"हमें ऐसी किताबें पढ़नी चाहिए, जो कुल्हाड़ी की तरह हमारे अंदर के जमे बर्फ के समंदर को चीरती चली जाए, हमें चोट पहुंचाए, हमें भीतर तक घायल कर दे। हम ऐसी किताबें पढ़े, जिसे पढ़ने के बाद हम बिल्कुल वैसे न रहें जैसे हम किताब पढ़ने से पहले थे.."
ये कहना था दुनिया का सबसे बड़े साहित्यकार माने जाने वाले फ्रांज काफ्का का। शायद यही कोट उनके पूरे साहित्य को समझने की सबसे सटीक चाबी भी। दुनिया में बहुत कम लेखक ऐसे हुए हैं, जिनके नाम से ही किसी खास मनोस्थिति को पहचान मिल गई। जी हां, आज अगर कोई व्यक्ति ऐसी व्यवस्था में फंस जाए, जहां नियम समझ न आएं, जवाब न मिले और चारों ओर अजीब-सी बेचैनी महसूस हो, तो उसे 'काफ्काएस्क' (Kafkaesque) यानी काफ्का जैसा कहा जाता है। ये शब्द ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भी शामिल है।
ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में Kafkaesque का अर्थ
आज साहित्यकारों की दुनिया के चे ग्वेरा कहे जाने वाले फ्रांज काफ्का की जयंती है। 3 जुलाई 1883 को जन्मे फ्रांज काफ्का आज के इंसान की बेचैनी, अकेलेपन और असुरक्षा के सबसे बड़े कथाकार थे। हैरानी की बात यह है कि उनके जीते जी उन्हें वो पहचान नहीं मिली, जो आज दुनिया भर में हासिल है। वो साहित्यकार जिसने खुद अपना सारा लिखा नष्ट कर देने की अंतिम इच्छा जताई थी, वही आज विश्व साहित्य के सबसे प्रभावशाली नामों में गिना जाता है।
प्राग के चे ग्वेरा हैं फ्रांज काफ्का
फ्रांज काफ्का का जन्म आज के चेक गणराज्य की राजधानी प्राग में एक जर्मन भाषी यहूदी परिवार में हुआ था। प्राग ने काफ्का को जितना दिया उसका कई गुना ज्यादा काफ्का ने उसे लौटाया। आज भी साहित्य की दुनिया के लोग प्राग को काफ्का के शहर के नाम से पूजते हैं। काफ्का प्राग में वैसे ही मशहूर है जैसे क्यूबा में चे ग्वेरा। आप यूं समझें कि आज चे ग्वेरा की ही तरह काफ्का के नाम और फोटो वाले टी शर्ट, पोस्टर, मग, की-रिंग्स, पेंटिंग्स आपको पूरे प्राग में आज भी मिल जाएंगी।
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पिता को कभी नहीं किया 'माफ'
फ्रांज काफ्का के पिता मिजाज से सख्त और पेशे से लकड़ी के व्यापारी थे। काफ्का के व्यक्तित्व पर उनका गहरा असर पड़ा। पिता के साथ उनका ऐसा रिश्ता था कि वो कभी उन्हें 'माफ' नहीं कर सके। अपने पिता को उनका लिखा खत 'लेटर टू हिज फादर' इस बात की साफ तस्दीक करता है कि उन्हें बचपन में ही कितना 'बड़ा' कर दिया गया था। ये बात अलग है कि आजीवन वो अपने पिता के सामने खुद को छोटा, कमजोर और डरा हुआ बच्चा ही महसूस करते रहे।
बचपन में पैदा हुई यह हीनता और असुरक्षा आगे चलकर उनकी रचनाओं का स्थायी भाव बन गई। उनके पात्र ज्यादातर ऐसी दुनिया में जीते दिखाई देते, जहां वो खुद को असहाय और बेगाना महसूस करते।
होटल से हवेली तक, प्राग में हर जगह है काफ्ता (Photo: istock)
दिन में नौकरी, रात में साहित्य
काफ्का ने कानून की पढ़ाई की और किसी बीमा कंपनी में नौकरी करने लगे। उनका दिन नौकरी और रातें लिखने में खर्च होती थीं। देर रात तक उनकी कलम चलती रहती। उन्होंने अपनी सारी जिंदगी अपने लिखे में ही जीने की कोशिश की।
अगर हम काफ्का को समझने की कोशिश करेंगे तो उनका जीवन बाहर से देखने पर बिल्कुल साधारण लगेगा, लेकिन आप जितना अंदर जाएंगे तो पाएंगे कि वो इंसान ना जाने कितनी गहरी बेचैनी से भरा था। इस बेचैनी को यूं समझिए कि काफ्का को कई दिनों तक नींद ही नहीं आती थी। वे लोगों से मिलने जुलने से जितना हो सके उतना बचते थे और खुद को लगातार परखते रहते थे। शायद यही कारण है कि उनके साहित्य में इंसान के अंदर की घुटन इतनी प्रामाणिक दिखाई देती है।
जब एक सुबह आदमी कीड़े में बदल गया
