प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन दिनों ऐसे क्षेत्र के दौरे पर हैं, जिसे 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था का सबसे अहम केंद्र माना जा रहा है। इंडो-पैसिफिक और तस्मान (Tasman) क्षेत्र आज सिर्फ समुद्री नक्शे पर मौजूद भौगोलिक हिस्से नहीं हैं, बल्कि वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री सुरक्षा और चीन के बढ़ते साम्राज्यवादी प्रभाव के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन चुके हैं। ऐसे समय में पीएम मोदी का यह दौरा भारत की विदेश नीति, आर्थिक हितों और सुरक्षा रणनीति के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। बता दें पीएम मोदी अपने मौजूदा दौरे में पहले इंडोनेशिया गए, इसके बाद ऑस्ट्रेलिया और आज वह न्यूजीलैंड के दौरे पर हैं।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र क्या है?
Indo Pacific वह विशाल समुद्री इलाका है जो हिंद महासागर से शुरू होकर पश्चिमी और मध्य प्रशांत महासागर तक फैला हुआ है। इसमें पूर्वी अफ्रीका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और प्रशांत द्वीपीय देश भी शामिल माने जाते हैं। ज्ञात हो कि दुनिया के लगभग 60 फीसद समुद्री व्यापार और बड़ी मात्रा में तेल व गैस की आपूर्ति इसी समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरती है। भारत के कुल विदेशी व्यापार का एक बड़ा हिस्सा भी इन्हीं समुद्री मार्गों से होकर जाता है। इसलिए इस क्षेत्र में स्थिरता भारत की आर्थिक सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है।
तस्मान क्षेत्र किसे कहते हैं?
यह तो आप जानते ही हैं कि तस्मान क्षेत्र का नाम तस्मान सागर (Tasman Sea) से लिया गया है, जो ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच मौजूद है। यह समुद्री क्षेत्र दक्षिणी प्रशांत तक पहुंचने का एक प्रमुख मार्ग है और इसे ऑस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के समुद्री संपर्क की जीवनरेखा भी माना जाता है। यह क्षेत्र अब भारत के लिए भी अहम होता जा रहा है, क्योंकि हिंद महासागर से प्रशांत महासागर तक समुद्री सहयोग बढ़ाने में इसकी भूमिका बहुत ही अहम है। भविष्य में समुद्री लॉजिस्टिक्स, ब्लू इकोनॉमी, ओशियन रिसर्च और रक्षा सहयोग के लिहाज से इसका महत्व लगातार बढ़ रहा है।
भारत के लिए इंडो-पैसिफिक और तस्मान क्षेत्र का भौगोलिक महत्व क्या है?
भारत की समुद्री तटरेखा लगभग 7,800 किलोमीटर लंबी है। देश का करीब 95 फीसद व्यापार (मात्रा के आधार पर) और करीब 70 फीसद व्यापार (मूल्य के आधार पर) समुद्री मार्गों से ही होता है। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सुरक्षित समुद्री मार्ग भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी जरूरी हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया से आने वाला अधिकांश कच्चा तेल इन्हीं समुद्री रास्तों से भारत, बांग्लादेश, म्यांमार, चीन, इंडोनेशिया, मलेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड जैसे देशों तक पहुंचता है। पश्चिम एशिया में इस समय जिस तरह का तनाव देखा जा रहा है, अगर यह तनाव बढ़ता है उसका असर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र पर निश्चित तौर पर पड़ेगा। अगर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री मार्ग प्रभावित होते हैं तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, निर्यात, आयात और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ना तय है।
चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की रणनीति
पिछले कुछ वर्षों में चीन ने दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर और प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य व आर्थिक मौजूदगी लगातार बढ़ाई है। क्षेत्र में चीन बंदरगाहों यानी पोर्ट्स के विकास, समुद्री निवेश और नौसैनिक गतिविधियों के जरिए अपनी रणनीतिक पहुंच मजबूत करके भारत को घेर रहा है। चीन के उलट इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत की नीति किसी टकराव के बजाय 'स्वतंत्र, खुला, समावेशी और नियम-आधारित इंडो-पैसिफिक' का समर्थन करने की रही है। इसी सोच के तहत भारत इस क्षेत्र में मौजूद देशों के साथ रक्षा, समुद्री निगरानी, आपदा राहत और समुद्री सुरक्षा सहयोग को लगातार आगे बढ़ा रहा है।
द्विपक्षीय संबंध क्यों हैं अहम?
