Global Dignity Day 2026: बच्चों को अच्छे नंबर लाना, दूसरों की मदद करना और बड़ों की बात मानना तो सिखाया जाता है, लेकिन क्या हम उन्हें खुद की इज्जत करना भी सिखाते हैं? ग्लोबल डिग्निटी डे पर जानिए पेरेंटिंग की 7 ऐसी आदतें, जो बच्चों में आत्मसम्मान और आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद कर सकती हैं।
बच्चे जब छोटे होते हैं, तो अपने बारे में बहुत कुछ माता-पिता की नजरों से सीखते हैं। उन्हें लगता है कि मम्मी-पापा जो कह रहे हैं, वही सच है। अगर बार-बार उनकी तारीफ होती है, तो वे खुद को अच्छा समझने लगते हैं। वहीं, हर छोटी गलती पर डांट, तुलना या मजाक का सामना करना पड़े, तो वे अपनी काबिलियत पर शक करने लग सकते हैं।
हर साल अक्टूबर के तीसरे बुधवार को ग्लोबल डिग्निटी डे (Global Dignity Day) मनाया जाता है। साल 2026 में यह दिन 21 अक्टूबर को है। इस दिन का मकसद हर इंसान के सम्मान और गरिमा के महत्व को समझाना है। बच्चों की परवरिश में भी इसकी खास अहमियत है। आत्मसम्मान का मतलब बच्चों को यह समझाना है कि उनकी अपनी पहचान है, उनकी भावनाएं मायने रखती हैं और गलतियां करने से उनकी अहमियत कम नहीं होती।
इसके लिए किसी खास क्लास या महंगे कोर्स की जरूरत नहीं है। माता-पिता अपनी रोजमर्रा की कुछ आदतें बदलकर बच्चों को खुद का सम्मान करना सिखा सकते हैं।
1. बच्चों की बात पूरी सुनें, बीच में टोकने की आदत छोड़ें
कई बार बच्चे स्कूल की कोई छोटी घटना बताने आते हैं और माता-पिता फोन देखते हुए बस हां-हां कह देते हैं। हो सकता है वह बात आपके लिए मामूली हो, लेकिन बच्चे के लिए बहुत बड़ी हो।
जब बच्चा कुछ बताने आए, तो कुछ मिनट उसके लिए निकालें। उसकी आंखों में देखकर बात सुनें। हर बात पर तुरंत सलाह देना भी जरूरी नहीं है। कभी-कभी सिर्फ यह कहना कि 'अच्छा, फिर क्या हुआ?' भी काफी होता है। इससे बच्चे को महसूस होता है कि उसकी बात की अहमियत है। धीरे-धीरे वह अपनी राय खुलकर रखना सीखता है।
2. गलती पर बच्चे को बुरा कहने के बजाय उसका व्यवहार सुधारें
'तुमसे कोई काम ठीक से नहीं होता', 'तुम बहुत लापरवाह हो' या 'तुम कभी नहीं सुधरोगे' जैसी बातें गुस्से में निकल जाती हैं। लेकिन बच्चे इन शब्दों को अपने व्यक्तित्व से जोड़ सकते हैं।
मान लीजिए बच्चे ने पानी गिरा दिया। उसे लापरवाह कहने के बजाय कहें, 'पानी गिर गया है, चलो इसे साफ करते हैं। अगली बार गिलास ध्यान से पकड़ना।'
बच्चे को समझाएं कि गलती करना और गलत इंसान होना दो अलग बातें हैं। इससे वह गलती छिपाने के बजाय उसे सुधारना सीख सकता है।
3. दूसरे बच्चों से तुलना करना बंद करें
'देखो, तुम्हारी बहन कितनी अच्छी पढ़ती है', 'तुम्हारे दोस्त के तो पूरे नंबर आए हैं' या 'पड़ोस का बच्चा कितना समझदार है।'
ऐसी तुलना कई घरों में सामान्य है। माता-पिता का इरादा बच्चे को बेहतर करने के लिए प्रेरित करना होता है, लेकिन इसका उलटा असर भी हो सकता है।