विश्व साहित्य में शायद ही कोई शुरुआत इतनी चौंकाने वाली हो, जितनी उनके सबसे मशहूर उपन्यास 'द मेटामॉरफोसिस' की है। इस कहानी में एक सुबह ग्रेगर साम्सा ना का शख्स जब बेचैन सपनों से जागा तो उसने पाया कि वह एक विशाल कीड़े में बदल चुका है। अगर आप इस कहानी को किसी एक शख्स के कीड़ा बन जाने की कहानी की समझ रहे हैं ये तो आपकी भूल है।
दरअसल ये हर उस इंसान की कहानी है जो धीरे-धीरे अपने परिवार, समाज और काम की मशीनरी में इतना अप्रासंगिक हो जाता है कि उसकी उपस्थिति का कोई अर्थ नहीं रह जाता। यही कारण है कि आज भी द मेटामॉरफोसिस को इंसानी जीवन के अकेलेपन की सबसे शक्तिशाली कहानियों में गिना जाता है।
काफ्का की 'द मेरामॉरफेसिस'
जिसने थोड़ा बहुत भी साहित्य पढ़ा है वो गैब्रिएल गार्सिया मार्केज को जरूर जानता होगा। नोबेल पुरस्कार विजेता गैब्रिएल ने खुद माना था कि द मेटामॉरफोसिस पढ़ने के बाद उन्हें एहसास हुआ कि साहित्य में किसी भी तरह से लिखा जा सकता है और इसी एक बात ने उन्हें लिखने के लिए मजबूर किया। काफ्का को पढ़कर लिखना शुरू करने वाले गैब्रिएल गार्सिया मार्केज आज साहित्य की दुनिया के पितामह बन चुके हैं।
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अधूरे उपन्यास, अमर साहित्य
काफ्का ने साहित्य की दुनिया को कितना कुछ दिया है ये तो किसी से छिपा नहीं है। द ट्रायल, द कैसल, अमेरिका, ए हंगर आर्टिस्ट और लेटर टू हिज फादर उनकी कलम के सबसे नायाब नमूने हैं। यहां आप शायद ही जानते हों कि द ट्रायल और द कैसल अधूरे उपन्यास हैं। इन्हें काफ्का ने पूरा लिखा ही नहीं।
द ट्रायल में एक व्यक्ति को बिना अपराध बताए गिरफ्तार कर लिया जाता है। वह पूरी कहानी में अपने अपराध का कारण जानने की कोशिश करता रहता है। काफ्का की ये कहानी आज भी उस व्यवस्था का प्रतीक है, जहां व्यक्ति समाज के बनाए नियमों के सामने खुद को असहाय पाता है। वहीं द कैसल का नायक एक ऐसे महल तक पहुंचने की कोशिश करता है, जहां प्रवेश लगभग नामुमकिन है। होता भी ऐसा ही है। दोनों उपन्यासों को खत्म करने से पहले ही काफ्का का निधन हो गया था।
अपना सारा लिखा जला देना चाहते थे काफ्का
काफ्का काफी कम समय में ही दुनिया को अलविदा कह गए। उन्हें टीबी से मिलती जुलती एक गंभीर बीमारी थी। उन्होंने खुद को बचाने की बहुत ज्यादा कोशिश भी नहीं की। वो खून की उल्टियां करते हुए भी लिखते रहे। तब तक उनकी कलम चलती रही जब तक सांसे ना थम गईं।
जीवन के अंतिम कुछ सालों में उनके सबसे करीब रहीं उनकी प्रेमिका और लेखक दोस्त मैक्स ब्रॉड।
अपने लिखे से 'नफरत' करते थे फ्रांज काफ्का (Photo: Wallpapercat)
काफ्का को अपना लिखा कभी रास नहीं आया। वो कभी नहीं चाहते थे कि उनका लिखा कोई पढ़ पाए। उन्होंने अपने दोनों करीबियों के सामने मरने से पहले अंतिम इच्छा बताई थी कि उनके जाने के बाद उनका सारा लिखा जला दिया जाए। कोई भी इतना 'घटिया' लिखा ना पढ़ने पाए। वो दोनों के सामने तब तक जिद पर अड़े रहे जब तक उनसे वादा नहीं ले लिया।
काफ्का के रुखसती के बाद मैक्स ब्रॉड इतनी हिम्मत नहीं जुटा पाए कि उनके लिखे को जला सके। उन्होंने अपने दोस्त को 'धोखा' दिया। दोस्त की आखिरी ख्वाहिश को दरकिनार कर मैक्स ब्रॉड ने काफ्का के लिखे को छपवाने का फैसला किया।
काफ्का का लिखा जब छपा तो पूरी दुनिया में तहलका मच गया। उनकी कलम में जादू था। ऐसा जादू जिसे आने वाली पीढ़ियां हमेशा याद रखने वाली थीं। हुआ भी ऐसा ही। आज उनकी मौत के 143 साल बाद भी लोग उनके लिखे के दीवाने हैं। 'बुद्धजीवियों' की नजर में नाकारा समझी जाने वाली जेन जी भी काफ्का को कोट करते हुए दिख जाती है।
सोचिए अगर मैक्स ब्रॉड अपने सबसे अच्छे दोस्त की अंतिम इच्छा पूरी कर देते, तो ये दुनिया साहित्य के सबसे बड़े जादूगर को शायद कभी कभी जान ही नहीं पाती।
