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मिटाने चले थे मलेरिया, पैराशूट से गिरानी पड़ी बिल्लियां; जानिए किस्सा सबसे अजीब सरकारी मिशन का

इस तरह की दावे भी किये जाते रहे हैं कि उस ऑपरेशन के दौरान करीब 14 हजार बिल्लियां उतारी गई थीं। हालांकि इस संख्या की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है।

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किस्सा ऑपरेश कैट ड्रॉप का (AI Generated Image)
Authored by: Suneet Singh
Updated Aug 7, 2026, 12:04 IST
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सोच कर देखिए कि एयरफोर्स का एक विमान घने जंगलों के ऊपर उड़ रहा है। नीचे सैकड़ों लोगों की नजरें आसमान पर टिकी हैं। विमान से पैराशूट नीचे उतरते हैं। लेकिन इन पैराशूट्स में सैनिक नहीं हैं। हथियार नहीं हैं। इन पैराशूट्स में टोकरियां हैं और इन टोकरियों में है बिल्लियां। 17 मार्च 1960 को ब्रिटिश शासन के अधीन आने वाले बोर्नियो में सरावाक के सुदूर बारियो क्षेत्र में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। रॉयल एयर फोर्स ने सरकारी मिशन के तहत 23 बिल्लियों को पैराशूट से उस गांव में उतारा था। इस मिशन का नाम था ऑपरेशन कैट ड्रॉप

पैराशूट से बिल्लियों को किसी गांव में उतारने की बात आपको अजीब लग रही होगी। शायद मजाक भी लगे, लेकिन है यह असली घटना। जी हां, ये बात सोलह आने सच है कि मलेरिया से निपटने के मिशन में ब्रिटिश सरकार को पैराशूट से बिल्लियां उतारनी पड़ी थीं। वैसे इंटरनेट पर इस तरह की बातें भी हैं कि उस ऑपरेशन के दौरान करीब 14 हजार बिल्लियां उतारी गई थीं। हालांकि इस संख्या की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है। जो जानकारी सबसे पुख्ता है उसके हिसाब से 23 बिल्लियों को ही बारियो में उतारा गया था।

कहां से शुरु हुआ था मामला

1950 का दशक था। दुनिया के कई हिस्सों में मलेरिया का कहर था। मच्छर इस बीमारी की जड़ थे। उस दौर में DDT को मलेरिया के खिलाफ एक बेहद असरदार हथियार माना जाता था। डीडीटी (DDT) मतलब डाइक्लोरो डाइफेनिल ट्राइक्लोरोएथेन (Dichloro-diphenyl-trichloroethane)। डीडीटी को सबसे असरदार कीटनाशक माना जाता रहा है।

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1955 में विश्व स्वास्थ्य संगठन(WHO) ने वैश्विक स्तर पर मलेरिया से निपटने का अभियान चलाया। डीडीटी का छिड़काव इस अभियान का अहम हिस्सा था। बोर्नियो के सरावाक में भी छिड़काव किया गया। सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक 1952 से 1955 के बीच DDT और BHC जैसे कीटनाशकों का बेतहाशा इस्तेमाल हुआ। यह अभियान सफल साबित हुआ। 1953 से 1955 के बीच सरावाक में मलेरिया वाले मच्छरों का 35.6 फीसदी से घटकर 1.6 फीसदी रह गए। सबको भरोसा हो गया कि आने वाले दिनों में मलेरिया पूरी तरह से दम तोड़ देगा। यहां तक सब ठीक था। हालांकि प्रकृति ने कुछ और तय कर रखा था।

मलेरिया के मच्छरों से निपटने में काफी कारगर साबित हुआ (AI Image)

मलेरिया के मच्छरों से निपटने में काफी कारगर साबित हुआ (AI Image)

मलेरिया मिटाने के मिशन में महज मच्छर नहीं मरे

विश्व स्वास्थ्य संगठन ये भूल गया था कि DDT जैसे कीटनाशक का असर बस मच्छरों पर नहीं पड़ेगा। सरावाक के जंगल में बसे गांवों में ना जाने कितने ही परजीवी इस डीडीटी के छिड़काव से मर गए। ये जहर वहां के गिरगिट जैसे दूसरे परजीवों के अंदर भी पहुंचा। जहर से भरे इन परजीवों को जब बिल्लियों ने खाया तो बिल्लियां मरने लगीं। देखते-देखते बिल्लियां उस पूरे इलाके से खत्म हो गईं। प्रकृति का पूरा इकोसिस्टम बिगड़ गया।

अमेरिकी रिसर्चर पैट्रिक टी. ओ'शॉघनेसी ने 2008 में American Journal of Public Health में बिल्लियों के मरने की इस घटना की दूसरी तरह से समीक्षा की। उनके मुताबिक जब डीडीटी का छिड़काव हुआ तो जहर बिल्लियों के फर पर भी बरसा। बिल्लियां अपने फर पर लगे डीडीटी को चाटकर बीमार पड़ने लगीं। देखते देखते ये बीमारी वहां की सारी बिल्लियों में फैल गई और बिल्लियां मरने लगीं।

