20 जुलाई को देश की राजधानी दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच जमकर टकराव हुआ। बहुत से लोग पुलिस के लाठीचार्ज को बर्बर बता रहे हैं। दूसरी तरफ एक बड़ी आबादी पुलिस एक्शन के समर्थन में है। विरोध में उठने वाली हजारों आवाजें एक सुर में लाठी बरसाने वाले पुलिसवालों को 'वर्दी वाला गुंडा' बता रही हैं।
'वर्दी वाला गुंडा'
पुलिस और प्रदर्शनकारियों में कौन सही है और कौन गलत, ये कानून तय कर लेगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज से करीब 34 साल पहले भी एक ऐसा 'वर्दी वाला गुंडा' आया था जिसने पूरे उत्तर भारत में 'तहलका' मचा दिया था? हम बात कर रहे हैं वेद प्रकाश शर्मा के अमर उपन्यास 'वर्दी वाला गुंडा की'। साल 1992 में आई इस किताब को भारती पल्प फिक्शन का शोले कहा जाता है।
इस किताब के लिए लोग बुक स्टोर खुलने से पहले ही लाइन लगा लेते थे। एमआरपी से ज्यादा कीमत पर भी खरीदने को तैयार रहते। कॉलेज-हॉस्टल में पढ़ने वाले बच्चे पैसे मिलाकर इसे खरीदते और बारी-बारी से सब पढ़ते। लोग बस और रेल सफर में एक दूसरे से मांग कर इसे पढ़ने लगे। माहौल ऐसा बन गया था कि रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, फुटपाथ की किताबों की दुकानें, कॉलेज-हॉस्टल, चाय की दुकानें..हर जगह एक ही नाम सुनाई देता- वर्दी वाला गुंडा।
सबसे ज्यादा बिकने वाला उपन्यास!
छपने के कुछ दिनों के अंदर ही ये किताब सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली उपन्यास बन गई थी। वर्दी वाला गुंडा के प्रकाशक के साथ ही राइटर वेद प्रकाश शर्मा ने भी दावा किया कि 'पहले दिन ही इस किताब की 15 लाख प्रतियां बिक गई थीं। आने वाले सालों में करीब 8 करोड़ लोगों ने इसे पढ़ा। प्रिंटिंग प्रेस वाले महीनों तक चौबीसों घंटे किताब की छपाई में लगे रहते थे। देखते-देखते ये हिंदी साहित्य की पहली बेस्टसेलर बुक बन गई।'
वेद प्रकाश शर्मा की वर्दी वाला गुंडा
क्यों इसके लिए दीवानगी की हद तक पहुंच गए लोग
यहां आपके मन में भी सवाल जरूर उठ रहा होगा कि आखिर इस किताब में ऐसा क्या था कि लोग जुनून की हद तक इसके दीवाने हो गए थे। अगर आपने ये किताब नहीं पढ़ी है तो बता दें कि इसकी असली ताकत इसका ऐसा सवाल था जो लगभग हर तरह के समाज के मन में जरूर कौंधता है - अगर समाज की रक्षा करने वाला ही समाज का भक्षक बन जाए तो आम आदमी किसके पास जाएगा?
