Deepika Padukone Second Baby Girl: दीपिका पादुकोण और रणवीर सिंह के घर दूसरी बेटी ने जन्म लिया। बड़ी बेटी दुआ को छोटी बहन मिली और परिवार की खुशियां दोगुनी हो गईं। सोशल मीडिया पर बधाइयों का सिलसिला शुरू हुआ। बहुत से लोगों ने दोनों बच्चियों को प्यार और आशीर्वाद दिया। राधाष्टमी पर हुई बेटी को लेकर कपल के फैन्स और करीबियों में उत्साह दिखा। लेकिन कुछ लोगों को इस प्यारी फैमिली में कमी नजर आने लगी।
वजह वही पुरानी सोच कि परिवार में एक लड़के की कमी है। यही वजह है कि किसी ने उनको अभी से ही तीसरा बच्चा करने की सलाह दे डाली तो वहीं एक शख्स को तो नवजात बच्ची के दहेज की चिंता सताने लगी है। ये टिप्पणियां बताती हैं कि समाज में सोच बदल जरूर रही है, मगर बेटियों को बराबर मानने की मंजिल अब भी दूर है।
दीपिका की दूसरी बेटी पर कैसे-कैसे कमेंट आए
दीपिका और रणवीर ने सोशल मीडिया पर अपनी दूसरी बेटी के जन्म की खबर बेहद सादगी से साझा की। अधिकतर लोगों ने कपल को बधाई दी। दुआ के बड़ी बहन बनने पर खुशी जताई और दोनों बच्चियों पर प्यार बरसाया।
लेकिन हर खुशी में खोट तलाशने वाली मानसिकता इस पोस्ट पर हुए कमेंट्स में भी नजर आई। किसी ने लिखा कि एक लड़का हो जाता तो अच्छा रहता। किसी ने सलाह दी कि अब एक और बच्चा करना चाहिए, ताकि बेटा हो सके। एक कमेंट में रणवीर की मर्दाना छवि को बेटे के जन्म से जोड़ दिया गया। मानो बेटा पैदा करना ही किसी पुरुष की ताकत का अंतिम प्रमाण हो।
हद तब हुई, जब एक व्यक्ति ने दो बेटियों के दहेज की चिंता जता दी। एक बच्ची ने अभी दुनिया में कदम ही रखा था और लोगों ने उसकी शादी का खर्च जोड़ना शुरू कर दिया।
खबर एक नन्ही और प्यारी सी जान के दुनिया में आने की थी। मगर चंद लोगों ने उसे वंश, मर्दानगी, दहेज और बेटे की चाह का हिसाब-किताब बना दिया। लोगों की इसी मानसिकता पर कंटेंट क्रिएटर्स ने मीम्स भी बना दिए।
बेटी के स्वागत में ‘लेकिन’ क्यों
बेटी को लेकर हमारे समाज में थोड़ी सोच बदली है लेकिन अभी भी संतान के दो जेंडर्स में वह पीछे ही है। अंदर की चाहत अभी भी लड़के की है। यही वजह है कि लोगों ने बेटी के जन्म पर निराशा जताने का तरीका थोड़ा चमकदार बना लिया है। अब लोग शायद सीधे नहीं कहते कि बेटी क्यों हुई। वे पहले प्यार से बोलते हैं कि लक्ष्मी आई है। और फिर अगले ही वाक्य में जोड़ देते है कि लेकिन एक बेटा भी हो जाता तो परिवार पूरा हो जाता।
यही ‘लेकिन’ पूरी सोच का सच खोल देता है।
“कोई बात नहीं, अगली बार बेटा हो जाएगा।”
“दो बेटियां हो गईं, अब एक लड़का प्लान कर लो।”
“घर का नाम आगे बढ़ाने वाला भी तो कोई चाहिए।”
ये हल्की-फुल्की बातचीत नहीं है। अगर ये सलाह कोई दे रहा है तो वह अभी भी बेटी बोझ है वाली मानसिकता में ही जी रहा है। ये बेटी को जन्म लेते ही कमतर ठहराने वाली सोच है। बच्ची का स्वागत करते हुए उसे जता दिया जाता है कि वह खुशियां तो लाई है, लेकिन परिवार की वह कथित कमी नहीं भर पाई जिसे समाज ने अपने मन से बना रखा है।

बेटियों के बाद भी बेटे की चाहत के कमेंट्स क्यों !
