एडम मोसेरी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम के CEO हैं। हाल ही में उन्होने बताया कि उनके बच्चे स्क्रीन टाइम 'कमाते' हैं। यानी उन्हें मोबाइल, वीडियो गेम या टीवी देखने का मजा मुफ्त में नहीं मिलता। कुछ जिम्मेदारियां पूरी करने के बाद ही स्क्रीन टाइम मिलता है। डिजिटल युग में इंस्टाग्राम सीईओ के इस पेरेंटिंग स्टाइल ने नई बहस छेड़ दी है।
क्या है 'स्क्रीन टाइम कमाने' का कॉन्सेप्ट?
एडम मोसेरी के बच्चों के लिए ऐसी व्यवस्था बनाई है कि पूरे सप्ताह के दौरान उनके पास आधे-आधे घंटे के तीन स्लॉट होते हैं, जिनमें उन्हें अपना होमवर्क करना होता है। अगर वे अपने तीनों होमवर्क सेशन्स पूरे कर लेते हैं, तो उन्हें वीकेंड मे 90 मिनट का स्क्रीन टाइम मिल जाता है। इस कॉन्सेप्ट का उद्देश्य बच्चों को यह समझाना है कि मनोरंजन अधिकार नहीं, जिम्मेदारी निभाने के बाद मिलने वाला ईनाम है। यह एक नए तरह की पेरेंटिंग स्टाइल है।
मोसेरी ने Its Called Soccer नाम के एक पॉडकास्ट में बताया कि पहले जब वह बच्चों को वीडियो गेम्स खेलने से रोकते थे तो वे बहुत ज्यादा असंतुलित और परेशान हो जाते थे और उनका व्यवहार और भी खराब हो जाता था। तब मैंने सोचा कि ठीक है, मैं अब कभी स्क्रीन टाइम नहीं छीनूंगा। उन्होंने बच्चों को समझाया कि शुरुआत में तुम्हारे पास कुछ नहीं होता और फिर तुम्हें उसे अपने प्रयासों से कमाना पड़ता है।
आज के समय में जब बच्चे घंटों मोबाइल, टैबलेट और वीडियो गेम में खोए रहते हैं, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि स्क्रीन टाइम को सीमित करने के लिए यह तरीका कारगर साबित हो सकता है।
मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं?
बाल विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्क्रीन टाइम को पूरी तरह प्रतिबंधित करने के बजाय उसे संतुलित तरीके से प्रबंधित करना ज्यादा प्रभावी होता है। यदि बच्चे यह समझते हैं कि उन्हें कुछ जिम्मेदारियां निभाने के बाद स्क्रीन का समय मिलेगा, तो उनमें अनुशासन और सेल्फ कंट्रोल विकसित हो सकता है। हालांकि विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि स्क्रीन टाइम को हर अच्छे व्यवहार का इनाम बना देना भी सही नहीं है। ऐसा करने से बच्चे स्क्रीन को जरूरत से ज्यादा मूल्यवान समझने लग सकते हैं और उसका आकर्षण बढ़ सकता है।
बच्चों के लिए कितना स्क्रीन टाइम सही?
विशेषज्ञों के अनुसार स्क्रीन टाइम की मात्रा बच्चे की उम्र पर निर्भर करती है।
- 2 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन एक्सपोजर बहुत सीमित होना चाहिए।
- 2 से 5 साल के बच्चों के लिए प्रतिदिन लगभग एक घंटे की हाई क्वालिटी कंटेंट पर्याप्त मानी जाती है।
- बड़े बच्चों और किशोरों के लिए निश्चित समय सीमा से ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उनकी नींद, पढ़ाई, शारीरिक गतिविधि और सामाजिक जीवन प्रभावित न हो।
सिर्फ समय नहीं, कंटेंट भी महत्वपूर्ण
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल स्क्रीन पर बिताए गए मिनटों की गिनती पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि बच्चा स्क्रीन पर क्या देख रहा है। शैक्षिक सामग्री, रचनात्मक गतिविधियां और सीखने वाले ऐप्स मनोरंजन आधारित कंटेंट से अलग प्रभाव डालते हैं।
पैरेंट्स क्या करें?
- घर में स्पष्ट डिजिटल नियम बनाएं।
- भोजन के समय स्क्रीन से दूरी रखें।
- सोने से पहले स्क्रीन का उपयोग कम करें।
- बच्चों के सामने खुद भी संतुलित स्क्रीन उपयोग का उदाहरण पेश करें।
- स्क्रीन टाइम को पढ़ाई, खेल और पारिवारिक समय के साथ संतुलित रखें।
कुल मिलाकर तमाम विशेषज्ञ और मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चों से स्क्रीन पूरी तरह छीन लेना समाधान नहीं है, लेकिन बिना किसी सीमा के स्क्रीन देना भी नुकसानदायक हो सकता है। सही नियम और संतुलन के साथ बच्चे डिजिटल दुनिया का लाभ उठा सकते हैं, वो भी बिना उसके गुलाम बने। ऐसे में इंस्टाग्राम प्रमुख एडम मोसेरी का "स्क्रीन टाइम कमाने" वाला कॉन्सेप्ट काफी हद तक पेरेंट्स के लिए लाभकारी माना जा सकता है।
