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पहली ही कोशिश में लॉन्च किया रॉकेट...गणित में आए थे महज 51 नंबर, आखिर किस भारतीय ने दी एलन मस्क को टक्कर?

Vikram 1 Rocket Launch Success: कभी गणित में सिर्फ 51 नंबर लाने वाले पवन कुमार चंदना ने रचा इतिहास। स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 रॉकेट ने पहली ही कोशिश में वो कर दिखाया जो स्पेसएक्स भी नहीं कर पाई थी।

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पहली ही कोशिश में लॉन्च किया रॉकेट...गणित में आए थे महज 51 नंबर, आखिर किस भारतीय ने दी एलन मस्क को टक्कर?

Pawan Kumar Chandana Skyroot: जब कोई छात्र स्कूल के दिनों में गणित (Maths) जैसे विषय में सिर्फ 51 नंबर लाता है, तो आमतौर पर लोग उसे औसत मानकर आगे बढ़ जाते हैं। कोई सोच भी नहीं सकता कि ऐसा लड़का आगे चलकर देश का बड़ा रॉकेट वैज्ञानिक बनेगा। लेकिन हैदराबाद के एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मे पवन कुमार चंदना (Pawan Kumar Chandana) की कहानी कुछ अलग ही है।

पवन कुमार चंदना की सह-स्थापना वाली अंतरिक्ष स्टार्टअप कंपनी 'स्काईरूट एयरोस्पेस' के भारी-भरकम रॉकेट 'विक्रम-1' (Vikram-1) ने अंतरिक्ष में इतिहास रच दिया है। सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (ISRO) से लॉन्च किए गए इस रॉकेट ने न सिर्फ अंतरिक्ष की कक्षा में सफलतापूर्वक कदम रखा, बल्कि पहली ही कोशिश में 'मिशन आगमन' के तहत उपग्रहों को भी उनकी सटीक कक्षा में स्थापित कर दिया।

एलन मस्क की स्पेसएक्स 3 बार फेल हुई

अंतरिक्ष की दुनिया में किसी भी नए रॉकेट का पहली बार में सफल होना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। दुनिया की सबसे बड़ी और मशहूर निजी अंतरिक्ष कंपनी स्पेसएक्स (SpaceX) के मालिक एलन मस्क को भी अपना पहला रॉकेट 'फाल्कन 1' अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए कई बार नाकामियों और करोड़ों डॉलर के नुकसान का सामना करना पड़ा था। साल 2006 से 2008 के बीच स्पेसएक्स के लगातार 3 मिशन फेल हुए थे और चौथी बार में उन्हें सफलता मिली थी। लेकिन भारत के पवन कुमार चंदना की टीम ने वह कर दिखाया जो एलन मस्क भी नहीं कर पाए थे।

स्काईरूट एयरोस्पेस उन दो इंजीनियरों की कहानी है, जिनके अनुभव ने भारत की अंतरिक्ष यात्रा को आकार दिया है।

स्काईरूट एयरोस्पेस उन दो इंजीनियरों की कहानी है, जिनके अनुभव ने भारत की अंतरिक्ष यात्रा को आकार दिया है।

स्काईरूट का 'विक्रम-1' अपने पहले ही प्रयास में पूरी तरह सफल रहा और भारत की धरती से कक्षा में पहुंचने वाला पहला पूर्ण निजी रॉकेट बन गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद फोन कर पवन चंदना और सह-संस्थापक नागा भरत डाका को बधाई दी और कहा कि इस युवा टीम ने देश की आने वाली पीढ़ी को एक नई प्रेरणा दी है।

