जैसे हिंदू धर्म में दीपावली के त्योहार का संदेश है कि हमारे जीवन में रौशनी फैले या उजियारा आए या फिर होली भाईचारा बढ़ाने का त्योहार है; ठीक उसी तरह मुस्लिम धर्म में रूहानी तरक़्क़ी और भाईचारा बढ़ाने के लिए ‘ईद-उल-फितर’ मनाया जाता है।
पूरे एक महीने तक रोजेदारों द्वारा अपने शरीर को पाक (शुद्धि) करने और इबादत से रूहानी तरक्की करने के बाद माह-ए-शब्बाल की पहली तारीख़ को ज़कात और फितरा अदा करने के बाद एक दूसरे से गले मिला जाता है। गले मिलने का अर्थ है, आपसी वैमनस्य और रंजिश को भूलकर एक होना। एक शेर भी है:–
“हिलाल-ए-ईद जो देखा तो ख़याल हुआ।
उन्हें गले लगाए एक साल हुआ।।”
दरअसल, यह त्योहार हमें यह अवसर देता है कि हम अपने अंदर झांकें; जिन्हें किसी वज्ह (हिंदी में वजह भी लिखा जा सकता है।) से दुःख पहुंचाया हो, उनसे गले मिलें और सेवई की मिठास से आपसी तल्ख़ी को कम कर जीवन में मिठास घोलें।
ऐसे, यह त्योहार इस्लामी कैलेंडर के दसवें महीने शव्वाल के पहले दिन मनाया जाता है। इस्लामी कैलेंडर के अन्य सभी महीनों की तरह यह भी नए चांद के दिखने पर शुरू होता है। मान्यता है कि इस दिन हज़रत मोहम्मद ने किसी यतीम को अपने घर लाकर उसे नए कपड़े पहनाए और उसे अपने परिवार का सदस्य (बेटी) बना लिया, जिससे उसके जीवन में खुशहाली आई। ‘ईद-उल-फ़ित्र’ का असली संदेश यही है।
कमलेश कमल हिंदी के चर्चित वैयाकरण एवं भाषा-विज्ञानी हैं। भाषा और साहित्य से संबद्ध विभिन्न संस्थाओं में महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन करते रहे हैं। संप्रति– आईटीबीपी में जन संपर्क अधिकारी हैं. (आलेख में प्रस्तुत विचार इनके निजी हैं)