आखिर दो बेटियों वाला परिवार अधूरा कैसे हुआ
अगर किसी परिवार में दो बेटियां हैं तो लोग बड़ी आसानी से पूछ लेते हैं कि बेटा नहीं है क्या? इस छोटे से सवाल में ऐसी हैरानी होती है, जैसे परिवार का कोई जरूरी सदस्य गायब हो। मगर दो बेटों के माता-पिता से कितनी बार बेटी के बारे में पूछकर उनका परिवार अधूरा जताया जाता है!
बेशक शायद ही कभी ऐसा होता हो।
यहीं से भेदभाव दिखाई देने लगता है। बेटी को परिवार की खुशी तो माना जाता है, लेकिन परिवार को ‘पूरा’ करने की जिम्मेदारी बेटे को दे दी जाती है। बेटी को प्यार मिलता है, लेकिन उसके अस्तित्व के साथ एक अदृश्य शर्त जोड़ दी जाती है कि उसके बाद एक बेटा भी होना चाहिए।
हालांकि यह सोच अब हर व्यक्ति की नहीं है। नई पीढ़ी के बहुत से लोग परिवार को बच्चों की संख्या या लिंग से परिभाषित नहीं करते। फिर भी उनकी पोस्ट या लाइफ पर आने वाले ऐसे कमेंट बताते हैं कि पुरानी मानसिकता अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
‘बेटे से वंश चलता है’ वाला तर्क अब घिस चुका है
बेटे की चाह को सही साबित करने के लिए सबसे पुराना तर्क सामने आता है कि वंश कौन चलाएगा और परिवार का नाम कौन आगे बढ़ाएगा? बुढ़ापे में मां-बाप की सेवा कौन करेगा।
लेकिन यह समझने के लिए भी तो समझ चाहिए कि परिवार का नाम केवल सरनेम से नहीं चलता। वह बच्चों के काम, संस्कार और पहचान से आगे बढ़ता है। इसका सशक्त उदाहरण खुद दीपिका पादुकोण हैं। उन्होंने अपने पिता प्रकाश पादुकोण की विरासत को न सिर्फ आगे बढ़ाया, बल्कि उसे नई और ग्लोबल पहचान भी दी। आज वह खुद अपने परिवार की सबसे चमकदार पहचानों में शामिल हैं।
फिर यह कैसे तय हो गया कि पिता का नाम केवल बेटा ही रोशन कर सकता है
बेटी शादी के बाद दूसरे घर चली जाती है, इसलिए वंश आगे नहीं बढ़ाती- यह प्रकृति का बनाया नियम नहीं है। यह समाज की बनाई व्यवस्था है। और जिन नियमों को इंसानों ने बनाया है, उन्हें इंसान बदल भी सकते हैं।

इससे दकियानूसी सोच और कुछ नहीं हो सकती
मर्दानगी का बच्चे के लिंग से क्या लेना-देना
हद तो इस बात की है रणवीर सिंह को लेकर भी लोग कमेंट कर रहे हैं कि ‘असली मर्द बेटा पैदा करता है’। यह कमेंट केवल भद्दा नहीं, बेहद खोखला भी है। किसी पुरुष की मर्दानगी आखिर उसके बच्चे के लिंग से कैसे तय हो सकती है।
वैज्ञानिक रूप से बच्चे का जैविक लिंग पिता से मिलने वाले X या Y क्रोमोसोम पर निर्भर करता है। मां का अंडाणु हमेशा X क्रोमोसोम देता है। इसके बावजूद बेटी के जन्म पर सबसे पहले मां को दोषी ठहराया जाता है। ताने उसे सुनने पड़ते हैं और अगली बार बेटा पैदा करने का दबाव भी उसी के शरीर पर डाला जाता है।
हालांकि विज्ञान जान लेने के बाद पिता को दोष देना भी उतना ही गलत होगा। बच्चा कोई ऐसा नतीजा नहीं है, जिसके लिए माता-पिता में से किसी को कटघरे में खड़ा किया जाए। क्योंकि असली समस्या संतान के लिंग में नहीं, उसे छोटा या बड़ा मानने वाली सोच में है।
बच्ची पैदा हुई नहीं कि दहेज का हिसाब शुरू
इन टिप्पणियों दो बेटियों के दहेज की चिंता जताने वाला कमेंट भी शर्मनाक है। बच्ची ने अभी दुनिया को ठीक से देखा भी नहीं और लोगों ने उसकी शादी का खर्च जोड़ना शुरू कर दिया। दहेज लेना और देना कानूनन अपराध है। फिर भी बेटी के जन्म को दहेज से जोड़ने वाले लोग अपराध को समस्या मानने के बजाय बेटी को आर्थिक बोझ मान लेते हैं।

