Gopaldas Neeraj Death Anniversary: किसी कहानीकार की मशहूरियत का अंदाजा उसकी किताबों की बिक्री से लगाया जा सकता है। किसी शायर की सफलता उसके मुशायरों की भीड़ से मापी जा सकती है। लेकिन गोपालदास नीरज के हिस्से लोगों की जो मोहब्बत आई, उसका पैमाना कुछ और था। उनके दिल के बेहद करीब रहे प्रसिद्ध कवि बालकवि बैरागी कहा करते थे -
जब नीरज जी इस दुनिया से जाएंगे, मैं उनकी शवयात्रा में नहीं जाऊंगा
लोग चौंक जाते। सवाल पूछते कि भला ऐसा क्यों। बैरागी मुस्कुराकर जवाब देते-
घर के बड़े-बुजुर्गों की शवयात्रा में छोटों को नंगे पैर चलना पड़ता है। नीरज जी की शवयात्रा में इतनी चूड़ियां टूटेंगी कि चलना मुश्किल हो जाएगा।
कवि कुमार विश्वास ने कई मुशायरों के मंच से ये किस्सा सुनाया है। वे बताते हैं कि नीरज खुद इस बात पर खूब ठहाके लगाते थे। आपको भी भले इस बात पर हंसी आए लेकिन यह उस कवि की सामाजिक हैसियत का बयान था, जिसने प्रेम को इतनी खूबसूरती से लिखा कि देश की लाखों स्त्रियों ने उसके गीतों में अपने मन की आवाज सुन ली।
यह कहना कहीं से गलत ना होगा कि हिंदी कविता में अगर हरिवंश राय बच्चन ने प्रेम को दर्शन दिया, तो नीरज ने उसे धड़कन दी। नीरज के लिखे में डूबेंगे तो पाएंगे कि प्रेम महज दो लोगों के बीच का रिश्ता नहीं है। वह जीवन का उत्सव है, विरह की पीड़ा है, अधूरी इच्छाओं की कसक है और इंसान बने रहने की सबसे बड़ी वजह भी।
साहित्यकार और आलोचक डॉ. नामवर सिंह भी मानते थे कि नीरज के लिखे हर गीत में प्रेम आधुनिक संवेदनाओं के साथ जिंदा रहती है। उनकी कविताओं में प्रेम व्यक्ति से शुरू होकर समाज और फिर पूरी मानवता तक पहुंच जाता है।
शायद इसलिए उनका लिखा पढ़ते हुए लगता है कि वह अपनी किसी प्रेमिका से नहीं, पूरी दुनिया से बात कर रहे हैं। नीरज प्रेम को आम जिंदगी का हिस्सा बना देने वाले कवि थे। वो प्रेम को तड़प की चादर में नहीं लपेटते थे। वो तो इसे फूलों के रंग से भर देते थे। तभी तो उन्होंने लिखा है-
फूलों के रंग से, दिल की कलम से,
तुझको लिखी रोज पाती..
नीरज ने हमेशा प्रेम में स्त्री को बनाया साझीदार
गोपालदास नीरज उस पहले कवि का नाम भी है जिसने भारतीय स्त्रियों को प्रेम में बराबरी की जगह दी। इसे समझाने के लिए उनकी ये दो पंक्तियां ही काफी हैं-
प्रेम पथ हो न सूना कभी इसलिए,
जिस जगह मैं थकूं, उस जगह तुम चलो..
नीरज से पहले हमेशा हिंदी में लिखी प्रेम की कविताओं में मर्द आगे चलता रहा और स्त्री उसका इंतजार करती रही। वो नीरज ही थे जिन्होंने प्रेम को साझेदारी की भाषा में लिखा। तभी तो वो कहते हैं कि "जहां मैं थकूं, वहां तुम चलो।"
नीरज के लिखे में प्रेम का व्याकरण सबसे अलग रहता था। अधूरा प्रेम भी उनकी कविता में खूबसूरत हो जाता। हर कोई जानता है कि हर प्रेम कहानी मुकम्मल नहीं होती। कुछ दर्द और जुदाई के साथ ठहर जाती हैं। लेकिन नीरज ने उस जुदाई को भी विरह की जगह नई उम्मीद के साथ लिखा।
बस यही अपराध मैं हर बार करता हूं,
आदमी हूं, आदमी से प्यार करता हूं..
