आज मेकअप के लिए हमारे पास सैकड़ों प्रोडक्ट हैं। लिपस्टिक के अलग शेड हैं। ब्लश है। आइब्रो पेंसिल है। मॉइस्चराइजर और क्रीम हैं। वैसे खूबसूरत दिखने की इच्छा नई नहीं है। हजारों साल पहले भी लोग चेहरे को चमकाने के लिए प्रकृति से मिली चीजों का इस्तेमाल करते थे। प्राचीन चीन में ब्यूटी रिचुअल्स की एक ऐसी परंपरा थी, जिसमें फूलों, खनिजों, मोम और यहां तक कि जानवरों का चर्बी का भी इस्तेमाल होता था।
फूलों से बनता था लिप कलर
आज लिपस्टिक हमारे मेकअप किट का सबसे आम हिस्सा है, लेकिन चीन में होंठों को रंगने की परंपरा सदियों पुरानी है। प्राचीन चीन में महिलाएं होंठों पर रंग लाने के लिए सैफ्लावर यानी कुसुम के फूल, वर्मिलियन जैसे लाल पिगमेंट, मधुमक्खी के मोम, जानवर की चर्बी और हर्बल एक्सट्रैक्ट्स का इस्तेमाल करती थीं।
होंठों का आकार भी हमेशा एक जैसा पसंद नहीं किया जाता था। अलग-अलग राजवंशों के साथ ब्यूटी ट्रेंड बदलते रहे। तांग काल में छोटे और चेरी जैसे होंठ पसंद किए जाते थे। बाद के दौर में होंठों के दूसरे आकार फैशन में आए। मतलब कि आज जिस तरह हर कुछ साल में मेकअप ट्रेंड बदलता है, कुछ वैसा ही बदलाव उस समय भी देखने को मिलता था।
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ग्रेफाइट और खनिजों से सजती थी आइब्रो
आज आइब्रो को शेप देने के लिए पेंसिल, पाउडर और जेल जैसे प्रोडक्ट इस्तेमाल होते हैं। प्राचीन चीन में इसका तरीका काफी अलग था। महिलाएं आइब्रो को गहरा दिखाने के लिए काले प्राकृतिक खनिज, कालिख और ग्रेफाइट आधारित पदार्थों का इस्तेमाल करती थीं। कई बार आइब्रो के बालों को कुछ हिस्सों से हटाकर नया आकार भी बनाया जाता था।
यहां भी फैशन बदलता रहता था। कभी विलो के पत्ते जैसी आइब्रो पसंद की जाती थीं। कभी पहाड़ों जैसी आकृति। कहीं अर्धचंद्राकार भौंहों का चलन था तो कहीं तितली के पंख जैसी आकृति का।
गालों की लाली के लिए फूल और खनिज
गालों पर गुलाबी या लाल रंग को चेहरे की ताजगी और जवानी से जोड़ा जाता था। इसके लिए सैफ्लावर की पंखुड़ियों, गुलाब के अर्क और लाल खनिजों से रंग तैयार किए जाते थे। कुछ कॉस्मेटिक्स में सिनाबार का भी इस्तेमाल होता था। सिनाबार वास्तव में मरकरी सल्फाइड है और जहरीला पदार्थ माना जाता है।
एनिमल फैट था पुराने कॉस्मेटिक्स का बेस
प्राचीन चीनी कॉस्मेटिक्स की सबसे दिलचस्प चीजों में से एक थी रिफाइंड एनिमल फैट। इसे सीधे मेकअप के बेस के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था। इसमें फूलों और खनिजों से मिले रंग मिलाए जाते थे। इससे क्रीम, ब्लश और लिप कलर जैसे प्रोडक्ट तैयार किए जाते थे और वे त्वचा पर बेहतर तरीके से टिकते थे।
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सोशल स्टेटस था मेकअप
प्राचीन चीन में मेकअप को केवल चेहरे की सजावट मानना सही नहीं होगा। यह सामाजिक पहचान और स्टेटस से भी जुड़ा था। खासकर शाही दरबार और उच्च वर्ग की महिलाओं के लिए मेकअप का महत्व ज्यादा था। अलग-अलग तरह के कॉस्मेटिक्स और सजने के तरीके सामाजिक स्थिति को दिखाने का माध्यम भी बन सकते थे। तांग काल में चीन का चांगआन एक बड़ा और अंतरराष्ट्रीय शहर था। मध्य एशिया और दूसरे क्षेत्रों से आने वाले सामानों ने वहां की ब्यूटी संस्कृति को भी प्रभावित किया।
ये बातें इस बात की तस्दीक करती हैं कि इंसान हजारों साल से अपने चेहरे को सिर्फ सुंदर बनाने की कोशिश नहीं कर रहा था। वह अपनी पहचान, सामाजिक स्थिति और अपने समय के फैशन को भी चेहरे पर उतार रहा था। आज हमारी मेकअप किट में प्रोडक्ट के नाम बदल गए हैं। तकनीक बदल गई है। लेकिन खूबसूरत दिखने और खुद को अलग पहचान देने की वह इच्छा अब भी उतनी ही पुरानी है।
