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शादी जैसा साथ, लेकिन शादी से कितना अलग? लिव-इन रिलेशनशिप पर RSS प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी ने फिर छेड़ी बहस

लिव-इन रिलेशनशिप पर RSS प्रमुख मोहन भागवत की टिप्पणी ने शादी, जिम्मेदारी और बदलती सोच पर नई बहस छेड़ दी है। देखें लिव-इन क्या होता है और क्या सिर्फ साथ रहना रिश्ते की पूरी तस्वीर बताता है?

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What is a live in relationship

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि, आजकल रिश्तों की तस्वीर पहले जैसी नहीं रही। कोई शादी को जिंदगी की स्वाभाविक मंजिल मानता है, तो कोई पहले साथ रहकर एक-दूसरे को समझना पसंद करता है। इसी बदलती सोच के बीच RSS प्रमुख मोहन भागवत की लिव-इन रिलेशनशिप पर की गई टिप्पणी चर्चा में है। एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने विवाह को ऐसा अनुशासन बताया, जो ‘धर्म’ और जिम्मेदारी का भाव पैदा करता है। लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर उन्होंने सवाल उठाया कि अगर रिश्ता केवल खुशी तक सीमित रहे और जिम्मेदारी से बचने की कोशिश हो तो उसके सामाजिक परिणाम क्या होंगे।

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मोहन भागवत ने लिव-इन पर क्या कहा?

भागवत ने कहा, “भागवत ने कहा, “शादी एक ऐसा अनुशासन है जो धर्म सिखाता है। इसका विकल्प है लिव-इन रिलेशनशिप। आधुनिकता। इसके क्या नतीजे हैं? हमें ज़िम्मेदारियाँ नहीं, बल्कि खुशी चाहिए। जब मन करे तब साथ रहो और जब न करे तो अलग हो जाओ। कोई ज़िम्मेदारी नहीं। इससे क्या पनपेगा? क्या पनप रहा है, ज़रा दुनिया भर में नज़र तो डालिए।”

उनकी टिप्पणी का मूल सवाल रिश्ते के फॉर्मेट से ज्यादा उसमें मौजूद जिम्मेदारी को लेकर था। उन्होंने लिव-इन को आधुनिकता के नाम पर वेस्ट की अंधी नकल के रूप में देखने की आलोचना की, हालांकि साथ ही बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की जरूरत भी स्वीकार की।

लिव-इन रिलेशनशिप क्या होता है?

आसान भाषा में कहें तो लिव-इन रिलेशनशिप में दो लोग बिना औपचारिक शादी किए एक साथ रहकर पार्टनर की तरह जीवन बिताते हैं। इसमें साथ रहने, खर्च बांटने, घर चलाने और भविष्य को लेकर दोनों अपनी सहमति से फैसले लेते हैं।

यानी बाहर से देखें तो यह कई बार शादी जैसा ही लग सकता है, एक घर, एक पार्टनर और रोजमर्रा की जिंदगी साथ। लेकिन दोनों के बीच सबसे बड़ा अंतर यही है कि, ये रिश्ता शादी और कानूनी दायरों के बीच बंधा हुआ नहीं होता है।

सिर्फ शादी नहीं सब कुछ..

हालांकि आज के दौर में इस बात को समझना बहुत जरूरी है कि, रिश्ते की गंभीरता सिर्फ शादी की मुहर से तय नहीं होती। शादीशुदा जोड़े के बीच भी संवाद, सम्मान और भरोसा न हो तो रिश्ता कमजोर हो सकता है। दूसरी ओर, लिव-इन में रहने वाले दो लोग भी एक-दूसरे के प्रति बेहद गंभीर, वफादार और जिम्मेदार हो सकते हैं।

Live in relationship Vs Marriage

Live in relationship Vs Marriage

इसलिए सिर्फ रिश्ते का नाम देखकर उसकी पूरी गहराई तय करना आसान नहीं है। किसी भी रिश्ते में साथ रहना आसान हिस्सा हो सकता है, लेकिन मुश्किल समय में एक-दूसरे का साथ देना असली परीक्षा होती है। बीमारी, आर्थिक परेशानी, करियर के फैसले, परिवार की जिम्मेदारियां, इन सबके बीच पार्टनर कितना साथ देता है, यही रिश्ते की मजबूती दिखाता है।

आज की पीढ़ी रिश्तों को लेकर पहले से ज्यादा खुलकर सोचती है। लोग शादी से पहले एक-दूसरे की आदतों, सोच और लाइफस्टाइल को समझना चाहते हैं। वहीं बहुत से लोग अब भी विवाह को स्थिरता, परिवार का मजबूत आधार मानते हैं। किसी के लिए शादी सही विकल्प हो सकती है, किसी के लिए लिव-इन। ऐसे में समझना जरूरी है कि, रिश्ते का नाम जो भी हो, उसमें सहमति, सम्मान, ईमानदारी और जिम्मेदारी हो तो वो लंबे समय तक निभाया जा सकता है।

Avni Bagrola
अवनी बागरोलाauthor

अवनी बागरोला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल के लाइफस्टाइल सेक्शन में कंटेंट राइटर के रूप में कार्यरत हैं। फैशन, ब्यूटी, ट्रेंड्स, पर्सनल स्टाइलिंग और आधुनिक जीवनशैली से जुड़े कंटेंट पर उनकी मजबूत पकड़ उन्हें युवा और स्टाइल-सेवी ऑडियंस के बीच खास पहचान दिलाती है। अवनी की लेखन शैली सरल, ट्रेंडी और यूज़र-फ्रेंडली है, जो पाठकों को तेजी से बदलते फैशन व लाइफस्टाइल ट्रेंड्स को समझने में मदद करती है। अब तक 2,500 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुकी अवनी क्रिएटिव अप्रोच, अपडेटेड नॉलेज और रियल-टाइम ट्रेंड सेंस के लिए जानी जाती हैं।

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