परेशानी बेटी नहीं दहेज लोभी और उनकी सोच है
अगर दहेज परेशानी है तो असली परेशानी बेटी नहीं बल्कि दहेज मांगने वाले हैं। परेशानी वह लालची सोच है, जो शादी को रिश्ते के बजाय सौदा बना देती है। मगर समाज के लिए बेटी को बोझ कहना आसान है। दहेज मांगने वालों के खिलाफ खड़ा होना मुश्किल। शायद इसीलिए दोष व्यवस्था को नहीं, बच्ची के जन्म को दे दिया जाता है।
सकारात्मक सोच वाले लोगों की भी कमी नहीं
इन आपत्तिजनक टिप्पणियों के बीच कई प्रतिक्रियाएं ऐसी भी थीं, जिन्हें पढ़कर लगा कि समाज की पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है। बहुत से लोगों ने दूसरी बेटी के जन्म को बेहद खूबसूरत खबर बताया। उन्होंने कहा कि परिवार में बच्चे का आना खुशी की बात है और उसके लिंग को लेकर तुलना करना गलत है।
एक प्रतिक्रिया में दीपिका और रणवीर के लिए सम्मान जताते हुए लिखा गया कि जिस समाज में अब भी बेटे को लेकर इतना मोह है, वहां इस प्रभावशाली जोड़े ने अपनी दूसरी बेटी का भी उसी प्यार और खुशी के साथ स्वागत किया। यह इस बात की खूबसूरत याद दिलाता है कि बेटी हो या बेटा, हर बच्चा अपने आप में आशीर्वाद है।
इस भावना में उम्मीद छिपी है। आज ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो दो बेटियों वाले परिवार को अधूरा नहीं, खुशहाल परिवार मानते हैं। जो पिता की पहचान बेटे से नहीं, उसकी परवरिश से तय करते हैं। जो बेटी को बोझ नहीं, परिवार का बराबर सदस्य समझते हैं।
लेकिन इस बात को भी ध्यान में रखा जाए कि कोई प्रभावशाली या संपन्न जोड़ा अपने बच्चे का लिंग नहीं चुन सकता है। भारत में गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान लिंग चयन और भ्रूण का लिंग पता करना कानूनन अपराध है। किसी परिवार के बारे में बिना आधार ऐसा अनुमान लगाना भी उचित नहीं है। यहां महत्वपूर्ण बात केवल इतनी है कि दीपिका और रणवीर ने अपनी बेटी का खुले दिल से स्वागत किया-और यही किसी भी माता-पिता से उम्मीद की जानी चाहिए।
सोच बदल रही है, लेकिन बदलाव अभी अधूरा है
दीपिका और रणवीर की पोस्ट पर आए कमेंट समाज की दो तस्वीरें दिखाते हैं। एक तरफ वे लोग हैं, जिन्हें दूसरी बेटी के जन्म में बेटे की कमी, वंश की चिंता और दहेज का खर्च दिखाई देता है। दूसरी ओर वे लोग भी हैं, जिन्होंने किसी तुलना के बिना बच्ची का स्वागत किया और परिवार की खुशी में शामिल हुए।
यही संतुलित सच है। समाज पूरी तरह नहीं बदला, लेकिन बदलाव रुका भी नहीं है। सकारात्मक सोच रखने वाले लोग कम नहीं हैं। परेशानी यह है कि कुछ पिछड़ी आवाजें अब भी इतनी तेज हैं कि खुशी के मौके पर भी कड़वाहट घोल देती हैं।
इन्हें केवल सोशल मीडिया के बेहूदा कमेंट कहकर टाला नहीं जा सकता। ऐसे वाक्य जब किसी सामान्य परिवार में बोले जाते हैं तो वे एक मां के भीतर अपराधबोध भरते हैं। पिता पर बेटे के लिए दबाव बनाते हैं। बेटी को यह महसूस कराते हैं कि उसके आने की खुशी पूरी नहीं थी। यही सोच आगे चलकर बेटियों की उपेक्षा, उनकी पढ़ाई में भेदभाव और महिलाओं पर बार-बार गर्भधारण के दबाव की जमीन बनाती है।
बेटी के जन्म पर भी खुलकर बधाई हो कहा जाना चाहिए और यह बधाई बिना किसी ‘लेकिन’ और अफसोस के दी जानी चाहिए। परिवार बेटा होने से नहीं, बच्चों को मिले प्यार, सम्मान और बराबरी से पूरा होता है।