1960 और 70 के दशक में नीरज ने हिंदी सिनेमा के लिए कई अमर गीत लिखे। उनकी सबसे बड़ी खूबी यह रही कि बाजार के बीच भी उनकी कविता बची रही। नीरज कहते भी थे कि मैं जानता हूं कि लोकप्रिय होना और सतही होना दो अलग चीजें हैं। उन्होंने लोकप्रियता के लालच में अपनी कलम से कभी समझौता नहीं किया।
नीरज ने विशुद्ध हिंदी के तत्सम और तद्भव शब्दों को ऐसी खनक दी कि पूरा देश झूम उठा। उन्होंने यह साबित किया कि जनमानस के दिल में उतरने के लिए भाषा को सतही या सस्ता बनाने की जरूरत नहीं होती।
नीरज की कालजयी रचना थी 'कारवां गुजर गया'
कवि और आलोचक डॉ. अशोक चक्रधर सार्वजनिक मंचों से ये कहने में गुरेज नहीं करते कि नीरज उन विरले गीतकारों में थे जिन्होंने साहित्य और सिनेमा के बीच की दूरी खत्म कर दी। उनके फिल्मी गीतों में भी कविता और साहित्य की खुशबू जरूर होती। इसका एक छोटा सा नमूना है फिल्म प्रेम पुजारी के लिए लिखा ये गीत-
शोखियों में घोला जाए फूलों का शबाब,
उसमें फिर मिलाई जाए थोड़ी-सी शराब
होगा यूं नशा जो तैयार..वो प्यार है
नीरज को महज प्रेम का कवि कह देना नाइंसाफी होगी। वो तो इंसानी जिंदगी के बहुत बड़े फिलॉस्फर भी थे। तभी तो उन्होंने राज कपूर की 'मेरा नाम जोकर' के लिए जब गीत लिखा तो जीवन के पूरे फलसफे को चंद लाइनों में समेट कर रख दिया-
ऐ भाई! जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी
दायें ही नहीं बायें भी, ऊपर ही नहीं नीचे भी
तू जहां आया है वो तेरा घर नहीं, गांव नहीं
गली नहीं, कूचा नहीं, रस्ता नहीं, बस्ती नहीं
दुनिया है, और प्यारे, दुनिया यह एक सर्कस है
और इस सर्कस में..बड़े को भी, छोटे को भी
खरे को भी, खोटे को भी, मोटे को भी, पतले को भी
नीचे से ऊपर को, ऊपर से नीचे को
बराबर आना-जाना पड़ता है
और रिंग मास्टर के कोड़े पर- कोड़ा जो भूख है
कोड़ा जो पैसा है, कोड़ा जो क़िस्मत है
तरह-तरह नाच कर दिखाना यहाँ पड़ता है
बार-बार रोना और गाना यहां पड़ता है
हीरो से जोकर बन जाना पड़ता है..
यह गीत सर्कस के बहाने इंसान को उसकी जिंदगी की कड़वी हकीकत का आइना दिखाता है। ये बताता है कि इंसान की औकात इस सर्कसनुमा दुनिया में जोकर से ज्यादा कुछ और नहीं है। यहां देखें वो पूरा गीत:
आज गोपाल दास नीरज की पुण्य तिथि है। 19 जुलाई 2018 में नीरज ने इस आभासी दुनिया का सफर पूरा कर देह त्याग दिया था। उनकी अंतिम यात्रा में सचमुच कितनी चूड़ियां टूटीं, इसका कोई हिसाब तो नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उनके जाने पर करोड़ों लोगों ने अपने भीतर उस कवि को खोया, जिसने उन्हें सिखाया था कि प्रेम मनुष्य होने का सबसे सुंदर अभ्यास है।
तभी तो जब तक इस दुनिया में प्रेम करने वाले लोग रहेंगे, जब तक कोई राहगीर थककर अपने साथी का हाथ थामेगा और जब तक कोई दिल किसी की याद में धड़केगा, तब तक नीरज अपने अमर गीतों के जरिए हमारे बीच हमेशा जिंदा रहेंगे।