IIT खड़गपुर से इसरो और फिर आत्मनिर्भरता का सपना

पवन चंदना बचपन से ही मशीनों और तकनीक के प्रति आकर्षित थे, भले ही स्कूली परीक्षाओं के नंबर उनके पक्ष में नहीं थे। समय के साथ उन्होंने अपनी कमजोरियों को ताकत बनाया। उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में देश की सबसे कठिन 'आईआईटी प्रवेश परीक्षा' पास की और आईआईटी खड़गपुर (IIT Kharagpur) में दाखिला लिया। वहां से सीधे उनका चयन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) में हो गया। इसरो के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में 6 साल काम करते हुए पवन ने भारत के सबसे भारी रॉकेट GSLV Mk III के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके लिए उन्हें आंतरिक नवाचार पुरस्कार भी मिला। लेकिन उनके मन में कुछ और ही चल रहा था। वे देखना चाहते थे कि क्या सरकारी ढांचे से बाहर भी भारत में निजी तौर पर रॉकेट बनाए जा सकते हैं?

आज 1,000 लोगों को दिया रोजगार

साल 2018 में पवन चंदना ने इसरो की सुरक्षित सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपने साथी आईआईटी बॉम्बे के स्नातक नागा भरत डाका के साथ मिलकर हैदराबाद में 'स्काईरूट एयरोस्पेस' की नींव रखी। शुरुआत में भारत जैसे देश में किसी प्राइवेट रॉकेट कंपनी पर पैसा लगाना निवेशकों के लिए जुआ जैसा था। लेकिन पवन के विजन पर भरोसा करते हुए फ्लिपकार्ट के सह-संस्थापक बिन्नी बंसल ने शुरुआती $1.5 मिलियन का निवेश किया।

इसके बाद कोरोना महामारी के दौर में भी ग्रीनको (Greenko) जैसी रिन्यूएबल एनर्जी कंपनी ने इनका साथ दिया। कदम दर कदम स्काईरूट ने मील के पत्थर छुए:

2020: भारत का पहला निजी रॉकेट इंजन 'रमन-1' टेस्ट किया।

2022: भारत का पहला सब-ऑर्बिटल निजी रॉकेट 'विक्रम-एस' अंतरिक्ष में भेजा।

2026: प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश की सबसे बड़ी निजी रॉकेट निर्माण सुविधा (इन्फिनिटी कैंपस) का उद्घाटन कराया गया और अब 'विक्रम-1' को सफलतापूर्वक ऑर्बिट में स्थापित कर दिया।

आज करीब 1,000 कर्मचारियों और 400 से अधिक भारतीय सप्लायर्स की मदद से $1.1 बिलियन से अधिक की वैल्यूएशन वाली यह डीप-टेक कंपनी वैश्विक स्तर पर भारत का परचम लहरा रही है। पवन चंदना हमेशा धीरूभाई अंबानी के बिजनेस फंडामेंटल्स का उदाहरण देते हुए कहते हैं, 'मेरे लिए सबसे अच्छा करियर विकल्प उद्यमिता है क्योंकि यह आजादी देती है, देश बनाने का अवसर देती है और रोजगार पैदा करती है।ट स्कूली परीक्षा के 51 नंबर भले ही इतिहास की बात हो गए हों, लेकिन उनकी जिज्ञासा और जिद ने आज भारत को अंतरिक्ष के एक नए स्वर्णिम युग में पहुंचा दिया है।

Nitin Arora
नितिन अरोड़ाauthor

नितिन अरोड़ा टाइम्स नाउ नवभारत में न्यूज डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया में उनका 6 वर्षों का अनुभव है। वह राजनीति, देश–विदेश की बड़ी घटनाओं और समसामयिक मुद्दों को गहराई से समझकर उन्हें सटीक और सरल भाषा में प्रस्तुत करने में माहिर हैं। उन्होंने अपने करियर में लगातार करंट अफेयर्स, पॉलिटिकल डेवलपमेंट्स, डिप्लोमैटिक घटनाएं और डिफेंस सेक्टर से जुड़े विषयों पर प्रभावशाली कॉन्टेंट तैयार किया है और अबतक 6 हजार से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं। विभिन्न टॉपिक्स पर एक्सप्लेनेर, डेटा-आधारित रिपोर्ट्स और विश्लेषणात्मक कॉपी लिखने में उनकी मजबूत पकड़ है।

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