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मोहन भागवत ने लॉन्च किया सामवेद का पहला उर्दू अनुवाद, ट्रांसलेटर बोले- 'औरंगजेब हार गया, मोदी जीत गए'

  • Written by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Mar 17, 2023, 05:27 PM IST

सामवेद का उर्दू अनुवाद करने वाले इकबाल दुर्रानी का कहना है कि 400 साल पहले दारा शिकोह ने वेदों का अनुवाद करना चाहा था, लेकिन औरंगजेब ने उन्हें मरवा दिया था। आज पीएम मोदी के राज में मैंने उनका सपना पूरा किया है।

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मोहन भागवत ने लॉन्च किया सामवेद का पहला उर्दू अनुवाद

Photo : PTI

Samveda Urdu translation: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अब देश में गंगा जमुनी तहजीब को बढ़ावा देने और भारतीय परंपराओं के विस्तार में जुट गया है। इसी की तहत शुक्रवार को आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दिल्ली के लाल किला परिसर में चारों वेदों में से एक 'सामवेद' का उर्दू अनुवाद लॉन्च किया। यह किसी वेद का अब तक का पहला उर्दू अनुवाद है।

सामवेद का उर्दू में अनुवाद फिल्म निर्माता इकबाल दुर्रानी ने किया है। उन्होंने कहा, 'औरंगजेब हार गया और मोदी जीत गए।' दुर्रानी ने आगे कहा, दारा शिकोह ने उपनिषदों का उर्दू में अनुवाद किया और वह वेदों का अनुवाद करना चाहता था, लेकिन औरंगजेब ने उसे मरवा दिया। 400 साल बाद पीएम मोदी के नेतृत्व में वो सपना मैंने पूरा किया है।

सामवेद इंसान और भगवान के बीच बातचीत का जरिया

इससे एक दिन पहले लेखक इकबाल दुर्रानी ने कहा था कि सामवेद ग्रंथ मंत्रों का संग्रह है। यह मंत्र इंसान और भगवान के बीच बातचीत का जरिया है। उन्होंने कहा, इस ग्रंथ में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे पढ़कर मुसलमान समझ नहीं सकता है। आगे कहा, मैं चाहता हूं कि देश में हिंदू-मुस्लिम एकता बने, एक दूसरे के ग्रंथ के बारे में जानकारी होनी चाहिए, क्योंकि यह सब भगवान की बाते हैं।

मुस्लिम समुदाय को साधने में जुटा संघ

बीते कुछ दिनों ने आरएसएस मुस्लिम समुदाय को साधने में जुट गया है। कई मंचों पर आरएसएस प्रमुख भी हिंदू-मुस्लिम एकता की बात कर चुके हैं। अब सामवेद के जरिए भी वह इस समुदाय तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रहा है। इससे पहले 2021 में मोहन भागवत की पुस्तक भविष्य में भारत का भी उर्दू में अनुवाद किया गया था।

गाये जा सकते हैं सामवेद के मंत्र

सामवेद के मंत्र गाये जा सकते हैं। यज्ञ, अनुष्ठान के समय ये मंत्र गाए जाते हैं, इसकी कारण इसका नाम सामवेद पड़ा, क्योंकि इस वेद में वही मंत्र हैं, जो गायन पद्धति के हैं।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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