी सूफी साधक का परम प्रिय।
यहीं लेखक को लेकर एक उलझन भी पैदा हुई। नुसरत की शुरुआती व्यावसायिक रिलीज में इसके लेखक के स्थान पर ‘Traditional’ लिखा गया। यानी उस समय रिकॉर्ड कंपनी ने इसे किसी एक कवि की रचना बताने के बजाय परंपरा से चला आ रहा कलाम मानकर पेश किया।
बाद में ‘सोच माला’ में इसे तुफैल होशियारपुरी के नाम से पाया गया। पुस्तक 1995 में प्रकाशित हुई, जबकि तुफैल का निधन 1993 में हो चुका था। इस कारण लेखक को लेकर बहस पूरी तरह समाप्त नहीं होती। फिर भी उपलब्ध पुस्तक-साक्ष्य सबसे मजबूती से तुफैल होशियारपुरी की तरफ ही इशारा करते हैं।
नुसरत की आवाज ने मिटा दीं मजहब की दीवारें
नुसरत साहब की कव्वाली का आकर्षण केवल उनकी ऊंची तानों में नहीं था। वह एक ही प्रस्तुति में प्रेम, भक्ति और सूफी दर्शन को इस तरह मिला देते थे कि श्रोता अपने विश्वास के अनुसार उसका अर्थ चुन सकता था।
अब ‘सांसों की माला’ कलाम में में मंदिर और मस्जिद दोनों आते हैं। श्याम और राधा-कृष्ण के संकेत भी मिलते हैं। दूसरी तरफ पी, इबादत और बंदगी की सूफी भाषा है। यही मेल इस गीत को अलग-अलग धार्मिक परंपराओं के करीब ले गया। और शायद इसी कारण बाद के वर्षों में इसे कहीं कव्वाली, कहीं भजन और कहीं शबद के रूप में सुना गया।
वर्ष 1997 में कोयला से मिला फिल्मी रूप
1997 में शाहरुख खान और माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘कोयला’ के लिए इस गीत का नया रूप तैयार किया गया। राजेश रोशन के संगीत और कविता कृष्णमूर्ति की आवाज में ‘सांसों की माला’ कलाम को हिंदी सिनेमा के दर्शकों तक पहुंचा। हालांकि फिल्मी संस्करण में इस कलाम प्रेम का पक्ष अधिक उभरकर सामने आया। और यहां से बहुत से भारतीय श्रोताओं के लिए यह नुसरत की लंबी सूफी कव्वाली के बजाय एक लोकप्रिय हिंदी फिल्म गीत बन गया।
मीराबाई का नाम कैसे जुड़ गया
मीराबाई को कृष्ण की भक्त के रूप में देखा जाता है और सांसों की माला के बोल को गहराई से समझेंगे तो वे ऐसी ही गहरी प्रीतनुमा भक्ति का अहसास देते हैं। ऐसे में गीत में पी, श्याम, राधा-कृष्ण, विरह और समर्पण की भाषा सुनकर इसे मीराबाई भी जोड़ दिया गया। कहीं-कहीं इसे मंदिरों और भजन मंडलियों में इसे मीरा भजन के रूप में गाया जाने लगा। बाद में यूट्यूब के अनेक वीडियो ने भी इसे मीराबाई की रचना लिख दिया।
लेकिन भाव और लेखकीय प्रमाण अलग बातें हैं। मीरा की प्रमाणित पुरानी पदावलियों में इस पूरे गीत का वैसा स्पष्ट पाठ नहीं मिलता, जैसा तुफैल होशियारपुरी की ‘सोच माला’ में दर्ज है। इसलिए यह कहना अधिक सही है कि गीत की भावभूमि मीरा की कृष्ण भक्ति के करीब है। लेकिन इसे उनकी मूल रचना बताने के पक्ष में फिलहाल मजबूत पुराना पाठ-साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
सिख भक्ति संगीत में मिला नया रूप
समय के साथ ‘सांसों की माला’ की धुन और भाव सिख भक्ति संगीत तक भी पहुंचे। भाई हरबंस सिंह जी जगाधरी वाले ने ‘स्वासां दी माला नाल सिमरां मैं तेरा नाम’ नाम से लोकप्रिय पंजाबी शबद गाया।
