सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मंदिर से जुड़े अहम मामले की सुनवाई के दौरान 'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन’ नामक एनजीओ को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने तीखे सवाल करते हुए पूछा कि आखिर इस संगठन ने जनहित याचिका (PIL) किस आधार पर दायर की और क्या वह खुद को देश का मुख्य पुजारी मानता है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-सदस्यीय संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें शबरीमाला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा जैसे मुद्दों पर विचार हो रहा है।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने एनजीओ की मंशा और उसकी धार्मिक आस्था पर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने एनजीओ की ओर से पेश अधिवक्ता रवि प्रकाश गुप्ता से कहा, 'यह काफी गंभीर मामला है। जिन लोगों को देवता में आस्था है, वे सभी आवश्यक नियमों का पालन करेंगे। लेकिन कोई यह कहे कि वह सभी ’नियम’ तोड़ देगा, (तो) इसे अदालत प्रोत्साहित नहीं कर सकती। आप कह रहे हैं कि जिन लोगों को उस देवता में आस्था या विश्वास नहीं है, उन्हें भी प्रवेश दिया जाए। आप सच्चे श्रद्धालु नहीं हैं।'
यह टिप्पणी उस समय आई जब पीठ केरल के शबरिमला मंदिर समेत विभिन्न धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ कथित भेदभाव और अलग-अलग धर्मों में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही थी।पीठ ने यह भी पूछा कि एक कानूनी संस्था पूजा करने के अधिकार का दावा कैसे कर सकती है और क्या उसके सदस्यों में वास्तविक श्रद्धालु शामिल हैं।
'इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन'की ओर से पेश वकील ने बताया कि जून 2006 में अखबार में चार लेख प्रकाशित हुए थे और जनहित याचिका उन्हीं पर आधारित है। उन्होंने कहा कि यह याचिका उन खबरों के आधार पर दायर की गई थी, जिनमें ज्योतिषियों ने दावा किया था कि एक महिला के मंदिर में प्रवेश करने के बाद मंदिर अपवित्र हो गया था। जैसे ही वकील ने अपनी दलीलें प्रस्तुत करनी शुरू कीं, न्यायमूर्ति नागरत्ना ने टिप्पणी की, ’’आप जैसी एक विधिक (कानूनी) संस्था की कोई आस्था कैसे हो सकती है? यह तो किसी व्यक्ति के लिए होती है। आपके पास कोई अंतरात्मा नहीं है।’’
गौरतलब है कि सबरीमाला मंदिर मामले में वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से फैसला देते हुए 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया था। अब इस मुद्दे पर व्यापक संवैधानिक और धार्मिक पहलुओं की दोबारा समीक्षा की जा रही है।