भारत और इंडोनेशिया सिर्फ दो देश नहीं हैं, बल्कि यह ऐतिहासिक तौर पर एक ही संस्कृति से जुड़े हुए हैं। पीएम मोदी के ताजा इंडोनेशिया दौरे ने भारत की 'एक्ट ईस्ट' नीति और इंडो-पैसिफिक रणनीति को नई गति दी है। दोनों देशों ने रक्षा सहयोग, समुद्री सुरक्षा, डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) को मजबूत करने पर सहमति जताई। इंडो पैसिफिक में जहाजों की बे-रोकटोक आवाजाही, समुद्री कानूनों के सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी दोनों नेताओं ने साझा प्रतिबद्धता दोहराई।
भारत के हिंद-प्रशांत क्षेत्र के देशों से करीबी संबंध
जैसा कि हमने पहले ही बताया दोनों देशों के संबंध सदियों पुराने सांस्कृतिक, धार्मिक और समुद्री संपर्कों पर आधारित हैं। दोनों देश G20, ASEAN, East Asia Summit और Indian Ocean Rim Association (IORA) जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी करीबी सहयोगी हैं।
पीएम मोदी के इस दौरे के रणनीतिक महत्व का एक बड़ा पहलू भारत का ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट भी है। अंडमान-निकोबार में बनाए जा रहे इस ट्रांस-शिपमेंट पोर्ट और मिलिट्री इंफ्रास्ट्रक्चर मलक्का जलडमरूमध्य (Strait of Malacca) के बेहद करीब है, जहां से दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्ग गुजरते हैं। यह परियोजना भारत की समुद्री निगरानी, व्यापारिक कनेक्टिविटी और आपदा प्रबंधन क्षमता को मजबूत करेगी। यह परियोजना इंडोनेशिया के साथ भारत के समुद्री सहयोग, ब्लू इकोनॉमी और क्षेत्रीय सुरक्षा को भी नई मजबूती मिलेगी। भारत के लिए यह परियोजना इसलिए भी अहम है क्योंकि चीन की 80 फीसद तेल आपूर्ति मलक्का स्ट्रेट से ही होती है। इस परियोजना के जरिए भारत न सिर्फ इस पर नजर रख पाएगा, बल्कि जरूरत पड़ने पर चीन की सप्लाई चेन को तोड़ भी सकता है।
भारत और ऑस्ट्रेलिया के संबंध पिछले एक दशक में कई क्षेत्रों में तेजी से मजबूत हुए हैं। इनमें प्रमुख हैं -
- रक्षा और नौसैनिक अभ्यास
- महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals) में सहयोग
- एजुकेशन और रिसर्च
- क्लीन एनर्जी
- बिजनेस और इंवेस्टमेंट
- समुद्री सुरक्षा
ऑस्ट्रेलिया, भारत को लिथियम जैसे महत्वपूर्ण खनिज उपलब्ध कराने वाले प्रमुख देशों में शामिल है, जो इलेक्ट्रिक वाहन और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए बेहद जरूरी हैं। इसके अलावा पीएम मोदी ने अपने मौजूदा दौरे में ऑस्ट्रेलिया के साथ कई अहम समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत ऑस्ट्रेलिया भारत की ऊर्जा जरूरतों के लिए यूरेनियम देगा। ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय भारत में अपने कैंपस खोलेंगे, भारत में बिग बैश लीग (T20 लीग) का मैच भी खेला जाएगा।
भारत और न्यूजीलैंड कृषि, डेयरी, शिक्षा, पर्यटन, डिजिटल अर्थव्यवस्था और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने पर लगातार काम कर रहे हैं। न्यूजीलैंड में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं। भारतीय मूल का समुदाय दोनों देशों के संबंधों को सामाजिक और आर्थिक स्तर पर मजबूती देता है।
अंतराष्ट्रीय मंचों पर भी लगातार बढ़ रहा है सहयोग?
भारत, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में कई अहम मंचों के जरिए अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। उनमें से कुछ के बारे में हम यहां बता रहे हैं -
क्वाड (Quad) - यह भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के गठबंधन वाला समूह है। इसके जरिए चीन की 'स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स' यानी भारत को घेरने की नीति के जवाब में भारत इंडो-पैसिफिक में अपनी पकड़ और मजबूत कर रहा है। साथ ही नौसैनिक पहुंच (Naval Access) तस्मान सागर तक भी बढ़ा रहा है। इस ग्रुप का फोकस समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रबंधन, साइबर सिक्योरिटी, तकनीक और डिस्ट्रिब्यूशन चेन को मजबूत करना है।
