देश में मुस्लिम महिलाओं के कानूनी और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई शुरू हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में मुस्लिम समाज में प्रचलित बहुविवाह (Polygamy) की प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने और मुस्लिम महिलाओं को भारतीय संविधान के तहत समान अधिकार देने की मांग की गई है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। अदालत ने केंद्र सरकार से जवाब मांगने के साथ ही इस याचिका को अदालत में पहले से लंबित समान मामलों के साथ टैग दिया है।
यह याचिका प्रसिद्ध महिला अधिकार कार्यकर्ता जकिया सोमन, डॉ. नूरजहां सफिया नियाज और अन्य द्वारा वकील श्रिया मैनी के माध्यम से दायर की गई है। याचिका में 'मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरिया) एप्लिकेशन एक्ट, 1937' की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है, जो मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक शादी करने की कानूनी छूट देती है।
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दूसरी शादी करना एक दंडनीय अपराध
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 82 के तहत देश के अन्य सभी नागरिकों के लिए दूसरी शादी (द्विविवाह) करना एक दंडनीय अपराध है, जिसमें सात साल तक की सजा का प्रावधान है। लेकिन मुस्लिम पुरुषों को धर्म के नाम पर इससे छूट मिली हुई है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव के खिलाफ अधिकार) और अनुच्छेद 21 (सम्मान से जीने का अधिकार) का सीधा उल्लंघन है।
कई मुस्लिम बहुल देशों में बहुविवाह पर पहले ही प्रतिबंध
याचिका में यह भी रेखांकित किया गया है कि ट्यूनिशिया और तुर्की जैसे कई मुस्लिम बहुल देशों में बहुविवाह पर पहले ही प्रतिबंध लगाया जा चुका है। इस्लाम में भी यह कोई अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसके अलावा, याचिका में मुस्लिम शादियों और तलाक के अनिवार्य पंजीकरण, पहली पत्नी और बच्चों के लिए भरण-पोषण व संपत्ति में सुरक्षित अधिकारों की भी मांग की गई है।