फिर आई चूहों की बारी

बिल्लियों के मरने से भी वहां के लोगों पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ा। वो तो इसी बात से खुश थखे कि जानलेवा मलेरिया उनसे दूर भाग रहा है। लेकिन असली आफत आनी अभी बाकी थी। हुआ ये कि बिल्लियों के मरने के कारण पूरे क्षेत्र में चूहों की संख्या बढ़ने लगी। चूहों ने लोगों का जीना हराम कर दिया। फसलें खराब होने लगीं। गंदगी फैलने लगी।

स्वास्थ्य संगठनों को चिंता सताने लगी कि इतने सारे चूहों के चलते प्लेग जैसी महामारी ना फैलने लगे। तय किया गया कि किसी भी हाल में इन चूहों से निपटना होगा। WHO ने फैसला किया कि सरावाक में खराब हो चुके इकोसिस्टम को सुधारने के लिए बिल्लियों की संख्या बढ़ानी होगी। लेकिन संख्या तब तो बढ़े जब वहां कुछ बिल्लियां बची हों।

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यहां एंट्री हुई ब्रिटिश सरकार की। ब्रिटिश शासन और WHO ने मिलकर तय किया कि किसी भी तरह से उस पूरे इलाके में बिल्लियां पहुंचानी होगी। 9 मार्च 1960 को अखबारों में एक अजीब सी अपील छपी- Wanted: 30 Flying Cats to Rout Rats, यानी चूहों को भगाने के लिए 30 ऐसी बिल्लियां चाहिए थीं जिन्हें उड़ाकर दूरदराज इलाके में पहुंचाया जा सके। अखबार में छपी इस अपील के बावजूद 30 की जगह 23 बिल्लियां ही मिल सकीं। थोड़ी कम ही सही, लेकिन बिल्लियों का जुगाड़ तो हो गया।

बिल्लियों के लिए करनी पड़ी अपील (यह प्रतीकात्मक तस्वीर AI से बनाई गई है)

बिल्लियों के लिए करनी पड़ी अपील (यह प्रतीकात्मक तस्वीर AI से बनाई गई है)

अब अगली चुनौती थी कि उन बिल्लियों को सरावाक के बारियो तक पहुंचाया कैसे जाए? दरअसल बारियो सरावाक के केलाबिट हाइलैंड्स का दूरदराज वाला इलाका था। वहां सड़क से पहुंचना मुश्किल था। लगभग 4,500 फीट की ऊंचाई पर बसे इस इलाके में आवागमन बहुत मुश्किल था। अधिकारियों ने तय किया कि बिल्लियों को हवाई जहाज से उस क्षेत्र में उतारा जाएगा। ब्रिटिश एयरफोर्स को ये जिम्मेदारी दी गई। ब्रिटिश सैनिकों ने इस मिशन को नाम दिया ऑपरेशन कैट ड्रॉप।

पैराशूट से उतरी बिल्लियां

17 मार्च 1960 को रॉयल एयर फोर्स के एक ब्लैकबर्न बेवर्ली ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट ने बारियो के लिए उड़ान भरी। इस विमान में अलग-अलग टोकरियों में बिल्लियों को रखा गया। टोकरियों को पैराशूट से अटैच किया गया। बिल्लियों को नीचे उतारने से पहले ब्रिटिश सैनिकों ने पहले ड्रॉप जोन के ऊपर कई टेस्ट रन किए। इसके बाद करीब 400 फीट की ऊंचाई से बिल्लियों को नीचे भेजा गया। सोचिए कि वो क्या नजारा होगा जह इतनी ऊंचाई से बिल्लियां पैराशूट के जरिए नीचे उतरी होंगी। इस तरह से पूरा ऑपरेशन कैट ड्रॉप पूरा हुआ।

यह प्रतीकात्मक तस्वीर है और AI से बनाई गई है

यह प्रतीकात्मक तस्वीर है और AI से बनाई गई है

इस ऑपरेशन की खबरें अगले दिन के अखबारों में छपीं। सरकार ने ऑपरेशन से जुड़े अधिकारियों की पीठ थपथपाई लेकिन एक बड़ी आबादी को ये सब बहुत अजीब लगा। उन्होंने WHO के इस पूरे मिशन पर सवाल उठाया कि क्या डीडीटी के छिड़काव से पहले इस तरह के खतरे का अंदाजा नहीं था? आखिर ये नौबत आई ही क्यों?

इस पूरे मामले को अमेरिका के मशहूर जीवविज्ञानी रेचल कार्सन ने किताब Silent Spring के जरिये लोगों तक पहुंचाया। कार्सन ने कीटनाशकों के परजीवों पर पड़ने वाले खतरनाक प्रभावों को कटघरे में खड़ा किया। इस किताब ने दुनिया भर में पर्यावरण संबंधी बहस को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई।

मलेरिया से मरते लोगों को बचाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन ने तो सही सोच के साथ डीडीटी का सहारा लिया था। हालांकि वह भांप नहीं पाया कि इसका साइड इफेक्ट क्या होगा। इस पूरे प्रकरण ने दुनिया को सिखाया कि प्रकृति में किसी एक समस्या का समाधान कभी-कभी दूसरी बड़ी समस्या पैदा कर सकता है। शायद यही वजह है कि छह दशक से ज्यादा समय बाद भी ऑपरेशन कैट ड्रॉप बहुत ले लोगों के जेहन में आज भी ताजा है।

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