आईओआरए (Indian Ocean Rim Association) - हिंद महासागर क्षेत्र में आर्थिक और समुद्री सहयोग के लिए 1997 में बनाए गए इस ग्रुप में कुल 23 देश हैं। भारत और साउथ अफ्रीका ने इसका सुझाव दिया था और इस संगठन का मुख्यालय मॉरिशस के Ebène में है। ग्रुप में अफ्रीका, पश्चिम एशिया, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्वी एशिया, यूरोप और यूरेशिया में मौजूद भारत, ऑस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, साउथ अफ्रीका, श्रीलंका, मालदीव, मॉरिशस, बांग्लादेश और यूएई जैसे देश शामिल हैं। इनके अलावा 12 डायलॉग पार्टनर भी हैं, जिसमें चीन के साथ ही यूरोपियन यूनियन, जापान और यूके भी शामिल हैं। समुद्री सुरक्षा और संरक्षा, व्यापार और निवेश को बढ़ावा देना, मत्स्य पालन प्रबंधन, आपदा जोखिम प्रबंधन, पर्यटन और सांस्कृतिक आदान-प्रदान, शिक्षा, विज्ञान और टेक्नोलॉजी जैसे प्रमुख क्षेत्रों में सभी देश मिलकर काम करते हैं।
ईस्ट एशिया समिट - आसियान (ASEAN) के साथ साझेदारी में ईस्ट एशिया समिट एक ताकतवर क्षेत्रीय फोरम है। इसमें आसियान के 10 देशों के साथ ही ऑस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, न्यूजीलैंड, कोरिया, रूस और अमेरिका सहित कुल 18 देश शामिल हैं। इस फोरम को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रमुख रणनीतिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए साल 2005 में बनाया गया था।
इंडो-पैसिफिक ओशन्स इनिशिएटिव (IPOI) - इसकी शुरुआत भारत ने साल 2019 में समुद्री सहयोग बढ़ाने के उद्देश्य से की। इसे सात स्तंभों के आधार पर तैयार किया गया है, जिनमें समुद्री सुरक्षा और पर्यावरण से लेकर व्यापार कनेक्टिविटी तक शामिल हैं। इन पिलरों का नेतृत्व अमेरिका, जापान, फ्रांस और यूके जैसे कई अंतरराष्ट्रीय साझेदार करते हैं।
Pacific Islands Forum - यह ओशिनिया का प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक नीति संगठन है। साल 1971 में बनाए गए इस संगठन के 18 सदस्य देश क्षेत्रीय शांति, सुरक्षा, आर्थिक विकास और जलवायु परिवर्तन के मुद्दों पर मिलकर काम करते हैं। इस समूह का मुख्यालय सुवा, फिजी में है। पैसिफिक आइलैंड्स फोरम के सदस्य देशों के साथ भारत विकास, जलवायु परिवर्तन और क्षमता निर्माण के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ा रहा है।
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में भारत के ऐतिहासिक और धार्मिक संबंध भी मजबूत
भारत और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के संबंध सिर्फ आधुनिक कूटनीति तक ही सीमित नहीं हैं। यह संबंध सदियों पुराने हैं। यह संबंध पुराने व्यापारिक संबंध ही नहीं हैं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक तौर पर भी बेहद मजबूत हैं। सदियों पहले भारतीय व्यापारी समुद्री मार्गों के जरिए दक्षिण-पूर्व एशिया तक पहुंचे थे। हिंदू और बौद्ध संस्कृति का प्रभाव आज भी इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया और अन्य देशों में साफ तौर पर दिखाई देता है।
भारत में धार्मिक आस्था के सबसे मजबूत स्तंभ और प्रमाण रामायण और महाभारत हैं, यही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराएं कई अन्य देशों में स्थानीय रूप में मौजूद हैं। बौद्ध धर्म के प्रसार में भी भारत की ऐतिहासिक भूमिका रही है, बल्कि भारत से निकलकर ही दुनियाभर में बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार हुआ। ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में भारतीय प्रवासी समुदाय लगातार बढ़ रहा है, जो इन देशों के साथ भारत के सांस्कृतिक और आर्थिक संबंधों को नई मजबूती दे रहा है।
ब्लू इकोनॉमी और भविष्य की संभावनाएं
इंडो-पैसिफिक क्षेत्र मत्स्य पालन, समुद्री जैव विविधता, ऑफशोर एनर्जी, समुद्री परिवहन और समुद्री संसाधनों का बड़ा केंद्र है। भारत ब्लू इकोनॉमी को भविष्य की विकास रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। समुद्री बंदरगाहों (Ports) का आधुनिकीकरण, ग्रीन शिपिंग, ओशियन रिसर्च और डिजिटल मैरीटाइम कनेक्टिविटी पर भी तेजी से काम हो रहा है।
पीएम मोदी का दौरा और दुनिया को संदेश
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंडो-पैसिफिक और तस्मान क्षेत्र का दौरा सिर्फ द्विपक्षीय बैठकों तक सीमित नहीं है। यह भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा भी है, जिसके तहत भारत एक विश्वसनीय, जिम्मेदार और संतुलित समुद्री शक्ति के रूप में अपनी भूमिका मजबूत करना चाहता है। व्यापारिक संपर्क, रक्षा सहयोग, सप्लाई चेन, स्वच्छ ऊर्जा, टेक्निकल पार्टनरशिप और रीजनल स्टेबिलिटी जैसे मुद्दे इस यात्रा के केंद्र में रहे हैं। ऐसे समय में जब इंडो-पैसिफिक वैश्विक शक्ति संतुलन का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुका है, भारत की सक्रिय मौजूदगी उसके दीर्घकालिक रणनीतिक और आर्थिक हितों को नई दिशा देंगे।