फ्रांसीसी दार्शनिक मिशेल फूको अपनी प्रसिद्ध किताब डिसिप्लीन एंड पनिश (Discipline and Punish) में लिखते हैं कि आधुनिक समाज में सत्ता सिर्फ कानून से नहीं, वर्दी, संस्थाओं और भय के जरिए भी काम करती है। जब वही संस्थाएं भरोसा खोने लगती हैं तो समाज के भीतर गुस्सा जमा होने लगता है। 'वर्दी वाला गुंडा' उसी गुस्से की कहानी थी।
वेद प्रकाश शर्मा ने वह लिखा, जिसे 'गंभीर साहित्य' लिखने से हिचक रहा था।
पूरी तरह से काल्पनिक कहानी से गढ़ी ये किताब पढ़ने वालों को कहीं से काल्पनिक नहीं लगी। उन्हें लगा जैसे कोई उनके शहर, गांव या गली-मोहल्ले की कहानी लिख रहा हो। दरअसल 1992 में जब यह किताब आई तो उस दौर का भारत बदल रहा था..और पाठक भी। 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत तेजी से बदल रहा था। टेलीविजन हर घर में नहीं पहुंचा था। मोबाइल फोन नहीं थे। इंटरनेट का तो किसी ने नाम भी नहीं सुना था। मनोरंजन के सीमित साधन थे।
वेदप्रकाश शर्मा ने 'हिचक' को बनाया हथियार
उसी दौर में हिंदी साहित्य में पल्प फिक्शन की एंट्री हुई। पल्प फिक्शन मतलब आम समाज में होने वाले अपराध और जासूसी को वो कहानियां जो रद्दी से बने सस्ती क्वालिटी के पन्नों पर छपतीं। बुद्धजीवी साहित्यकारों ने हमेशा खुद को पल्प फिक्शन से दूर रखा। लेकिन वेद प्रकाश शर्मा ने वह लिखा जिसे 'गंभीर साहित्य' लिखने से हिचक रहा था।
उस हिचक को साहित्य के समाजशास्त्री तहे जाने वाले पियरे बोरदियो ने अपनी किताब 'डिस्टिंक्शन' में बखूबी बयां किया है। उन्होंने लिखा कि समाज अक्सर 'उच्च' और 'लोकप्रिय' संस्कृति के बीच कृत्रिम दीवारें खड़ी कर देता है। जो चीज जनता पसंद करती है, उसे अभिजात वर्ग कई बार कमतर मान लेता है।
वेद प्रकाश शर्मा के उपन्यासों ने इसी विभाजन को चुनौती दी। आलोचक उन्हें साहित्य का हिस्सा मानने से झिझकते रहे, तो पढ़ने वालों ने उन्हें अपना लेखक घोषित कर दिया। आगे चलकर उन 'गंभीर साहित्यकारों' ने भी माना कि 'वर्दी वाला गुंडा' इसलिए नहीं चली कि वह सनसनीखेज थी, वह इसलिए चली क्योंकि उसमें पाठक खुद को देख रहा था। उस दौर में आम आदमी सरकारी दफ्तरों, भ्रष्टाचार, राजनीतिक दबाव और पुलिसिया रवैये से जूझ रहा था। उपन्यास ने पहली बार उस सामूहिक बेचैनी को मनोरंजन की भाषा में बदल दिया।
वर्दी वाला गुंडा ने साहित्य की लोकप्रियता के मायने ही बदल दिये। दरअसल साहित्य हमेशा समाज की सामूहिक इच्छाओं और डर को कहानी में बदल देते हैं। पाठक उनमें केवल कहानी नहीं, अपनी जिंदगी का रूपक खोजता है। 'वर्दी वाला गुंडा' इसी वजह से लाखों लोगों की निजी कहानी बन गई।
भारतीय समाज के एक बड़े वर्ग ने जब इस कहानी से खुद को जोड़ा तो फिर इतिहास ही रच गया। वर्दी वाला गुंडा हिंदी पल्प फिक्शन के इतिहास की सबसे चर्चित और सबसे ज्यादा बिकने वाली किताब बन गई। इस किताब के जरिए वेद प्रकाश शर्मा ने साबित किया कि साहित्य केवल वह नहीं होता जिसे विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है। साहित्य वह भी होता है जिसे जनता अपने दिल में जगह देती है।
वर्दी वाला गुंडा के लेखक वेद प्रकाश शर्मा
वेद प्रकाश शर्मा ने उस हिंदी पाठक को किताबों से जोड़ा, जो कभी साहित्यिक पत्रिकाओं तक नहीं पहुंचता। वर्दी वाला गुंडा ने उस वर्ग को भी किताबों से जोड़ा, जो शायद कभी प्रेमचंद या अज्ञेय तक नहीं पहुंच पाता।
आखिर आज भी इसकी चर्चा क्यों होती है?
'वर्दी वाला गुंडा' ने यह साबित किया था कि कि हिंदी में भी ऐसी लोकप्रिय कहानियां लिखी जा सकती है जो लाखों लोगों को पढ़ने पर मजबूर कर दे। आज जब हम लोगों में मिर्जापुर या सैक्रेड गेम्स जैसे भ्रष्ट सिस्टम या एंटी-हीरो जैसे क्राइम थ्रिलर्स के लिए दीवानगी देखते हैं तब महसूस होता है कि वेद प्रकाश शर्मा अपने समय से कितना आगे लिख रहे थे।
उन्होंने पाठकों की नब्ज पहचानी थी। उन्हें पता था कि पाठक केवल मनोरंजन नहीं चाहता। वह व्यवस्था से लड़ने वाला एक ऐसा नायक भी चाहता है, जो उसकी अपनी नाराजगी को आवाज दे। वर्दी वाला गुंडा लोगों की उसी दबी आवाज का नया नाम थी।
