महिलाओं और बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के मामले समाज को गहराई से प्रभावित करते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ित और उसके परिवार के प्रति संवेदना के साथ-साथ आरोपी के खिलाफ तुरंत और कठोर कार्रवाई की मांग भी उठती है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक बहस के दौर में पुलिस और न्यायिक व्यवस्था पर दबाव कई बार और बढ़ जाता है। लोगों के मन में सवाल उठते हैं कि आरोपी कब पकड़ा जाएगा?उसे सजा कब मिलेगी? पीड़िता को न्याय कब मिलेगा? और क्या वह व्यवस्था,जिससे न्याय की उम्मीद की जाती है,अपना काम समय पर कर पाएगी?
जमुई और दिल्ली के मामलों ने खड़ा किया सवाल
22 सितंबर 2026 को बिहार के जमुई और दिल्ली में सामने आए दो मामले इसी सवाल को फिर चर्चा में ले आए हैं। जमुई में दो नाबालिगों के साथ कथित बदसलूकी और यौन उत्पीड़न के मामले में मुख्य आरोपी नंदन यादव पुलिस मुठभेड़ में पैर में गोली लगने से घायल हुआ और गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस के मुताबिक, उसे पकड़ने की कोशिश के दौरान उसने भागने की कोशिश की।
वहीं, दिल्ली के कालकाजी मंदिर के पास एक लड़की से कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आरोपी आसिफ पुलिस के साथ मुठभेड़ में घायल हुआ। पुलिस का दावा है कि उसने पुलिस टीम पर गोलियां चलाईं और जवाबी फायरिंग में उसके पैर में गोली लगी। दोनों मामलों में पुलिस का दावा है कि मुठभेड़ उस समय हुई जब आरोपियों को पकड़ने की कार्रवाई की जा रही थी।
ऐसे मामलों जब पुलिस मुठभेड़ की खबर आती है और आरोपी गोली लगने के बाद घायल या गिरफ्तार होता है,तो कुछ समय के लिए लोगों का गुस्सा शांत होता दिखाई देता है,लेकिन यहीं से एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि क्या एनकाउंटर जरूरी है और जनता को एनकाउंटर में 'न्याय'क्यों दिखाई देता है?
एनकाउंटर पर कानून क्या कहता है?
पुलिस को अपराध रोकने और आरोपी को गिरफ्तार करने का अधिकार है। लेकिन पुलिस मुठभेड़ में गोली चलने या किसी व्यक्ति की मौत होने पर भी कार्रवाई कानून और जवाबदेही के दायरे में रहती है। सुप्रीम कोर्ट ने PUCL बनाम महाराष्ट्र सरकार मामले में पुलिस एनकाउंटर को लेकर कई अनिवार्य दिशा-निर्देश दिए थे। कोर्ट ने कहा था कि मुठभेड़ में मौत या गंभीर चोट के मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच जरूरी है। सिर्फ पुलिस के यह कह देने से कि गोली आत्मरक्षा में चली, मामला अपने आप सही नहीं मान लिया जाता। ये दिशानिर्देश एनकाउंटर में मौत के साथ-साथ गंभीर चोट के मामलों पर भी लागू किए गए हैं।
इसे लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ शंकर दुबे का भी कहना है, 'संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्था के अंतर्गत पुलिस मुठभेड़ (एनकाउंटर) केवल आत्मरक्षा के अपरिहार्य अधिकार अथवा मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय गंभीर अपराध के अभियुक्त को अभिरक्षा से भागने से रोकने की अंतिम बाध्यकारी परिस्थिति में ही न्यायोचित मानी जा सकती है। यह अनिवार्यता तब उत्पन्न होती है जब अभियुक्त आत्मसमर्पण से इनकार करते हुए पुलिस बल अथवा जनसामान्य पर प्राणघातक हमला कर दे और न्यूनतम बल प्रयोग के समस्त विकल्प समाप्त हो चुके हों।'
न्याय मिलने में लगने वाला समय बनाम एनकाउंटर
जब कोई सभ्य समाज एनकाउंटर को सही ठहराने लगे तो इसके पीछे कहीं न कहीं अदालत के जरिए मिलने वाले न्याय में लगने वाला समय वजह बनता है। दुष्कर्म या छेड़छाड़ के किसी मामले में एक पीड़िता वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाए,गवाह बार-बार बयान दे,सुनवाई टलती रहे और आरोपी लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में बना रहे,तो स्वाभाविक रूप से व्यवस्था पर सवाल उठते हैं। हालांकि त्वरित न्याय और त्वरित कार्रवाई के बीच फर्क समझना जरूरी है। त्वरित कार्रवाई का मतलब हो सकता है कि मामले में तुरंत एफआईआर हो समय रहते पुलिस आरोपियों की गिरफ्तारी करे और मेडिकल और फोरेंसिक जांच की जाए। साथ ही डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखे और मामले में चार्जशीट और जांच समयबद्ध तरीके से पूरी हो। ये तो बात हो गई त्वरित कार्रवाई की अब समझिए त्वरित न्याय का मतलब। इसका यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि आरोपी को दोष सिद्ध होने की पूरी कानूनी प्रक्रिया को ही खत्म कर दिया जाए।
नए आपराधिक कानूनों के दिशा-निर्देशों के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों में पहली सुनवाई से 60 दिनों के भीतर आरोप (Charges) तय किए जाने चाहिए और सुनवाई पूरी होने के 45 दिनों के भीतर फैसला सुनाया जाना अनिवार्य किया गया है। ऐसे में सवाल यह है कि समस्या कानून में ज्यादा है या उसके जमीन पर लागू होने में?
