भारत के चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत ने कहा है कि न्याय प्रणाली की सफलता इस बात से नहीं आंकी जानी चाहिए कि कितने फैसले सुनाए गए, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि कितने विवाद सुलझे। वे गोवा में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन 'मीडिएशन वर्तमान समय में कितना महत्वपूर्ण' को संबोधित कर रहे थे। इस सम्मेलन में सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के कई न्यायाधीश मौजूद रहे। कार्यक्रम का आयोजन बार काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा किया गया।
अपने संबोधन में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि मीडिएशन उनके लिए एक ऐसा विषय है जिसे वे गहरी आस्था और प्रतिबद्धता के साथ देखते हैं। उन्होंने कहा कि मुकदमेबाजी अक्सर टूट चुके रिश्तों का पोस्टमार्टम होती है, जबकि मीडिएशन रिश्तों को बचाने और विवाद सुलझाने का प्रयास है।उन्होंने कहा कि मीडिएशन तभी सफल होता है जब मीडिएटर उसी भाषा में बात करे, उसी भावना को समझे, जिसमें पक्षकार अपनी बात रख रहा है।
मीडिएशन भारत की अपनी परंपरा है, कोई विदेशी विचार नहीं
चीफ जस्टिस ने कहा कि मीडिएशन भारत की मिट्टी से जुड़ा हुआ विचार है और इसकी जड़ें हमारे प्राचीन 'साम' के सिद्धांत में हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मीडिएशन कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि सहमति और भागीदारी की संस्कृति की ओर बढ़ने का संकेत है। उन्होंने यह भी कहा कि मीडिएशन प्रक्रिया को सफल बनाने के लिए मीडिएटर्स में करुणा, समर्पण और जिम्मेदारी बेहद जरूरी है।
मल्टी डोर कोर्ट सिस्टम की कल्पना
CJI सूर्यकांत ने कहा कि वे ऐसे न्याय तंत्र की कल्पना करते हैं जहां अदालत सिर्फ मुकदमे चलाने की जगह न होकर विवाद समाधान का एक व्यापक केंद्र हो। उन्होंने इसे 'मल्टी डोर कोर्ट हाउस' बताया, जहां हर विवाद के लिए अलग रास्ता हो सकता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कुछ मामलों में मीडिएशन या मध्यस्थता संभव नहीं होती और ऐसे मामलों में मुकदमे के जरिए फैसला हमेशा एक विकल्प रहेगा।
देश को ढाई लाख प्रशिक्षित मीडिएटर्स की जरूरत
अपने भाषण में चीफ जस्टिस ने एक अहम आंकड़ा साझा करते हुए कहा कि भारत को करीब ढाई लाख प्रशिक्षित मीडिएटर्स की जरूरत है, जबकि अभी देश में सिर्फ करीब 31 हजार प्रशिक्षित मीडिएटर्स ही उपलब्ध हैं। उन्होंने कहा कि अगर मीडिएशन को न्याय प्रणाली का मजबूत आधार बनाना है तो इस दिशा में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण और जागरूकता की जरूरत है।
मीडिएटर्स में मनोविज्ञान और विषय की समझ जरूरी
सम्मेलन में जस्टिस जे के महेश्वरी ने कहा कि अच्छे मीडिएटर वही हो सकते हैं जो इंसानी मनोविज्ञान को समझें और दोनों पक्षों के बीच भरोसा बना सकें। उन्होंने कहा कि मीडिएटर्स को विषय की समझ भी होनी चाहिए और गोपनीयता, शक्ति संतुलन और फैसलों को लागू करने जैसे पहलुओं पर गंभीरता से काम करना होगा।
मीडिएशन एक्ट 2023 भारत की सोच को दर्शाता है
बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि मीडिएशन एक्ट 2023 किसी विदेशी मॉडल की नकल नहीं है, बल्कि भारत अपनी पुरानी विवाद समाधान परंपरा को फिर से याद कर रहा है। उन्होंने कहा कि इस कानून से मीडिएशन को एक मजबूत कानूनी पहचान मिली है।
AI के दौर में वकीलों को नए अपराधों के लिए तैयार रहना होगा
CJI सूर्यकांत ने अपने भाषण में यह भी कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कानूनी पेशे के लिए मददगार साबित हो रहा है, लेकिन इसके साथ ही नए तरह के साइबर अपराध भी सामने आ रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि क्यों न वकीलों के लिए एक राष्ट्रीय कानूनी अकादमी बनाई जाए, जहां कुछ महीनों के विशेष प्रशिक्षण से उन्हें इन चुनौतियों के लिए तैयार किया जा सके।
मीडिएशन पर उम्मीदें, लेकिन चुनौतियां भी
सम्मेलन के दौरान यह बात भी उभरकर सामने आई कि जिस न्यायपालिका में जजों के हजारों पद खाली हैं, वहां मीडिएशन से बड़ी उम्मीदें जरूर हैं, लेकिन इसके लिए प्रशिक्षित मीडिएटर्स की संख्या बढ़ाना और आम लोगों में जागरूकता लाना बेहद जरूरी है।