इस शबद का मुखड़ा नुसरत के कलाम से मिलता है, लेकिन आगे के बोल अलग हैं। इसमें संगत की सेवा, गुरु नानक के घर, गुरु के सिखों, अमृत के प्याले और सतगुरु के दर्शनों की बात आती है। इसे सिख भक्ति परंपरा में शबद के रूप में गाया और सुना जाता है।
हालांकि यह पूरा पंजाबी शबद श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज मूल गुरबानी पाठ नहीं है। गुरु ग्रंथ साहिब के अंग 295 पर गुरु अर्जन देव जी की वाणी में पंक्ति आती है-
‘सासि सासि सिमरहु गोबिंद।’
यानी प्रत्येक सांस के साथ गोबिंद का स्मरण करो। गोबिंद को यहां अपने ईष्ट से जोड़ा गया है। यही भाव ‘स्वासां दी माला’ में भी दिखाई देता है। ऐसे में मुमकिन है कि समान विचार और मिलते-जुलते मुखड़े के कारण दोनों रचनाएं लोगों की स्मृति में आपस में जुड़ गईं।
नए दौर में फिर हुई गीत की वापसी
वर्ष 2020 में राहत फतेह अली खान ने ‘सांसों की माला’ को अपने गुरु नुसरत फतेह अली खान और पिता फर्रुख फतेह अली खान को समर्पित करते हुए नए फ्यूजन रूप में पेश किया था।
इसके बाद 2022 में पुर्तगाली गिटारिस्ट Andre Antunes ने नुसरत की आवाज के साथ इसका metal version बनाया। सूफी गायकी और heavy metal का यह अनोखा मेल डिजिटल दर्शकों के बीच खूब पसंद किया गया।
साल 2024 में पाकिस्तानी संगीतकारों की जोड़ी Leo Twins ने इसका instrumental cover तैयार किया। दिलजीत दोसांझ ने इंस्टाग्राम पर इस प्रस्तुति की सराहना भी की है। बेशक यह इस बात का संकेत था कि दशकों पुराना कलाम आज के बड़े कलाकारों को भी उतना ही प्रभावित करता है।
मिर्जापुर और Wembley से फिर चर्चा में आया गीत
सितंबर 2026 में ‘मिर्जापुर द मूवी’ ने ‘सांसों की माला’ को एक नए फिल्मी संदर्भ में इस्तेमाल किया। यहां गीत केवल background music नहीं लगता। वह बीना त्रिपाठी के मन में चल रही उथल-पुथल का हिस्सा बन जाता है। मधुर शर्मा और वैभव पानी का नया संस्करण पुराने कलाम की आत्मा को बनाए रखते हुए उसे कहानी के मुताबिक नया रंग देता है।
इसके बाद 12 सितंबर को Wembley Stadium में दिलजीत दोसांझ ने इसे गाकर नुसरत साहब को याद किया। इस तरह कुछ ही दिनों के भीतर एक ही कलाम पहले बड़े पर्दे पर और फिर दुनिया के सबसे चर्चित कॉन्सर्ट वेन्यूज में से एक पर सुनाई दिया।
‘सांसों की माला’ की पूरी यात्रा देखें तो इसके कई रूप और कई आवाजें दिखाई देती हैं। इसे भजन समझा गया, शबद के रूप में ढाला गया और फिल्मों में नए अर्थ मिले। फिर भी इसके मूल लेखक के प्रश्न पर सबसे मजबूत उपलब्ध प्रमाण तुफैल होशियारपुरी के नाम पर ठहरते हैं।
नुसरत फतेह अली खान इस रचना के प्रमाणित लेखक नहीं, लेकिन इसकी अमर आवाज जरूर हैं। उन्होंने ‘पी’ को इतना खुला अर्थ दिया कि हर श्रोता उसमें अपना आराध्य और अपना प्रेम खोज सका। शायद यही कारण है कि पांच दशक बाद भी ‘सांसों की माला’ जहां गूंजता है, कुछ देर के लिए बाकी सभी आवाजें पीछे छूट जाती हैं।