जघन्य अपराधों का असर केवल पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। ऐसी घटनाएं समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर सकती हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में राज्य की निर्णायक प्रशासनिक कार्रवाई से न केवल समाज में तात्कालिक सुरक्षा और विश्वास का संचार होता है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी जाता है कि ऐसे असामाजिक तत्व अब जनसुरक्षा के लिए संकट नहीं रहे।
व्यवस्था पर भरोसा है असली समस्या
अगर किसी महिला या बच्ची के साथ अपराध होता है और पुलिस कुछ घंटों में आरोपी तक पहुंच जाती है, वैज्ञानिक तरीके से सबूत जुटाती है,मजबूत चार्जशीट दाखिल होती है और अदालत में मुकदमा तेजी से चलता है,तो समाज को न्याय के लिए 'एनकाउंटर' की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी।
वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ शंकर दुबे का कहना है, 'जघन्य अपराधों का असर केवल पीड़ित व्यक्ति या उसके परिवार तक सीमित नहीं रहता। ऐसी घटनाएं समाज में भय और असुरक्षा का माहौल पैदा कर सकती हैं। ऐसी विषम परिस्थितियों में राज्य की निर्णायक प्रशासनिक कार्रवाई से न केवल समाज में तात्कालिक सुरक्षा और विश्वास का संचार होता है, बल्कि यह स्पष्ट संदेश भी जाता है कि ऐसे असामाजिक तत्व अब जनसुरक्षा के लिए संकट नहीं रहे।'
'पुलिस की कठोर व त्वरित कार्रवाई कानूनी जवाबदेही के दायरे में रहते हुए हो'
उनका कहना है कि एक सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए दोहरे दायित्व का निर्वहन अनिवार्य है: प्रथम, 'विधि के शासन' और विधिक प्रक्रियाओं की पूर्ण सुरक्षा; तथा द्वितीय, अपराधियों के मन में कानून का ऐसा अक्षम्य भय स्थापित करना जिससे अपराध की पुनरावृत्ति पर प्रभावी रोकथाम लग सके। अपराधों पर संपूर्ण नियंत्रण की यह नीति तभी सफल हो सकती है जब पुलिस की कठोर व त्वरित कार्रवाई कानूनी जवाबदेही के दायरे में रहते हुए अपराधियों के लिए निवारक प्रभाव और आमजन के लिए वास्तविक सुरक्षा का संबल बने।
सामाजिक विश्लेषकों का कहना है कि दुष्कर्म और यौन शोषण जैसे मामलों में समाज का गुस्सा समझ में आता है, इसमें कठोर और तत्काल कार्रवाई की मांग भी स्वाभाविक है, लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में कठोर कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया एक-दूसरे की विरोधी नहीं होनी चाहिए। ऐसे में मूल सवाल केवल यह नहीं है कि पुलिस ने अपराधी के खिलाफ कितनी सख्ती दिखाई, बल्कि यह भी है कि क्या कार्रवाई कानून में तय सीमाओं और आवश्यक प्रक्रिया के भीतर हुई? यही वह बिंदु है जहां पुलिस कार्रवाई और न्यायिक प्रक्रिया के बीच संतुलन की जरूरत सामने आती है।