अक्षय कुमार की बेटी नितारा को हाल ही में कैमरों से बचते हुए देखा गया। इससे पहले भी वे कई बार कैमरों से दूरी बनाती नजर आई हैं। स्टार किड होने की वजह से पैपराजी अक्सर उन्हें घेर लेते हैं, लेकिन एक टीनएजर के लिए कैमरों से असहज महसूस करना या फोटो खिंचवाने से बचना बिल्कुल सामान्य बात हो सकती है।
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इसलिए सिर्फ किसी एक वीडियो या तस्वीर के आधार पर यह मान लेना कि किसी बच्चे को Social Anxiety है, सही नहीं है। किसी की मानसिक स्थिति का अंदाजा केवल ऐसे पलों से नहीं लगाया जा सकता।
हालांकि, यह घटना एक अहम सवाल जरूर उठाती है, आखिर किशोरावस्था में बच्चों को लोगों की नजर, कैमरे और दूसरों की राय का दबाव इतना क्यों महसूस होने लगता है? Social Anxiety सिर्फ शर्मीलापन नहीं है। इसमें दूसरों द्वारा जज किए जाने का डर इतना बढ़ सकता है कि बच्चा सामाजिक परिस्थितियों से बचने लगे।
टीनएज में बदल जाती है खुद को देखने की नजर
किशोरावस्था सिर्फ लंबाई बढ़ने या आवाज बदलने का दौर नहीं है। इस उम्र में बच्चा धीरे-धीरे अपनी अलग पहचान बनाने लगता है। उसे यह भी ज्यादा महसूस होने लगता है कि दूसरे लोग उसके कपड़े, बोलने के तरीके, चेहरे, शरीर या व्यवहार के बारे में क्या सोच रहे हैं।
यही वजह है कि दोस्तों के बीच कही गई छोटी-सी बात भी कभी-कभी बहुत बड़ी लग सकती है। ऊपर से सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है, जहां एक तस्वीर पर लाइक, कमेंट और लोगों की राय तुरंत सामने आ जाती है।

Social Anxiety in Teens
बच्चों को किन बातों से हो सकती है परेशानी?
टीनएज में Social Anxiety के पीछे कई वजहें हो सकती हैं। स्कूल का दबाव, परीक्षा, दोस्तों के बीच खुद को लेकर असुरक्षा, बुलिंग, नए माहौल में जाना या किसी सामाजिक स्थिति का खराब अनुभव बच्चे को ज्यादा चिंतित कर सकता है।
कई बार बच्चा बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर यह सोच रहा होता है, 'अगर मैंने कुछ गलत बोल दिया तो?' 'लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे?' यही चार लोग क्या बोलेंगे, क्या सोचेंगे वाला डर कई बार बच्चों के लिए पब्लिक स्पेस में जाना मुश्किल बना देता है।

Parenting Tips for teen parents
माता-पिता नोट करें टिप्स
अगर आप अपने बच्चे को ऐसा कहते हैं.. 'इतना क्यों शर्माते हो?', 'लोगों का सामना करो' या 'तुम्हें इतना डर क्यों लगता है?' तो सबसे पहले ऐसा कहना बंद कर दें। ऐसा करने से आप बच्चों पर और दबाव डाल सकते हैं। इसके बजाय उनसे आराम से और सपोर्टिव टोन में बात करें।
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बच्चे को तुरंत जवाब देने के लिए मजबूर न करें। बिना जज किए उसकी बात सुनना ज्यादा मददगार हो सकता है। विशेषज्ञ सलाह भी यही कहती है कि किशोरों से बातचीत करते समय उनकी भावनाओं को खारिज करने के बजाय उन्हें समझने की कोशिश करनी चाहिए।
