भारत में आम का सीजन लगभग खत्म हो चुका है। मंडियों से दशहरी, लंगड़ा, चौसा, सफेदा जैसे आम धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। मार्केट में जो आम मिल भी रहे हैं उनका स्वाद उस लायक नहीं है जिसके लिए आम पसंद किये जाते हैं। जहां मई जून के महीने में आम देखते ही मुंह में पानी आ जाता था, वहीं अब लोग उसी से नजरें फेरने लगे हैं। आम की हालत देख व्यापारी के मुंह पर ही उसी बुराई कर दे रहे हैं। वैसे क्या आप जानते हैं कि एक वक्त ऐसा भी था जब आम की बुराई करने पर फांसी दे दी जाती थी?
जरा सोचिए, आम को कांच के बक्से में रखकर उसकी पूजा हो रही हो। लोग उसके सामने सिर झुका रहे हों। जुलूस निकल रहे हों। उसे देखने के लिए हजारों लोग कतार में खड़े हों। उसके सड़ जाने पर उसका रस उबालकर 'पवित्र जल' की तरह पिया जा रहा हो। और तो और, जिसने उस आम का मजाक उड़ाया, उसे मौत की सजा दे दी गई हो।
जी हां..यह कोई कहानी नहीं है। यह घटना 1968 के चीन की है, जिसकी शुरुआत हुई थी पाकिस्तान से आए 40 टोकरे आमों से।
जब पाकिस्तान से चीन पहुंचे आम
साल था 1968। चीन में सांस्कृतिक क्रांति अपने सबसे उग्र दौर में थी। विश्वविद्यालयों में हिंसा, वैचारिक संघर्ष और सत्ता की अंदरूनी खींचतान चल रही थी। इसी दौरान पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री मियां अरशद हुसैन बीजिंग पहुंचे। उन्होंने चीन के सर्वोच्च नेता माओ जेदांग को 40 टोकरे आम भेंट किए।
आज सुनने में भले यह आम बात लगी रही हो, लेकिन उस समय यह असाधारण था। किसी राष्ट्राध्यक्ष या शीर्ष नेता को विदेश यात्रा के दौरान आम भेंट करने की घटना अपने आप में पहली थी। यहीं से मैंगो डिप्लोमेसी की शुरुआत मानी जाती है।
खैर, पाकिस्तान से आम तो चीन पहुंचे लेकिन विडंबना यह थी कि माओ खुद आम पसंद नहीं करते थे। उन्होंने आम अपने पास रखने के बजाय उन मजदूरों में बंटवा दिए जिन्हें सरकार ने विश्वविद्यालयों में उग्र छात्र आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए भेजा था। यहीं से आम के इतिहास ने मोड़ लिया जिससे हर कोई दंग रह गया।
फोटो सोर्स: Museum Rietberg Zurich, courtesy of Alfreda Murck
इतिहासकार एल्फ्रेडा मर्क ने अपनी किताब Mao's Golden Mangoes and the Cultural Revolution में लिखा है कि उस समय चीन के अधिकांश उत्तरी इलाकों के लोगों ने जीवन में कभी आम देखा ही नहीं था। जब सुनहरे रंग का यह विदेशी फल मजदूरों तक पहुंचा तो वे उसे घंटों निहारते रहे। उन्होंने उसे सूंघा, हाथों से सहलाया और रात भर उसके पास बैठे रहे। उन्हें लगा कि यह कोई साधारण फल नहीं, स्वयं माओ का आशीर्वाद है।
माओ के पीआर ने बना दिया 'देवता'
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और माओ के प्रचार विभाग ने मजदूरों की भावनाएं देखीं तो उन्हें इसमें एक नया राजनीतिक अवसर दिखाई दिया। बस फिर क्या था। आम को एक फल से ज्यादा, देवता बना दिया गया। उसे राजधानी की फैक्ट्रियों में भेजा जाने लगा। जहां-जहां आम पहुंचता, वहां समारोह होते। बैंड बजते, जुलूस निकलते और लोग फूल चढ़ाते।
कई जगह कर्मचारियों को बाकायदा सिखाया जाता कि आम को कैसे पकड़ना है, उसके सामने कैसे खड़ा होना है और उसके प्रति सम्मान कैसे जताना है।
फोटो सोर्स: Museum Rietberg Zurich, courtesy of Alfreda Murck
मोम में कैद हो गया आम
उसी समय एक कपड़ा फैक्ट्री में आम को मोम की परत चढ़ाकर कांच के भीतर रखा गया। हजारों मजदूर कतार बनाकर उसे देखने पहुंचे। ठीक वैसे ही जैसे किसी मंदिर में दर्शन हो रहे हों। बीजिंग में लोगों के बीच बहस छिड़ गई कि आम खाया जाए या हमेशा के लिए बचाकर रखा जाए।
आखिर फैसला हुआ कि उसे फॉर्मेल्डिहाइड में संरक्षित किया जाएगा। फिर उसकी मोम की प्रतियां बनाकर हर मजदूर को दी जाएंगी। हुआ भी ऐसा ही। ये मोम के आम बाद में घरों और दफ्तरों में श्रद्धा से सजाए जाने लगे।
