Kareena Kapoor Parenting Lessons: स्मार्टफोन और डिजिटल स्क्रीन्स के इस दौर में पेरेंट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौती बच्चों को मोबाइल और गैजेट्स की लत से बचाना है। बच्चों में बढ़ता स्क्रीन टाइम उनकी आंखों और शारीरिक सेहत के साध ही उनके मानसिक विकास पर भी बुरा असर डालता है। बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर खान भी इस समस्या से अछूती नहीं हैं।
हाल ही में एक इंटरव्यू में करीना कपूर ने बताया कि वो अपने दोनों बच्चों,तैमूर और जेह, के स्क्रीन टाइम को लेकर काफी सख्त हैं और जरूरत पड़ने पर उनके हाथ से फोन छीनने से भी नहीं कतरातीं। करीना ने अपने बच्चों की पेरेंटिंग और स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट को लेकर कई अहम बातें शेयर की हैं। ये बातें बतौर अभिभावक आपके भी काम आ सकती हैं:
जरूरत पड़ी तो हाथ से छीन लेती हूं फोन
करीना कपूर ने बताया कि वो बच्चों को घंटों स्क्रीन के सामने चिपके रहने की इजाजत बिल्कुल नहीं देतीं। बच्चों के स्क्रीन टाइम पर कंट्रोल पाने के लिए कभी-कभी सख्त कदम उठाना पड़ता है, चाहे इसके लिए बच्चों के हाथ से फोन ही क्यों न छीनना पड़े।
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स्क्रीन के बदले आउटडोर एक्टिविटीज और रीडिंग
करीना का मानना है कि बच्चों को फोन से दूर रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि उन्हें किसी क्रिएटिव और फिजिकल एक्टिविटी में बिजी रखा जाए। वो तैमूर और जेह को किताबें पढ़ने, खेल-कूद और ड्राइंग जैसी एक्टिविटीज में व्यस्त रखती हैं। जब बच्चे किसी एक्टिविटी में व्यस्त होते हैं, तो उनका ध्यान स्क्रीन की तरफ अपने-आप कम जाता है।
नो-फोन फैमिली टाइम और अनुशासन
करीना और सैफ अली खान अपने घर में एक नियम का कड़ाई से पालन करते हैं। खाना खाते समय या परिवार के साथ बिताए जाने वाले समय के दौरान किसी के भी हाथ में फोन नहीं होना चाहिए। करीना का कहना है कि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। इसलिए अगर पेरेंट्स खुद फोन में लगे रहेंगे, तो बच्चों से दूरी बनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती।
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डिजिटल डिटॉक्स की अहमियत
करीना इस बात पर भी चिंता जताती हैं कि कैसे आजकल की युवा पीढ़ी और छोटे बच्चे स्क्रीन के आदी होते जा रहे हैं। वे मानती हैं कि तकनीक से बच्चों को पूरी तरह काटना मुमकिन नहीं है, लेकिन उनके स्क्रीन टाइम की सीमा तय करना पूरी तरह से पेरेंट्स के हाथ में होता है।
करीना कपूर खान का यह पेरेंटिंग रूल उन सभी माता-पिता के लिए एक बेहतरीन सबक है, जो बच्चों के मोबाइल एडिक्शन से परेशान हैं। बच्चों को डांटने या केवल मना करने के बजाय, उनके स्क्रीन टाइम की सख्त सीमा तय करना और उन्हें वास्तविक दुनिया के खेलों व पढ़ाई में जोड़ना ही इस समस्या का सबसे सटीक समाधान है।
