Shayari of The Day: अल्लामा इकबाल उर्दू और फारसी के महान शायर, दार्शनिक और विचारक थे। उन्हें शायर-ए-मशरिक़ भी कहा जाता था। इकबाल की शायरी भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र नहीं थी। उनकी कलम से निकले शेरों में आत्मचेतना, कर्म, आत्मसम्मान और जागृति का संदेश होता था। इकबाल की शायरी इथनी बुलंद थी कि पढ़ने भर से लोगों के हौसलों को नई उड़ान मिल जाती। उनका एक ऐसा ही मशहूर शेर है:
"ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है"
यह शेर अल्लामा इकबाल की फिलॉसफी और आत्मबोध की सोच की अमर मिसाल है। इसके मायने जीवन, कर्म और आत्मसम्मान के साथ जुड़े हैं। शेर में इस्तेमाल लफ्ज खुदी का मतलब यहां अपने भीतर छिपी हुई आत्मशक्ति, आत्मविश्वास, विवेक और चेतना से है।
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
शेर का पहला मिसरा कहता है कि इंसान को अपने भीतर की शक्ति, आत्मसम्मान और चरित्र को इतना ऊंचा कर लेना चाहिए कि वह हालात, किस्मत और परिस्थितियों का मोहताज न रहे। यहां तकदीर को स्थिर या अपरिवर्तनीय मानने के बजाय उसे कर्म और आत्मबल से बदला जा सकने वाला तत्व माना गया है।
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
दूसरा मिसरे का मतलब यह कतई नहीं है कि इंसान ईश्वर से ऊपर हो जाता है। शेर कहता है कि जब मनुष्य अपनी जिम्मेदारी, नैतिकता और कर्म को पूरी ईमानदारी से निभाता है, तो वह ईश्वर की इच्छा का सच्चा प्रतिनिधि बन जाता है। ऐसा व्यक्ति अपने जीवन का निर्णय स्वयं लेता है, क्योंकि उसके निर्णय सत्य, न्याय और मानवता पर आधारित होते हैं।
यह शेर इंसान को भाग्यवादी सोच से बाहर निकलने की प्रेरणा देता है। इकबाल मानते थे कि जो व्यक्ति केवल तकदीर को दोष देता है, वह अपनी शक्तियों को पहचान ही नहीं पाता। इसके विपरीत, जो अपने आत्मबल, ज्ञान और कर्म से आगे बढ़ता है, वही अपने जीवन का निर्माता बनता है।
