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लिव इन रिलेशनशिप में गुजारा भत्ता की मांग, SC में पहुंचा दिलचस्प कानूनी मामला

  • Agency by: Agency
  • Updated Aug 30, 2025, 05:50 PM IST

लिव इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक साथ रहने पर अदालतें क्या इसे शादी का दर्जा दे सकती हैं। ऐसे मामलों में महिला धारा 125 सीआरपीसी के तहत गुजारा भत्ता मांग सकती है। सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई दिलचस्प होगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने बीते शुक्रवार को ऐसी याचिका पर नोटिस जारी किया, जिसमें एक पुरुष ने अपनी लिव इन पार्टनर द्वारा फैमिली कोर्ट में CrPC के सेक्शन 125 के तहत दाखिल गुजारा भत्ता (मेंटेनेंस) की मांग वाली याचिका की वैधता को चुनौती दी गई है। यह मामला केरल हाईकोर्ट के एक फैसले से जुड़ा है, जिसमें पुरुष की याचिका खारिज कर दी थी। इस मामले में निचली अदालत ने फीमेल लिव इन पार्टनर की मेंटेनेंस की मांग वाली अर्जी को जायज़ माना था।

केरल हाईकोर्ट ने महिला पार्टनर के पक्ष में दिया था फैसला

केरल हाईकोर्ट ने कहा था कि अगर कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहते हैं, तो धारा 125 के तहत वैवाहिक प्रमाण का होना जरूरी नहीं है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए था कि अगर यह साबित हो जाए कि दोनों पार्टनर लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह रहे हैं, तो महिला कानूनन गुजारा भत्ता दिए जाने की मांग कर सकती है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच के सामने मेल पार्टनर ने दलील दी कि लिव इन रिलेशनशिप में गुजारा भत्ता का दावा करना पूरी तरह से अवैध और गुमराह करने वाला है। सुप्रीम कोर्ट ने फीमेल पार्टनर को नोटिस जारी कर छह हफ्तों में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

लिव-इन को लेकर SC का अबतक क्या रुख रहा है?

सुप्रीम कोर्ट के 2005 के ललिता टोप्पो बनाम स्टेट ऑफ झारखंड मामले में ये कानूनी सवाल उठा था कि क्या लंबे समय तक साथ रहने से लिव इन रिलेशनशिप को विवाह की तरह मान्यता मिलेगी? और क्या महिला को CrPC की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता मिल सकता है?

इसके बाद 2018 में तत्कालीन CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने अपने फैसले में कहा था कि लिव इन पार्टनर को घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत ज्यादा कानूनी राहत मिल सकती है।

वहीं कमला बनाम एम.आर. मोहन कुमार के केस में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया था कि सीआरपीसी धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता की मांग के लिए किसी निश्चित वैवाहिक प्रमाण की जरूरत नहीं होगी। क्योंकि इस कानून का मकसद महिलाओं को न्याय के लिए दर-दर की ठोकरें खाने से रोकना है।

क्या कहता है गुजारा भत्ते से जुड़ा कानून?

सीआरपीसी की धारा 125 दरअसल एक सामाजिक न्याय का कानूनी प्रावधान है, जो सुनिश्चित करता है कि कोई भी पत्नी, बच्चा या बुजुर्ग भूखा-प्यासा और बेसहारा न रहे। इसका मकसद उन महिलाओं, बच्चों और बुजुर्ग माता-पिता की मदद करना है जो अपने जीवनयापन के लिए आर्थिक तौर दूसरों पर निर्भर हैं और जिनकी देखभाल नहीं की जा रही है।

इस कानून की शर्त ये है कि अगर पति, संतान या फिर माता-पिता के पास पर्याप्त साधन और संसाधन हैं और वे अपने ऊपर आश्रितों का पालन-पोषण से इनकार करते हैं या फिर उनकी उपेक्षा करते हैं, तभी अदालत ऐसे मामलों में कोई सुनवाई करती है।

Gaurav Srivastav
गौरव श्रीवास्तवauthor

टीवी न्यूज रिपोर्टिंग में 10 साल पत्रकारिता का अनुभव है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट से लेकर कानूनी दांव पेंच से जुड़ी हर खबर आपको इस जगह मिलेगी। साथ ही चुनाव आयोग, विपक्ष के राजनीतिक घटनाक्रम से लेकर हर जनहित मुद्दे पर मेरी नजर रहती है।

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