सड़ने लगा तो 'प्रसाद' बन गया आम
कुछ समय बाद एक असली आम खराब होने लगा। उसे फेंकने का सवाल ही नहीं था। मजदूरों ने उसका गूदा पानी में उबाला। फिर उस पानी को चम्मच-चम्मच करके 'पवित्र पेय' की तरह पिया। उनका विश्वास था कि इसमें माओ का आशीर्वाद है। अल्फ्रेडा मर्क लिखती हैं कि जब माओ को यह किस्सा बताया गया तो वे हंस पड़े।
मंदिर टूट रहे थे... लेकिन आम की वेदियां सज रही थीं
यह सब इसलिए और विचित्र लगता है क्योंकि यही वह समय था जब सांस्कृतिक क्रांति के दौरान चीन में मंदिर तोड़े जा रहे थे। मूर्तियां नष्ट की जा रही थीं। धार्मिक प्रतीकों को खत्म किया जा रहा था। लेकिन उसी दौर में आम के लिए वेदियां सज रही थीं। लोग उसके सामने सिर झुका रहे थे। कुछ जगह उसे फूल चढ़ाए जा रहे थे।
फोटो सोर्स: Reddit
आम बन गया पॉलिटिकल प्रोपेगेंडा
देखते देखते चीन में आम सिर्फ एक फल नहीं रहा। वह राजनीतिक ब्रांड बन गया। आम की तस्वीर वाले पोस्टर छपने लगे, चादरें बनीं, वॉशबेसिन बने, आम की खुशबू वाले साबुन बनने लगे। यहां तक कि आम के फ्लेवर वाली सिगरेट भी बिकने लगी।
1968 की राष्ट्रीय दिवस परेड में आम झांकियों में शामिल किए गए। कम्युनिस्ट पार्टी की टीमें ट्रकों में असली और नकली आम लेकर पूरे चीन में घूमती थीं। लोग दूर-दूर से सिर्फ यह देखने आते थे कि आखिर यह चमत्कारी फल दिखता कैसा है।
मर्क की किताब की मानें तो चीन के दूरदराज गुइझोउ प्रांत में हजारों किसान सिर्फ एक आम की तस्वीर या उसकी प्रतिकृति देखने के लिए इकट्ठा हो गए। यह उस दौर के व्यक्तित्व-पूजा का सबसे असाधारण उदाहरण माना जाता है।
चीन में राजनीति विज्ञान छात्र आज भी इस पर शोध कर रहे हैं कि सत्ता किस तरह से किसी भी सामान्य चीज को सशक्त भावनात्मक और राजनीतिक प्रतीक में बदल सकती है।
जब आम की बुराई पर मिली मौत
पूरे चून में आम का हल्ला था। सिचुआन में जब आम पहुंचा तो वहां के एक डॉक्टर ने मजाक में कह दिया कि आम में खास क्या है..यह तो शकरकंद जैसा ही दिखता है। बस इतनी-सी बात काफी थी। उन पर माओ का अपमान करने का आरोप लगा। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। पूरे शहर में ट्रक पर घुमाया गया और बाद में फांसी पर लटका दिया गया।
फोटो सोर्स: AI Generated Image
..और धीरे-धीरे उतरने लगा खुमार
हर राजनीतिक प्रतीक की एक उम्र होती है। करीब डेढ़ साल बाद आम का जादू उतरने लगा। जिन मोम के आमों की पूजा होती थी, वही बाद में मोमबत्तियों की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे। श्रद्धा धीरे-धीरे सामान्य सामान में बदल गई।
1976 में माओ जेदांग गंभीर रूप से बीमार पड़े। उनकी हालत देखते हुए कम्युनिस्ट पार्टी के उत्तराधिकार की लड़ाई तेज हो गई। माओ की पत्नी जियांग किंग ने एक बार फिर आम को राजनीतिक प्रतीक बनाने की कोशिश की। फिर समारोह हुए। भाषण हुए। 'सॉन्ग ऑफ द मैंगो' नाम से फिल्म भी बनाई गई। लेकिन इस बार जनता पर उसका असर नहीं हुआ।
माओ की मृत्यु के बाद जियांग किंग गिरफ्तार कर ली गईं। विडंबना देखिए। जिस तरह कभी आम को मोम और कांच में के बक्सों में सुरक्षित रखा गया था, लगभग उसी तरह माओ के पार्थिव शरीर को भी संरक्षित कर बीजिंग के त्यानआनमेन चौक पर रखा गया, ताकि लोग सार्वजनिक दर्शन के लिए रखा गया।
भारत में आम आज भी फलों का राजा कहलाता है। शायद दुनिया के इतिहास में यही आम एकमात्र ऐसा फल है, जिसे कभी भगवान का दर्जा भी मिला। यह सब इसलिए नहीं हुआ कि उसका स्वाद बहुत अच्छा था। इसलिए हुआ कि सत्ता और राजनीति ने उसे एक एक प्रतीक बना दिया था।
अब लौटते हैं उसी बात पर कि इस साल बाजार से आम की लगभग विदाई हो चुकी है। अब अगले साल फिर से बाग के ताजे आम आपकी प्लेट तक पहुंचेंगे। यूं तो बाजार से आम मौसम के हिसाब से आता और जाता है, लेकिन 1968 के चीन का वह 'सुनहरा आम' इतिहास के पन्नों में इस तरह दर्ज है जो मौसम के हिसाब से नहीं बदल सकता।