बच्चा यह मानने लगता है कि उसे प्यार या तारीफ तभी मिलेगी, जब वह किसी दूसरे से बेहतर होगा। इसके बजाय उसकी अपनी प्रगति पर ध्यान दें। अगर पिछले महीने वह पांच लाइन लिख पाता था और अब दस लिख रहा है, तो उस सुधार की तारीफ करें। उसे समझाएं कि हर बच्चे की सीखने की रफ्तार अलग होती है।
4. बच्चों को छोटी-छोटी चीजों में अपनी पसंद रखने दें
बच्चे कौन से कपड़े पहनेंगे, कौन सा खेल खेलेंगे या छुट्टी के दिन क्या करना चाहेंगे, हर फैसला माता-पिता ही करें, तो उन्हें अपनी पसंद पर भरोसा करना मुश्किल हो सकता है।
उम्र के हिसाब से बच्चों को छोटे फैसले लेने दें। जैसे दो उपयुक्त कपड़ों में से एक चुनना, अपना स्कूल बैग व्यवस्थित करना या परिवार के साथ किसी गतिविधि का चुनाव करना।
अगर बच्चे की पसंद आपकी पसंद से अलग है, तो हर बार उसे गलत साबित करने की जरूरत नहीं है। इससे बच्चा समझता है कि उसकी राय भी मायने रखती है। साथ ही वह अपने फैसलों की जिम्मेदारी लेना सीखता है।
5. बच्चे की कोशिश की तारीफ करें, सिर्फ रिजल्ट की नहीं
बच्चे ने ड्राइंग बनाई, लेकिन वह बहुत सुंदर नहीं बनी। उसने कविता याद की, लेकिन मंच पर दो लाइन भूल गया। ऐसे समय पर माता-पिता की प्रतिक्रिया बहुत मायने रखती है।
सिर्फ जीतने या अच्छे नंबर लाने पर तारीफ करने से बच्चे को लग सकता है कि उसकी अहमियत प्रदर्शन पर निर्भर है। उससे कहें, 'तुमने इस बार काफी मेहनत की', 'मुझे अच्छा लगा कि तुमने डर के बावजूद कोशिश की' या 'अगली बार हम इसे और बेहतर कर सकते हैं।'
तारीफ सच्ची और किसी खास प्रयास से जुड़ी होनी चाहिए। इससे बच्चे में मेहनत करने और असफलता के बाद दोबारा कोशिश करने का हौसला बढ़ सकता है।
6. बच्चों को 'ना' कहना और दूसरों की सीमाओं का सम्मान करना सिखाएं
आत्मसम्मान का एक जरूरी हिस्सा अपनी पसंद और असहजता को पहचानना भी है। कई बार बच्चे किसी रिश्तेदार से गले नहीं मिलना चाहते, लेकिन उन्हें जबरदस्ती ऐसा करने को कहा जाता है। इससे उन्हें यह संदेश मिल सकता है कि दूसरों को खुश रखना अपनी सहजता से ज्यादा जरूरी है।
बच्चों को सिखाएं कि वे विनम्रता से मना कर सकते हैं। किसी से हाथ मिलाना, नमस्ते करना या दूरी बनाकर अभिवादन करना भी सम्मान दिखाने के तरीके हैं।
साथ ही उन्हें यह भी समझाएं कि जैसे उनकी अपनी सीमाएं हैं, वैसे ही दूसरों की भी हैं। किसी दोस्त के मना करने पर उसका मजाक उड़ाना या उसे परेशान करना सही नहीं है।
7. बच्चे के सामने अपनी गलती मानें और सॉरी बोलें
माता-पिता अक्सर बच्चों से माफी मांगने की उम्मीद रखते हैं। लेकिन जब उनसे खुद कोई गलती होती है, तो क्या वे बच्चे से सॉरी कहते हैं? मान लीजिए आपने बिना पूरी बात जाने बच्चे को डांट दिया। बाद में पता चला कि उसकी गलती नहीं थी। ऐसे में उससे कहना कि 'मुझे पहले तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी, सॉरी' बहुत मायने रखता है।
इससे बच्चे को समझ आता है कि सम्मान उम्र या अधिकार पर निर्भर नहीं करता। बड़े भी गलत हो सकते हैं और गलती मानने से कोई छोटा नहीं हो जाता।
घर में ऐसा माहौल बनाएं, जहां परिवार के सभी सदस्य एक-दूसरे से सम्मान से बात करें। बच्चे जो देखते हैं, अक्सर वही व्यवहार सीखते हैं।
