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मकड़ी के रेशम से बनेंगे हवाई जहाज! वैज्ञानिकों ने खोला स्टील से भी मजबूत जाले का राज

मकड़ी के जाले की मजबूती सदियों से वैज्ञानिकों के लिए एक पहेली रही है। स्टील से भी ज्यादा मजबूत और केवलार (बुलेटप्रूफ जैकेट बनाने वाला मटेरियल) से भी ज्यादा लचीला होने के कारण यह दुनिया के सबसे अद्भुत प्राकृतिक पदार्थों में से एक है। हाल ही में एक शोध ने उस राज को सुलझा लिया है जिसने अब भविष्य के सुपर-मटेरियल बनाने की राह खोल दी है।

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पता चल गया, स्टील से भी ज्यादा मजबूत क्यों होता है यह फाइबर

Photo : Times Now Digital

Science News: वैज्ञानिकों ने आखिरकार उस रहस्य से पर्दा उठा दिया है, जिसने दशकों से शोधकर्ताओं को हैरान कर रखा था। अब पता चल चुका है कि मकड़ी के जाले इतने मजबूत और लचीले कैसे होते हैं। नई रिसर्च में पता चला है कि मकड़ी के जाले (रेशम) की मजबूती के पीछे बेहद सूक्ष्म स्तर पर काम करने वाली “मॉलिक्यूलर स्टिकर्स” जैसी संरचनाएं जिम्मेदार हैं, जो प्रोटीन को आपस में मजबूती से जोड़कर इसे असाधारण फाइबर में बदल देती हैं।

कुदरत का जादुई 'गोंद'

किंग्स कॉलेज लंदन और सैन डिएगो स्टेट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने पाया कि मकड़ी के रेशम में मौजूद 'अमीनो एसिड' किसी प्राकृतिक गोंद या 'मॉलिक्यूलर स्टिकर' की तरह काम करते हैं। जब मकड़ी अपनी ग्रंथियों से तरल रेशम बाहर निकालती है, तो ये छोटे-छोटे मॉलिक्यूल्स आपस में जुड़कर एक कॉम्प्लेक्स जालनुमा आकृति बुनते हैं। यही प्रक्रिया तरल पदार्थ को बेहद मजबूत ठोस रेशों में बदल देती है, जो वजन झेलने के मामले में स्टील को भी मात दे देते हैं।

हवाई जहाज से लेकर इम्प्लांट्स तक का बदलेगा भविष्य

इस शोध के नतीजों से सीख लेकर वैज्ञानिक अब ऐसे नए फाइबर बनाने की योजना बना रहे हैं जो पर्यावरण के अनुकूल और हाई परफॉर्मेंस वाले होंगे। किंग्स कॉलेज लंदन के प्रोफेसर क्रिस लोरेंज के मुताबिक, इस तकनीक का उपयोग भविष्य में हल्के और सुरक्षित हवाई जहाज के कलपुर्जे, हल्के बुलेटप्रूफ कपड़े, बायोडिग्रेडेबल मेडिकल इम्प्लांट्स और सॉफ्ट रोबोटिक्स बनाने में किया जा सकता है। यह खोज भविष्य के उद्योगों के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकती है।

अल्जाइमर जैसी बीमारियों के इलाज में मिलेगी मदद

हैरान करने वाली बात यह है कि मकड़ी के रेशम की यह प्रक्रिया इंसानी दिमाग में होने वाली कुछ जैविक गतिविधियों से मिलती-जुलती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि जिस तरह रेशम के प्रोटीन आपस में जुड़ते हैं, ठीक वैसी ही प्रक्रिया अल्जाइमर (Alzheimer’s) जैसी न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों में भी देखी जाती है। इस खोज से शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिलेगी कि दिमाग में प्रोटीन कैसे गलत तरीके से जमा होते हैं, जिससे भविष्य में इन बीमारियों के बेहतर इलाज की संभावना बढ़ सकती है।

कैसे सुलझी गुत्थी?

वैज्ञानिकों ने इस शोध के लिए आधुनिक 'अल्फाफोल्ड-3' स्ट्रक्चरल मॉडलिंग और सुपर कंप्यूटर सिमुलेशन का उपयोग किया। उन्होंने पाया कि 'आर्जिनिन' और 'टाइरोसिन' नामक दो अमीनो एसिड शुरुआत में रेशम के प्रोटीन को इकट्ठा करते हैं और अंत तक उसे एक बेहद मजबूत बना देते हैं। यह प्रक्रिया इतनी जटिल और विकसित है कि वैज्ञानिक इसे कुदरत की "सबसे बेहतरीन इंजीनियरिंग" मान रहे हैं।

 Nishant Tiwari
Nishant Tiwari author

निशांत तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की सिटी टीम में कॉपी एडिटर हैं। शहरों से जुड़ी खबरों, स्थानीय मुद्दों और नागरिक सरोकार को समझने की उनकी गहरी दृ... और देखें

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