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Kitaab Cafe: बंटवारे की वो प्रेम कहानी, जो कभी पार ना कर पाई सरहद

किताब कैफे (Kitaab Cafe): यह किताब विभाजन के बाद की सच्ची घटना से प्रेरित है। इसकी कहानी गुलाम अली और जाहिरा रजा नाम के दो असली किरदारों के इर्द-गिर्द ही घूमती है।

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बुक रिव्यू: डियार जाहिरा, विद लव

15 अगस्त 1947 को आजादी के जश्न के साथ ही भारत ने विभाजन का दर्द भी झेला। लाखों लोग इधर से उधर हुए। सरहद के दोनों ही तरफ से कत्ल-ए-आम भी हुआ। बंटवारे पर ना जाने कितनी ही किताबें लिखी गई हैं। ज्यादातर में खून-खराबे, पलायन और बिछड़ते परिवारों के दर्द को बयां किया गया। इसी कड़ी में एक नई किताब आई है। यह किताब उस इंसानी एहसास को शब्दों से सजाती है जिसमें इंतजार है, अधूरा वादा और पुरानी यादों का बोझ भी है। इस किताब का नाम है 'डियर जाहिरा, विद लव' (Dear Zahira, With Love)। इसे लिखा है सचिन एनजी ने।

यह किताब विभाजन के बाद की सच्ची घटना से प्रेरित है। इसकी कहानी गुलाम अली और जाहिरा रजा नाम के दो असली किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है। 1947 की उथल-पुथल उनके जीवन को दो देशों में बांट देती है। सरहदें खिंच जाती हैं, लेकिन उनका रिश्ता और एक-दूसरे के प्रति प्रेम खत्म नहीं होता।

पलायन के दर्द में दफन एहसास की कहानी

'Dear Zahira, With Love' का सबसे प्रभावशाली पक्ष यह है कि यह सीमा पार करने की सनसनीखेज घटनाओं पर नहीं टिकती। लेखक उन लोगों की दुनिया में ले जाता है, जो राजनीतिक फैसलों के बाद अचानक ऐसी जिंदगी जीने को मजबूर हो गए, जहां सरहद सिर्फ नक्शे पर नहीं, रिश्तों के बीच भी खिंच गई।

यह किताब बार-बार यह एहसास कराती है कि इतिहास केवल तारीखों और समझौतों से नहीं बनता। उसके पीछे अनगिनत ऐसे लोग होते हैं, जिनकी निजी त्रासदियां किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज नहीं हो पातीं।

आसान है भाषा

इस किताब की भाषा काफी आसान है। लिखावट ऐसी है कि यह पाठक को भावुक करने के लिए गैर जरूरी नाटकीयता का सहारा नहीं लेती। कहानी शांत गति से आगे बढ़ती है। घटनाओं से ज्यादा कहानी के किरदारों की मनोस्थिति को शब्द दिये गए हैं। यही कारण है कि इसके कई किरदार और किस्से लंबे समय तक जेहन में बने रह सकते हैं।

बंटवारे की नई व्याख्या

विभाजन पर लिखे गए अधिकांश उपन्यासों में हिंसा, विस्थापन और राजनीतिक उथल-पुथल प्रमुख विषय होते हैं। इन सबसे अलग यह किताब दूसरा सवाल पूछती है- उन लोगों का क्या हुआ, जो कभी अपनी मंजिल तक पहुंच ही नहीं पाए? इस किताब में बताने की कोशिश की गई है कि कई बार सबसे बड़ी त्रासदी बिछड़ जाना नहीं, रुक जाना होती है।

किसके लिए है यह किताब?

अगर आप तेज रफ्तार थ्रिलर या लगातार ट्विस्ट वाली कहानी की उम्मीद लेकर बैठेंगे, तो शायद यह किताब आपकी पसंद न बने। लेकिन अगर आपको इतिहास, मानवीय रिश्तों और भावनात्मक साहित्य में रुचि है, तो 'Dear Zahira, With Love' निराश नहीं करेगी। यह उन पाठकों के लिए है जो किताब खत्म होने के बाद भी उसके किरदारों और उनके दर्द के बारे में सोचते रहते हैं।

'Dear Zahira, With Love' केवल एक प्रेम कहानी या विभाजन का उपन्यास नहीं है। यह उन अनकहे जख्मों की कहानी है जिन्हें इतिहास की मोटी किताबें अकसर नजरअंदाज कर देती हैं। सचिन एनजी की ये किताब मजबूती से इस बात तो बताती है कि सरहदें सिर्फ देशों को नहीं बांटतीं, वे इंसानों की उम्मीदों, रिश्तों और अधूरी इच्छाओं को भी बांट देती हैं।

Suneet Singh
सुनीत सिंहauthor

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे हैं। टीवी और डिजिटल पत्रकारिता में 13 वर्षों के अनुभव के साथ, सुनीत उन बहुमुखी पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने न्यूजरूम और फील्ड—दोनों मोर्चों पर खुद को साबित किया है। माइक, कैमरा और एडिटिंग डेस्क तीनों से उनकी सहज जुगलबंदी ने उन्हें एक संतुलित और विश्वसनीय मीडिया प्रोफेशनल के रूप में स्थापित किया है। पिछले 10 वर्षों से सुनीत लाइफस्टाइल, लिटरेचर, सिनेमा और संस्कृति से जुड़ी गहन व विश्लेषणात्मक स्टोरीज लिखते रहे हैं और अबतक 12,000 से अधिक आर्टिकल पब्लिश कर चुके हैं। उनकी लेखन शैली गहराई, मौलिक दृष्टिकोण और रिसर्च-आधारित प्रस्तुति से पहचानी जाती है। वे विषयों की बारीकियों को पकड़कर उन्हें सरल, प्रभावी और पाठकों से जुड़ने वाली भाषा में ढालने में दक्ष हैं।

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