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किताब कैफे: 70 साल बाद भी कायम है 'मैला आंचल' का जादू, बहुत खास है रेणु का यह उपन्यास

किताब कैफे (Kitaab Cafe): फणीश्वर नाथ रेणु ने इस उपन्यास के जरिए साबित किया कि बड़ी कहानियां बस महानगरों से ही नहीं, गांव के दलानों से भी निकल सकती हैं।

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आज की पीढ़ी को जरूर पढ़नी चाहिए मैला आंचल

किताब कैफे (Kitaab Cafe): हिंदी साहित्य की दुनिया बहुत बड़ी और रोचक है। इसमें कुछ कहानियां ऐसी भी हैं जिन्हें बस पढ़ी नहीं जाता, महसूस किया जाता है। फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा रचित 'मैला आंचल' ऐसी ही एक रचना है। 1954 में पहली बार प्रकाशित यह उपन्यास आज भी पढ़ने पर नया सा लगता है। अगर आप भारत के गांव, वहां के लोगों की जिंदगी, उनकी खुशियां, दुख, राजनीति और सामाजिक बदलाव को करीब से समझना चाहते हैं तो 'मैला आंचल' आपकी आपके लिए बिल्कुल मुफीद है।

रेणु का गांव

'मैला आंचल' की कहानी बिहार के पूर्णिया इलाके के एक काल्पनिक गांव मेरीगंज के इर्द-गिर्द घूमती है। लेकिन यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। यह उन लाखों भारतीय गांवों का चेहरा है, जहां आजादी के बाद उम्मीदें तो बहुत थीं, लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं थीं। रेणु ने गांव को किसी रोमांटिक नजरिए से नहीं दिखाया। उन्होंने वहां की गरीबी, जातिगत भेदभाव, बीमारी, अंधविश्वास और राजनीतिक खींचतान को पूरी ईमानदारी से लिखा है।

सीधे दिल तक पहुंचती है भाषा

इस उपन्यास की सबसे बड़ी ताकत इसकी भाषा है। रेणु ने शुद्ध साहित्यिक हिंदी के बजाय स्थानीय बोलियों, लोकगीतों और ग्रामीण मुहावरों का इस्तेमाल किया। यही वजह है कि किताब पढ़ते समय लगता है जैसे गांव के चौपाल पर बैठे लोगों की बातचीत सुन रहे हों। 'मैला आंचल' ने हिंदी साहित्य में गंवई लेखन को नई पहचान भी दी।

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याद रह जाते हैं इसके किरदार

उपन्यास का केंद्रीय पात्र डॉक्टर प्रशांत है, जो गांव में आकर लोगों की सेवा करना चाहता है। जल्द ही उसे समझ में आने लगता है कि सिर्फ दवाइयों से समाज की बीमारियां खत्म नहीं होतीं। भ्रष्ट व्यवस्था, सामाजिक असमानता और लोगों की मानसिकता से उसका संघर्ष पाठक को सोचने पर मजबूर कर देता है। यही कारण है कि 'मैला आंचल' के पात्र पढ़ने के बाद भी लंबे समय तक याद रहते हैं।

इस उपन्यास में प्रेम है, राजनीति है, स्वतंत्रता आंदोलन के बाद का भारत है, किसानों का संघर्ष है, महिलाओं की पीड़ा है और बदलते समाज की बेचैनी भी है। रेणु ने किसी उपदेश की तरह नहीं, जीवन के स्वाभाविक प्रवाह में इन सभी विषयों को पिरोया है। इसी वजह से 'मैला आंचल' को हिंदी साहित्य का सामाजिक दस्तावेज भी कहा जाता है।

आज के युवाओं को क्यों पढ़नी चाहिए यह किताब?

आज जब गांवों की तस्वीर तेजी से बदल रही है, तब 'मैला आंचल' हमें अपनी जड़ों से जोड़ती है। यह किताब बताती है कि आधुनिक भारत किन संघर्षों और अनुभवों से होकर यहां तक पहुंचा है।

अगर आप साहित्य के साथ-साथ समाज, इतिहास और भारतीय संस्कृति में दिलचस्पी रखते हैं तो यह उपन्यास आपको निराश नहीं करेगा। इसकी सबसे बड़ी खूबी यही है कि यह किसी एक दौर की कहानी नहीं, भारतीय समाज की सतत यात्रा है।

क्यों अमर है 'मैला आंचल'

फणीश्वर नाथ रेणु ने इस उपन्यास के जरिए साबित किया कि बड़ी कहानियां बस महानगरों से ही नहीं, गांव के दलानों से भी निकल सकती हैं। अगर आपने अब तक यह उपन्यास नहीं पढ़ा है, तो इसे अपनी अगली किताब बनाइए। यकीन मानिए, आखिरी पन्ना पलटने के बाद आपको लगेगा कि आपने कोई उपन्यास नहीं, भारत की आत्मा को पढ़ लिया है।

Suneet Singh
सुनीत सिंह author

सुनीत सिंह टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में डिप्टी न्यूज एडिटर के रूप में कार्यरत हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन में स्पेशल स्टोरीज प्रोजेक्ट का नेतृत्व कर रहे ... और देखें

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