कश्मीर से कन्याकुमारी तक, पुराने राजमहलों की चारदीवारी के बीच बहुत सी मशहूर प्रेम कहानियां कैद हैं। आज हम आज हम शाही इश्क की जो दास्तान बता रहे हैं वो है चेक रिपब्लिक की एक खूबसूरत एक्ट्रेस यूजिनी मैरी ग्रोसुपोवा की, जो प्यार की खातिर सात समंदर पार कर भारत आईं और कपूरथला की 'महारानी तारा देवी' बनीं।
जब 63 साल के महाराजा को हुआ 22 साल की एक्ट्रेस से प्यार
कहानी शुरू होती है साल 1936 में। कपूरथला के महाराजा जगजीत सिंह उस वक्त 63 साल के थे। वे पहले ही पांच शादियां कर चुके थे और अपनी स्पैनिश पत्नी अनीता डेलगाडो से तलाक के आठ साल बाद अकेले थे।
तभी उनकी जिंदगी में एंट्री हुई 22 साल की यूजिनी की। यूजिनी उस समय वियना के मशहूर 'बर्गथिएटर' की एक पॉपुलर एक्ट्रेस और डांसर थीं। महाराजा उनके एक स्टेज शो को देखने पहुंचे और उनकी खूबसूरती और एक्टिंग देखकर उन पर पूरी तरह लट्टू हो गए। शो खत्म होने के बाद महाराजा ने उन्हें गुलाब का गुलदस्ता भेजा और उनका दिल जीतने की कोशिश में लग गए। महाराजा इस कदर दीवाने थे कि उन्होंने यूजिनी को उनके थिएटर कॉन्ट्रैक्ट से आजाद कराने के लिए उस जमाने में 20,000 डॉलर तक दे दिए।
पेरिस से पंजाब तक का सफर
महाराजा का प्रपोजल मानकर यूजिनी साल 1938 में अपनी मां और एक गवर्नेस के साथ पेरिस और लंदन होते हुए भारत आ गईं। साल 1942 में दोनों ने सिख रीति-रिवाज से शादी कर ली। शादी के बाद यूजिनी को नया नाम मिला - महारानी तारा देवी।
महल की चकाचौंध में अकेलापन
शुरुआत में सब कुछ किसी सपने जैसा था, लेकिन जल्द ही हकीकत सामने आने लगी। महाराजा और उनके बीच 41 साल का बड़ा ऐज गैप था। इसके अलावा, यूरोप के मॉडर्न और आजाद ख्याल माहौल से आकर कपूरथला के महल की बंदिशों में ढलना तारा देवी के लिए बहुत मुश्किल था। उन्हें अपने पुराने दिनों और यूरोप की याद सताने लगी। दूरियां इतनी बढ़ीं कि 1945 तक आते-आते दोनों महल के अलग-अलग हिस्सों में रहने लगे।
जब सताने लगा मौत का डर
तारा देवी की जिंदगी में सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कपूरथला में ही उनकी मां की अचानक मौत हो गई। इस घटना ने उन्हें अंदर से हिला दिया। उन्हें पैरानॉयड यानी एक तरह का मानसिक डर होने लगा कि उनकी मां को जहर दिया गया था और अब अगली बारी उनकी है।
अकेलेपन और इस खौफ से तंग आकर उन्होंने भारत छोड़ने और अमेरिका में अपने रिश्तेदारों के पास जाने का फैसला किया। वे महल छोड़कर दिल्ली के 'मेडन्स होटल' में आ गईं। लेकिन उस समय (दूसरे विश्व युद्ध के ठीक बाद) ट्रैवल परमिट मिलना बहुत मुश्किल था और ब्रिटिश सरकार भी उनके पेपरवर्क में कोई मदद नहीं कर रही थी। तारा देवी दिल्ली में खुद को फंसा हुआ महसूस करने लगीं और पैनिक में आ गईं।
कुतुब मीनार से कूद कर दे दी जान
9 दिसंबर 1946 का वो काला दिन था। तारा देवी अपने दो पालतू कुत्तों के साथ दिल्ली के कुतुब मीनार घूमने गईं। उन्होंने पूरे परिसर का चक्कर लगाया और फिर कुतुब मीनार की सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंच गईं। वहां से उन्होंने अपने दोनों कुत्तों के साथ नीचे छलांग लगा दी। उनकी मौके पर ही मौत हो गई।
उन्हें दिल्ली के सेंट जेम्स चर्च के क्रिश्चियन कब्रिस्तान में दफनाया गया। बाद में उनके एक करीबी ने इस बात की जांच की मांग भी उठाई थी कि यह सुसाइड था या कोई गहरी साजिश, लेकिन सच आज भी कुतुब मीनार की गहराइयों में कहीं दफन है। महारानी तारा देवी की संदिग्ध मौत के कुछ महीनों बाद ही महाराजा जगजीत सिंह ने भी दम तोड़ दिया। और इस तरह एक प्रेमकहानी का दर्दनाक अंत हो गया।
